#अथर्ववेद (1-3) Atharv Ved
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ये त्रिषप्ताः परियन्ति विश्वा रूपाणि बिभ्रतः। वाचस्पतिर्बला तेषां तन्वो अद्य दधातु मे॥
हे वाणी के स्वामी परमपिता परमेश्वर (वाचस्पते)! ये त्रिसप्त अर्थात् सत्व, रज एवं तम,-ये तीन गुण तथा धारा, जल, प्रकाश, हवा, अम्बर, तन्मात्रा एवं अहंकार- ये सात पदार्थ के संयोग से निर्मित 'इक्कीस' देवता जो कि चारों ओर व्याप्त हैं, इन सबके अन्दर निहित शरीरस्थ बल को आप हमें प्रदान करें, ऐसी हमारी आपसे प्रार्थना है।(अथर्ववेद, मेधा जनन 1.1.1)
Hey Lord of voice-speech, Param Pita Parmeshwar (Vachaspati)! Trisapt-Trigun i.e,. Satv, Raj & Tam; seven materials viz stream, water, light, air, Tanmatra and Igo (Ahankar) the combination of these lead to the formation-evolution of 21 (7x3) demigods-deities which pervade the four directions. We pray to you for granting us the inbuilt strength.
पुनरेहि वाचस्पते देवेन मनसा सह। वसोष्पते नि रमय मय्येवास्तु मयि श्रुतम्॥
हे वाचस्पते! आप दिव्य ज्ञान से परिपूर्ण होकर, बारम्बार हमारे समक्ष प्रकट हों। हे वासोष्पते! आप हमारी समस्त इच्छाओं की पूर्ति करते हुए हमें आनन्दित करें तथा धारण किया हुआ ज्ञान हममें स्थिर रखें।(अथर्ववेद, मेधा जनन 1.1.2)
Hey Vachaspate! You should present yourself before us having acquired divine characteristics, repeatedly. You should fulfill all our desires-wish and gladden us. Knowledge-enlightenment acquired by us should be retained by us.
इहैवाभि वि तनूभे आत्र्नी इव ज्यया। वाचस्पतिर्नि यच्छतु मय्येवास्तु मयि श्रुतम्॥
हे वाचस्पते! जिस प्रकार युद्ध में वीरों द्वारा धनुष की प्रत्यंचा चढ़ाने से उसके दोनों सिरे एक समान खिंच जाते हैं, उसी प्रकार हमें दैवी ज्ञान धारण करने में सक्षम तीक्ष्ण बुद्धि तथा मनोवांछित आनंदप्रदायक उपभोग सामग्री उपलब्ध करायें। आपके द्वारा दिया गया दान हममें स्थिर रहें।(अथर्ववेद, मेधा जनन 1.1.3)
Hey Vachaspate! The way two ends of bow stretch equally by pulling the string similarly grant us sharp mind and comfortable useful goods. Let the donation to us by you remain as such with us.
उपहूतो वाचस्पतिरुपास्मान् वाचस्पतिह्वयताम्।
सं श्रुतेन गमेमहि मा श्रुतेन वि राधिषि॥
हे वाणी के स्वामी! हम आपका आवाहन करते हैं। आप हमें अपने समक्ष आमंत्रित करें। आप हमेशा अपनी कृपा दृष्टि हम पर बनायें रखें। हम कदापि वेदों के अध्ययन से विमुख न हों तथा हमारे अन्दर ज्ञान का संचार हो।(अथर्ववेद,मेधा जनन 1.1.4)
Hey Lod-deity of speech! We invoke you. You should invite us before you. You mercy-blessings should remain-continue over us.
अथर्ववेद, रोग-उपशमन (1.2) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- चन्द्रमा और पर्जन्य; छन्द :- अनुष्टुप् 3 त्रिपदा विराट् गायत्री।
विद्मा शरस्य पितरं पर्जन्यं भूरिधायसम्। विद्मो ष्वस्य मातरं पृथिवीं भूरिवपसम्॥
हमें यह भली-भाँति ज्ञात है कि सभी जड़-चेतन का धारक तथा पालनकर्ता पर्जन्य इस 'शर' (बाण या जीवन तत्त्व) का पिता तथा सभी प्रकार के तत्त्वों से युक्त पृथ्वी इसकी माता हैं।(अथर्ववेद, रोग-उपशमन 1.2.1)
We are sure that Parjany is the father of all static and movable goods and the Shar (arrow & life form) similarly the earth possessing all sorts of traits-characteristics is its mother.(19.03.2026)
ज्याके परि णो नमाश्मानं तन्वं कूधि। वीडूर्वरीयोऽरातीरप द्वेषांस्या कृधि॥
हे जन्म दात्री! आप हमारे शरीरों को पाषाण की भाँति कठोर और शक्तिशाली बना दें तथा हमारे दोषरूपी शत्रुओं को शक्ति रहित कर दें, जिससे वह हमारे समीप न आ सकें।(अथर्ववेद, रोग-उप शमन 1.2.2)
Hey originator (mother giving birth)! Make our bodies hard like the rocks and strong, destroy-quite our enemies in the form of defects so that they are unable to reach us.
वृक्षं यद्गावः परिषस्वजाना अनुस्फुरं शरमर्चन्त्यृभुम्। शरुमस्मद् यावय दिद्युमिन्द्र॥
जैसे गौएँ गर्मी से पीड़ित होकर छाया प्राप्त करने के उद्देश्य से वट वृक्ष की शरण में शीघ्रता से चली जाती है, वैसे ही आप शत्रुओं के वीरों द्वारा चलाये गए बाणों को निष्फल कर हमारी रक्षा करें।(अथर्ववेद, रोग-उप शमन 1.2.3)
The way cows move under the shadow of Banyan tree on been troubled by heat quickly, similarly you protect us from the arrows shot by the enemies warriors by failure-missing of their target.
यथा द्यां च पृथिवीं चान्तस्तिष्ठति तेजनम्। एवा रोगं चास्त्रावं चान्तस्तिष्ठतु मुञ्ज इत्॥
जिस प्रकार भूलोक तथा द्युलोक के बीच में प्रकाश स्थित रहता है, उसी प्रकार मुक्तिदाता हमारे शरीर में समस्त रोगों, रक्तस्रावों या रसों के मध्य में प्रतिस्थापित रहें।(अथर्ववेद, रोग-उप शमन 1.2.4)
मुक्तिदाता :: मुक्ति दिलाने वाला, तारक, liberator, saviour, Almighty.
The way light is present between the earth & heavens similarly the Almighty-liberator, should remain present between the ailments, wounds or fluids released by the body.
Soul-minutest component of the God, occupies the whole body of living being.
अथर्ववेद, मूत्र मोचन (1.3) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- पर्जन्य, मित्र, वरुण, चन्द्र, सूर्य; छन्द :- अनुष्टुप्, 1-51 पथ्या पंक्ति।
विद्या शरस्य पितरं पर्जन्यं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे 3 शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥
(ऋषि कहते हैं) इस शरीर का पिता शतवृष्ण पर्जन्य (सैकड़ों सामर्थ्य वाला तथा आत्मबल की शक्ति से परिपूर्ण मेघ) है। इस बात को हम सब अच्छी तरह से जानते हैं। अतः उससे तुम्हारे (शर की) कल्याण करने की प्रार्थना करते हैं। उनसे तुम्हारे मूत्र से सम्बंधित विकार नष्ट हो जाए तथा तेरे शरीर में स्थिर या स्थूल मूत्र बाहर निकल जाए।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.1)
Rishi Gan says that the father of the body is Parjany (cloud full of confidence). We are aware of it. Hence, we pry to him for your welfare. Let the diseases pertaining to urination are removed and the urine present in the body comes out.
Water constitute 2/3 of the human body.
विद्या शरस्य पितरं मित्रं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे 3 शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥
अनन्त शक्ति से परिपूर्ण सरवासे (सैकड़ों सामर्थ्य वाला सूर्य) से जो 'शर' का जनक है, हम भली-भाँति परिचित हैं। हे रोगी! उस 'शर' से हम तुम्हारे रोगों को नष्ट करने की कामना करते हैं। उससे तुम्हारे उदर में स्थिर मूत्र बाहर निकल जाए एवं धरती पर तेरी वृद्धि हो।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.2)
Sun possessing infinite power is the father of Shar, this is clear to us. Hey patient! We pray to destroy the ailments in the body with Shar. It will remove the urine out of your body and you will progress over the earth.
Here Shar is used for the medicine.
One must not block urine for long, in the body since it cause several serious diseases.
शर :: बाण, तीर, या धातु का बना नुकीला हथियार, सरकंडा, नरकट या पाँच की संख्या (अनेकार्थी), तकरार, विवाद, झगड़ा, शोर, हंगामा, फ़ेल, नाराच, सरई, सरपत, रामशर, दूध की मलाई, दही की मलाई, सामुद्रिक के अनुसार शरीर में का एक चिह्न, उशीर, खस।
विद्या शरस्य पितरं वरुणं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे3 शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥
शत्रुओं का विनाश करने वाले 'शर' के जनक वरुण हैं, इस बात से हम भली-भाँति परिचित हैं। हे रोगी! अतः हम उससे शर से तुम्हारे शरीर का कल्याण चाहते हैं। तुम्हारे समस्त रोगों का नाश हो तथा शीघ्रतापूर्वक मूत्र बाहर निकल जाए एवं तेरा शरीर शुद्ध हो जाए।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.3)
Varun Dev destroyer of the enemies is the progenitor of Shar (anti bodies), this is known to us. Hey patient! We wish your welfare with that Shar. Let all your diseases are cured and the urine quickly move out of the body making your body clean.
विद्मा शरस्य पितरं चन्द्रं शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे 3 शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥
हम 'शर' के जनक चन्द्रदेव से परिचित है, जो वीर्यवान् आनन्दायक तथा धरती पर किरणों में अन्न औषधि आदि को पुष्ट करके जीव-जन्तु को बलवान् बनाते हैं, उनसे तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हें विशेष बल प्राप्त हो और तुम्हारा मूत्र बाहर निकल जाए।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.4)
We are aware that Chandr Dev is the progenitor of Shar. He make the body of living beings strong with medicines, virile, gladdening. Let them lead to your welfare-well being. You should attain specific power and the urine moves out of your body.(20.03.2026)
विद्या शरस्य पितरं सूर्य शतवृष्ण्यम्।
तेना ते तन्वे३ शं करं पृथिव्यां ते निषेचनं बहिष्टे अस्तु बालिति॥
हमें भली-भाँति ज्ञात है कि बहुत बलशाली, सामर्थ्यवान, तेज से परिपूर्ण सूर्य 'शर' के पिता हैं। अतः वे तुम्हारा कल्याण करें। उनसे तुम्हारे शरीर के रोगों का नाश हो तथा तुम्हारे सारे विकार बाहर निष्कासित हो जाएँ।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.5)
विकार :: अव्यवस्था, उपद्रव, अशांति, विशृंखलता, विकृति, कुरूपता, तोड़ना-मरोड़ना; disorder, deformation, conjugation, defects.
We are sure that mighty, capable, full of Tej Sury Dev is the father of Shar. Hence let him devote to your welfare. He shall destroy the diseases in your body, removing all defects out of your body.
यदान्त्रेषु गवीन्योर्यद्वस्तावधि संश्रुतम्।
एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥
शरीर में स्थिर सारहीन मूत्र अत्यन्त पीड़ा देता है अतः उसका निष्कासन होने पर ही मानव को शान्ति मिलती है। इसलिए मूत्र वाहिनी नाड़ियों मूत्राशय एवं आँतों में रूका हुआ दूषित जल (मूत्र) इस चिकित्सा द्वारा शब्द करता हुआ शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल जाएगा।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.6)
Useless (waste water) urine present in body cause acute pain and one gets relief after its discharge. By virtue of medicinal treatment urine is passed making sound quicky from the urinary bladder and the intestines.
प्र ते भिनद्मि मेहनं वर्त्र वेशन्त्या इव। एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥
हे मूत्ररोग से पीड़ित रोगी! हम 'शर' से तेरे मूत्र मार्ग को उसी तरह खोल देते हैं, जिस तरह बांध टूट जाने से तालाब का जल शीघ्रतापूर्वक बाहर निकल जाता है।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.7)
Hey patient suffering from the ailment of urine! We open the urinary passage with Shar in the way the dam is broken, releasing water quickly.
विषितं ते वस्तिबिलं समुद्रस्योदधेरिव। एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥
हे रोगी! तेरे रूके हुए मूत्राशय को निष्कासित करने हेतु हमने उसी प्रकार का पथ बनाया है, जिस प्रकार का पथ तालाब के जल को बाहर निकालने हेतु बनाया जाता है। अतः तेरा रूका हुआ मूत्र उन तालाबों के जल की भाँति ही शब्द करता हुआ बाहर निकले।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.8)
Hey patient! We have made a passage for your urine similar to the one made for removing water from the pond. Hence. your blocked urine should come out of the body, similar to the water coming out of the reservoir making sound.
यथेषुका परापतदवसृष्टाधि धन्वनः। एवा ते मूत्रं मुच्यतां बहिर्बालिति सर्वकम्॥
जिस तरह धनुष से छोड़ा गया बाण अपने शत्रुओं का विनाश करते हुए तीव्र वेग से बढ़ता है, उसी तरह तेरा सम्पूर्ण रूका हुआ मूत्र वेगपूर्वक बाहर निकल जाए।(अथर्ववेद, मूत्र मोचन 1.3.9)
The way an arrow shot from the bow destroys the enemy with high speed, similarly your blocked urine should come out of the body with high speed.
अथर्ववेद, अपांभेषज (जल चिकित्सा (1.4) :: ऋषि :- सिन्धुद्वीप; देवता :- अपांनपात्, सोम और आपः देवता; छन्द :- गायत्री, 4 पुरस्ताद् बृहती।
अम्बयो यन्त्यध्वभिर्जामयो अध्वरीयताम्। पृञ्चतीर्मधुना पयः॥
माताओं एवं बहिनों की तरह यज्ञ से निर्मित पोषक धाराएँ यज्ञ कर्त्ताओं हेतु दुग्ध अथवा जल के साथ मधुर रस मिलाती हैं।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.4.1)
Just like mothers and sisters, streams of nutrients made by the Yagy, mix milk or water with sweet juices-sap for the Yagy accomplishers.
अमूर्या उप सूर्य याभिर्वा सूर्यः सह। ता नो हिन्वन्त्वध्वरम्॥
सूर्य के निकट रहकर शुद्ध बना वाष्पीकृत जल उसकी शक्ति के साथ पर्जन्य वर्ण के रूप में आए तथा यज्ञ को सफल करके सम्पन्न बनाए।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.4.2)
Water close to Sun in the form of vapours should come in the state of Parjany with his strength and make the Yagy successful.
अपो देवीरुप ह्वये यत्र गावः पिबन्ति नः। सिन्धुभ्यः कर्वं हविः॥
हम उस प्रतापी 'जल' प्रवाह का आवाहन करते हैं, जो सागर का पान करके, वृष्टिकर हवि प्रदान करते हैं और जिस स्थान पर प्रवाहित होने वाली नदियों एवं तालाबों के जल को पीकर हमारी गौएँ तृप्त होती हैं।(अथर्ववेद, अपांभेषज जल चिकित्सा 1.4.3)
We invoke that majestic water flow-stream, which reaches ocean, and make offerings to it. Our cows are satisfied by drinking the water of rivers & ponds.
अप्स्व 1 न्तरमृतमप्सु भेषजम्।
अपामुत प्रशस्तिभिरश्वा भवथ वाजिनो गावो भवथ वाजिनीः॥
वह अमृत समान औषधियों से युक्त जल जो सभी रोगों का नाशक तथा पुष्टिवर्धक है। अपने दैवी गुणों से हमारी गौएँ एवं अश्वों (घोड़ों) को बलवान् बनाए।(अथर्ववेद, अपांभेषज जल चिकित्सा 1.4.4)
Water having medicinal properties like elixir-nectar destroy all diseases and is nourishing. Make our cows & horses strong with your divine powers.
अथर्ववेद, रोग-उपशमन (1.5) :: ऋषि :- सिन्धुद्वीप; देवता :- अपांनपात्, सोम और आपः देवता; छन्द :- गायत्री, 4 वर्धमान गायत्री।
आपो हि ष्ठा मयोभुवस्ता न ऊर्जे दधातन। मणे रणाय चक्षसे॥
हे दिव्य आपः (जल)! आप समस्त जीवों को सुख प्रदान करने वाले हैं। आप हमें परमात्मा से मिलन, सुखों का उपभोग करने तथा विश्व के रोचक पदार्थों का दर्शन करने हेतु समृद्ध करें।(अथर्ववेद, रोग-उपशमन 1.5.1)
Hey divine water! You grant pleasure-comfort to all living beings. Align-connect us with the God, enjoyment of comforts-pleasure and interesting materials in the world.
यो वः शिवतमो रसस्तस्य भाजयतेह नः। उशतीरिव मातरः॥
जिस प्रकार माताएँ अपने सन्तानों को बहुत प्रेम करती हैं, उनको पोषण आहार प्रदान कर उनको शक्ति प्रदान करती हैं, उसी प्रकार हे दिव्य जल! आप हमें अपने परम कल्याणमयी रस में भागीदार बनाकर शक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, रोग-उपशमन 1.5.2)
This way mothers have great love for their children, provide them nourishing food and strength, similarly hey divine water! Grant us share in that extremely well being-welfare oriented water granting strength.
तस्मा अरं गमाम वो यस्य क्षयाय जिन्वथ। आपो जनयथा च नः॥
हम उस दिव्य जल की छाया में रहकर अपनी वृद्धि की कामना करते हैं, जो अन्न आदि उत्पन्न कर जीव जन्तुओं को पोषण प्रदान करता है।(अथर्ववेद, रोग-उपशमन 1.5.3)
We wish to remain under the protection of that divine water for our progress, which grow food grains and grant nourishment to living beings-organism.
ईशाना वार्याणां क्षयन्तीश्चर्षणीनाम्। अपो याचामि भेषजम्॥
हम उस दिव्य जल की उपासना करते हैं, जो समस्त प्राणियों के रोगों का औषधि के रूप में निवारण करता है तथा जो दिव्य गुणों से परिपूर्ण हैं। वह हमें सुख-सपन्नता प्रदान करे।(अथर्ववेद, रोग-उपशमन 1.5.4)
We worship that divine water which recovers us all living beings from diseases. Let it grant us happiness, pleasure, prosperity.
अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा (1.6) :: ऋषि :- सिन्धुद्वीप, कृति अथवा अथर्वा; देवता :- अपांनपात्, सोम और आपः देवता; छन्द :- गायत्री, 4 पथ्यापंक्ति।
शं नो देवीरभिष्टय आपो भवन्तु पीतये। शं योरभि स्रवन्तु नः॥
हे दैवीगुणों से परिपूर्ण आपः (जल)! आप हर प्रकार से हमारे लिए कल्याणकारी तथा सुख प्रदान करने वाले हों। आप हमारी इच्छाओं की पूर्ति कर हमें शान्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.6.1)
Hey water full of divine characrices! You should be beneficial and comfortable to us. Accomplish our desires and grant us peace-solace.
अप्सु मे सोमो अब्रवीदन्तर्विश्वानि भेषजा। अग्निं च विश्वशम्भुवम्॥
सोम का हम सबके लिए यह उपदेश है कि दित्य जल में सभी प्रकार की औषधियों के गुण विद्यमान् है एवं सम्पूर्ण जगत् का कल्याण करने वाली अग्नि भी विद्यमान है।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.6.2)
Som advises us that divine water has all sorts of medicinal properties and fire which is beneficial to the whole world too, is present in it.
आपः पृणीत भेषजं वरूथं तन्वे3 मम। ज्योक् च सूर्य दृशे॥
हे आपः (जल)! आप हमें शरीर को रोगों से मुक्त करने वाली दिव्य औषधियाँ प्रदान कीजिए, जिसके परिणामस्वरूप हम दीर्घकाल तक सूर्य के दर्शन करने में समर्थ हों अर्थात् हमें दीर्घ आयु प्रदान कीजिए।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.6.3)
Hey water! Grant us divine medicines which can relieve our body from all ailments, so that we are able to see Sun for a long period of time i.e,. longevity.
शं न आपो धन्वन्या 3 शमु सन्त्वनूप्याः।
शं नः खनित्रिमा आपः शमु याः कुम्भ आभृताः शिवा नः सन्तु वार्षिकी॥
निर्जल देश (रेगिस्तान) का जल हमारे लिए कल्याण प्रदान करने वाला हो। जल से परिपूर्ण देश का जल हमारे लिए सुखकारी हो, भूमि को खोदकर निकाला गया कूप का जल हमारे लिए कल्याणकारी सिद्ध हो। पात्र में भरा हुआ जल अर्थात् घड़े आदि में स्थित जल हमारे लिए लाभकारी हो। इसी प्रकार वर्षा से प्राप्त होने वाला जल भी हमें सुख-शान्ति प्रदान करने वाला सिद्ध हो।(अथर्ववेद, अपांभेषज-जल चिकित्सा 1.6.4)
Water should be beneficial to us in desert. Water of country having sufficient water should be comfortable to us. Water brought out of the earth by digging well should be beneficial to us. Water filled in the pitcher should be beneficial to us. Water obtained from rains should grant us peace-tranquillity.
अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त (1.7) :: ऋषि :- चातन; देवता :- अग्नि, 3 अग्नीन्द्र; छन्द :-अनुष्टुप्, 5 त्रिष्टुप्।
स्तुवानमग्न आ वह यातुधानं किमीदिनम्। त्वं हि देव वन्दितो हन्ता दस्योर्बभूविथ॥
हे अग्नि देव! हम आपकी स्तुति करते हैं। दुष्ट प्रवृत्ति रखने वाले दुष्टों (राक्षसों और वैरियों) को आप अपने प्रभाव से अपने पास बुला लें। हमारे द्वारा वन्दना करने पर आप उनकी सारी बुराइयों को नष्ट करके चारों ओर शांति व्याप्त करे।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.1)
बुराई :: अनैतिकता, नुकसान देह आदत, दुष्टता; evils, vices, bad habits, bad things, wickedness, badness, immorality, faults.
Hey Agni Dev! We worship you. Bring the demons, wicked-vicious to you by virtue of your effect. You should generate peace all around by destroying the evils on being worshiped by us.
आज्यस्य परमेष्ठिञ्जातवेदस्तनूवशिन्। अग्ने तौलस्य प्राशान यातुधानान् वि लापय॥
हे अग्नि देव! आप ऊँचे पद पर विराजमान हैं, आपके अन्दर ज्ञान का भण्डार हैं और आप जठराग्नि के रूप में शरीर का संतुलन बनाने वाले हैं। अतः आप हमारे द्वारा खुवापात्र से तौली हुई आज्याहुति को स्वीकार करें और हमारे द्वारा प्रसन्न होकर आप दुष्टों का संहार करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.2)
Hey Agni Dev! You occupy high position-post. You are a storehouse of knowledge and make balance in the body by controlling Jathragni-the fire which digest food in the stomach. Accept our Ajyahuti weighed with Struva, become happy and destroy the wicked-notorious.
वि लपन्तु यातुधाना अत्त्रिणो ये किमीदिनः। अथेदमग्ने नो हविरिन्द्रश्च प्रति हर्यतम्॥
हे अग्नि देव! दूसरों को दुख पहुँचाने वाले, अपना स्वार्थ सिद्ध करते हुए समाज में सर्वत्र विचरण करने वाले दुष्टों को अपना विनाश होता हुआ देखकर विलाप करने दें। आप इन्द्रादि सहित हमारे हविष्य को ग्रहण करें और हमें सत्कर्म करने के लिए प्रेरित करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.3)
Hey Agni Dev! Let the wicked weep who give pain-sorrow to others roaming all over the society-earth. Accept our offerings along with Indragni and inspire us for virtuous, pious, righteous deeds.
अग्निः पूर्व आ रभतां प्रेन्द्रो नुदतु बाहुमान्। ब्रवीतु सर्वो यातुमानयमस्मीत्येत्य॥
सर्वप्रथम अग्नि देव आप असुरों, दुष्टों का संहार करना प्रारम्भ करें। शक्तिशाली इंद्र इस कार्य हेतु आपको प्रेरित करें। इन दोनों के प्रभाव से असुर स्वयं आपके समक्ष उपस्थित होकर प्रायश्चित करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.4)
First of all, hey Agni Dev, start destruction of the demons, giants, wicked. Let mighty Devraj Indr inspire you to do this. Due to the impact of both of you, let the demons come in front of you and resort to penance, atonement.(22.03.2026)
पश्याम ते वीर्य जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान् नृचक्षः।
त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात् त आ यन्तु प्रबुवाणा उपेदम्॥
हे ज्ञान के पुञ्ज अग्नि देव! आपका बलशाली, पराक्रमी प्रकाश हम देखें। आप अपने मार्ग से भटक जाने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करें। आपकी आज्ञा को ग्रहण करके राक्षस (असुर) प्रायश्चित हेतु आपके समक्ष अपना परिचय देते हुए उपस्थित हों।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.5)
Hey Agni Dev embodiment of knowledge! Let us see your mighty valour in the form of light. Inspire the wicked person who deviate from virtuous path to move over righteous path. Demons should accept your orders and present before you introducing themselves.
आ रभस्व जातवेदोऽस्माकार्थाय जज्ञिषे। दूतो नो अग्ने यातुधानान् वि लापय॥
हे जातवेद! आप (शुभ यज्ञीय कर्मों को) प्रारम्भ करें। हे अग्नि देव! आप हमारा हित करते हुए हमारे प्रतिनिधि (दूत) बनकर दुष्टों को उनके द्वारा किये गए दुष्कर्मों पर रूदन कराएँ।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.6)
Hey Jat Ved! Begin with auspicious deeds-Yagy Karm. Hey Agni Dev! Resort to our welfare, become our messenger-ambassador and make the wicked weep for their misdemeanor
त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह। अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु॥
हे अग्नि देव! आप दुष्टों को अपने पाश आदि में बाँधकर यहाँ आने के लिए विवश कर दें तथा इन्द्र देव अपने व्रज के प्रहार से उन दुष्टों के सिर का उच्छेदन कर दें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.7)
Hey Agni Dev! Make the wicked tie and compel them to come here; thereafter let Devraj Indr behead them with his Vajr.
अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त (1.8) :: ऋषि :- चातन; देवता :- बृहस्पति, अग्नीषोम, 3-4 अग्नि; छन्द :- अनुष्टुप, 4 बार्हतगर्भा त्रिष्टुप्।
इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिवा वहत्।
य इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः॥
जिस प्रकार नदी अपने वेग से फेन (गन्दगी) को स्थानान्तरित कर देती हैं, उसी प्रकार यह 'हवि' दुष्टों तथा पापियों को यहाँ से दूर बहा ले जाएँ। दुष्कर्म करने वाली स्त्री तथा पुरुष अपनी रक्षा हेतु तुमसे वन्दना करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.1)
The river remove the waste by its speed, similarly the offerings should carry away the sinners. Woman & man involved in rape should pray to you, for their survival.
अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत। बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्॥
हे अग्ने! हे सोम! प्रायश्चित करने वाली कामना से दुष्ट आपकी शरण में आये हैं, उनका स्वागत करें। आप अपने अच्छे गुणों के द्वारा उन्हें वशीभूत कर लें और उपचार करने के लिए उनका विशेष परीक्षण करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.2)
Hey Agne! Hey Som! Wicked have come to you for penances. Welcome them. Enchant them with your good traits and examine them for treatment.
यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च। नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्॥
ज्ञानरूपी अमृत का पान करने वाले हे सोम! आसुरी प्रवृत्ति रखने वालों का सम्पूर्ण विनाश हो जाए इसलिए आप उनकी सन्तानों के समीप जाकर उन्हें सन्मार्ग की ओर ले जाएँ तथा वन्दना करने वाले नेत्रों को शालीनता से परिपूर्ण (युक्त) कर दें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.3)
Hey Som, drinking elixr-nectar in the form of enlightenment! For complete destruction of those having demonic tendencies guide their children to virtuous path and grant cool of eyes to those who worship you.
यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्त्रिणां जातवेदः।
तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जहह्येषां शततर्हमग्ने॥
हे अग्ने! आप पथभ्रष्टों की सन्तानों तक सुदूर गुफाओं में जाकर अपने दिव्य प्रकाश से उन्हें सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करें। इस प्रकार आप सबके कष्टों (दुखों) को दूर करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.4)
Hey Agne! Reach the progeny of the misguided people in distant caves; move them over the virtuous path with your divine light-aura. In this manner remove the trouble-pain of all.
अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त (1.9) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- वसुगण, इन्द्र, पूषा, मित्र, अग्नि, आदित्यगण, विश्वदेवा, 2 देवगण, सूर्य, अग्नि, हिरण्य, 3-4 अग्नि जात वेदा; छन्द :- त्रिष्टुम्।
अस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः।
इममादित्या उत्त विश्वे च देवा उत्तरस्मिञ्ज्योतिषि धारयन्तु॥
धन संपदा चाहने वाले मानव को आठों वसू देवता, देवेन्द्र, पूषा, वरुण, अग्नि, सूर्य, मित्र आदि समस्त देवगण अपनी कृपादृशि से धन वैभव से युक्त करें। आदित्य आदि समस्त देवगण भी उसे तेज से युक्त कर अपनी कृपा उस पर बनाये रखें।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.1)
Let the 8 Vasu Gan, Devendr, Pusha, Varun, Agni, Sury and Mitr etc demigods grant wealth & prosperity to the human who desire it. Adity Gan and other demigods should bless him Tej-aura and have mercy over him.
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्।
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्॥
हे समस्त देवतागण! इस मानव में सूर्य, अग्नि, इन्द्र, स्वर्ण आदि की तेजस्विता निहित रहे। वह स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए दुष्टों का विनाश कर दें। इस तरह वह मानव जीवन की उत्तम गति को प्राप्त करता हुआ अपना जीवन सफल बनाए।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.2)
Hey all demigods-deities! Grant Tej of Sury, Agni, Indr and Gold etc. to the devotee. Let him have self control and destroy the wicked. In this manner the man should attain success in life by achieving the best progress in human life.
येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः।
तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रेष्ठ्य आ धेह्येनम्॥
हे अग्नि देवता! जिस प्रकार आपके द्वारा प्राप्त दिव्य ज्ञान से राजा इन्द्र आदि देवता सभी रसों (सुखों) का पान करके आनंद उठाते हैं, उसी प्रकार आप इस पुरुष को भी वह दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसके जीवन को प्रकाशमान करते हुए उच्च स्थान प्राप्त करायें, जिससे कि वह मानव देवताओं की तरह श्रेष्ठ जीवन का लाभ उठाए।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.3)
Hey Agni Dev! The way Devraj Indr Dev and demigods have pleasure-enjoyment, similarly grant divine knowledge to this man-devotee so that he attain high position in society making his life illuminated-benefited like the demigods.
ऐषां यज्ञमुत वर्षों ददेऽहं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने।
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्॥
हे अग्नि देव! हम इस मावन के तेज, धर्म, श्रेष्ठ कर्मों को स्वीकारते हैं। आप इसके कष्टों को दूर कर इसे सुख-शांति प्रदान करें बैर रखने वालों को सदैव इससे दूर रखें। आप अपनी कृपा इस पर सदैव बनाए रखें ताकि कोई भी शत्रु इसका अहित न कर पाएँ।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.4)
Hey Agni Dev! We accept the Tej and best deeds of this man. Remove his troubles and grant pleasure-comforts to him, keeping the envious away. Shower your mercy over him so that the enemy is not able to harm him.
अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त (1.10) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 असुर, 2-4 वरुण; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 ककुम्मती अनुष्टुप्, 4 अनुष्टुप्।
पश्याम ते वीर्य जातवेदः प्र णो ब्रूहि यातुधानान् नृचक्षः।
त्वया सर्वे परितप्ताः पुरस्तात् त आ यन्तु प्रबुवाणा उपेदम्॥
हे ज्ञान के पुञ्ज अग्नि देव! आपका बलशाली, पराक्रमी प्रकाश हम देखें। आप अपने मार्ग से भटक जाने वाले दुष्ट प्रवृत्ति के लोगों को सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करें। आपकी आज्ञा को ग्रहण करके राक्षस (असुर) प्रायश्चित हेतु आपके समक्ष अपना परिचय देते हुए उपस्थित हों।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.5)
Hey Agni Dev embodiment of knowledge! Let us see your mighty valour in the form of light. Inspire the wicked person who deviate from virtuous path to move over righteous path. Demons should accept your orders and present before you introducing themselves.
आ रभस्व जातवेदोऽस्माकार्थाय जज्ञिषे। दूतो नो अग्ने यातुधानान् वि लापय॥
हे जातवेद! आप (शुभ यज्ञीय कर्मों को) प्रारम्भ करें। हे अग्नि देव! आप हमारा हित करते हुए हमारे प्रतिनिधि (दूत) बनकर दुष्टों को उनके द्वारा किये गए दुष्कर्मों पर रूदन कराएँ।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.6)
Hey Jat Ved! Begin with auspicious deeds-Yagy Karm. Hey Agni Dev! Resort to our welfare, become our messenger-ambassador and make the wicked weep for their misdemeanor
त्वमग्ने यातुधानानुपबद्धाँ इहा वह। अथैषामिन्द्रो वज्रेणापि शीर्षाणि वृश्चतु॥
हे अग्नि देव! आप दुष्टों को अपने पाश आदि में बाँधकर यहाँ आने के लिए विवश कर दें तथा इन्द्र देव अपने व्रज के प्रहार से उन दुष्टों के सिर का उच्छेदन कर दें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.7.7)
Hey Agni Dev! Make the wicked tie and compel them to come here; thereafter let Devraj Indr behead them with his Vajr.
अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त (1.8) :: ऋषि :- चातन; देवता :- बृहस्पति, अग्नीषोम, 3-4 अग्नि; छन्द :- अनुष्टुप, 4 बार्हतगर्भा त्रिष्टुप्।
इदं हविर्यातुधानान् नदी फेनमिवा वहत्।
य इदं स्त्री पुमानकरिह स स्तुवतां जनः॥
जिस प्रकार नदी अपने वेग से फेन (गन्दगी) को स्थानान्तरित कर देती हैं, उसी प्रकार यह 'हवि' दुष्टों तथा पापियों को यहाँ से दूर बहा ले जाएँ। दुष्कर्म करने वाली स्त्री तथा पुरुष अपनी रक्षा हेतु तुमसे वन्दना करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.1)
The river remove the waste by its speed, similarly the offerings should carry away the sinners. Woman & man involved in rape should pray to you, for their survival.
अयं स्तुवान आगमदिमं स्म प्रति हर्यत। बृहस्पते वशे लब्ध्वाग्नीषोमा वि विध्यतम्॥
हे अग्ने! हे सोम! प्रायश्चित करने वाली कामना से दुष्ट आपकी शरण में आये हैं, उनका स्वागत करें। आप अपने अच्छे गुणों के द्वारा उन्हें वशीभूत कर लें और उपचार करने के लिए उनका विशेष परीक्षण करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.2)
Hey Agne! Hey Som! Wicked have come to you for penances. Welcome them. Enchant them with your good traits and examine them for treatment.
यातुधानस्य सोमप जहि प्रजां नयस्व च। नि स्तुवानस्य पातय परमक्ष्युतावरम्॥
ज्ञानरूपी अमृत का पान करने वाले हे सोम! आसुरी प्रवृत्ति रखने वालों का सम्पूर्ण विनाश हो जाए इसलिए आप उनकी सन्तानों के समीप जाकर उन्हें सन्मार्ग की ओर ले जाएँ तथा वन्दना करने वाले नेत्रों को शालीनता से परिपूर्ण (युक्त) कर दें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.3)
Hey Som, drinking elixr-nectar in the form of enlightenment! For complete destruction of those having demonic tendencies guide their children to virtuous path and grant cool of eyes to those who worship you.
यत्रैषामग्ने जनिमानि वेत्थ गुहा सतामत्त्रिणां जातवेदः।
तांस्त्वं ब्रह्मणा वावृधानो जहह्येषां शततर्हमग्ने॥
हे अग्ने! आप पथभ्रष्टों की सन्तानों तक सुदूर गुफाओं में जाकर अपने दिव्य प्रकाश से उन्हें सन्मार्ग पर चलने हेतु प्रेरित करें। इस प्रकार आप सबके कष्टों (दुखों) को दूर करें।(अथर्ववेद, यातुधान नाशन सूक्त 1.8.4)
Hey Agne! Reach the progeny of the misguided people in distant caves; move them over the virtuous path with your divine light-aura. In this manner remove the trouble-pain of all.
अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त (1.9) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- वसुगण, इन्द्र, पूषा, मित्र, अग्नि, आदित्यगण, विश्वदेवा, 2 देवगण, सूर्य, अग्नि, हिरण्य, 3-4 अग्नि जात वेदा; छन्द :- त्रिष्टुम्।
अस्मिन् वसु वसवो धारयन्त्विन्द्रः पूषा वरुणो मित्रो अग्निः।
इममादित्या उत्त विश्वे च देवा उत्तरस्मिञ्ज्योतिषि धारयन्तु॥
धन संपदा चाहने वाले मानव को आठों वसू देवता, देवेन्द्र, पूषा, वरुण, अग्नि, सूर्य, मित्र आदि समस्त देवगण अपनी कृपादृशि से धन वैभव से युक्त करें। आदित्य आदि समस्त देवगण भी उसे तेज से युक्त कर अपनी कृपा उस पर बनाये रखें।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.1)
Let the 8 Vasu Gan, Devendr, Pusha, Varun, Agni, Sury and Mitr etc demigods grant wealth & prosperity to the human who desire it. Adity Gan and other demigods should bless him Tej-aura and have mercy over him.
अस्य देवाः प्रदिशि ज्योतिरस्तु सूर्यो अग्निरुत वा हिरण्यम्।
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्॥
हे समस्त देवतागण! इस मानव में सूर्य, अग्नि, इन्द्र, स्वर्ण आदि की तेजस्विता निहित रहे। वह स्वयं पर नियंत्रण रखते हुए दुष्टों का विनाश कर दें। इस तरह वह मानव जीवन की उत्तम गति को प्राप्त करता हुआ अपना जीवन सफल बनाए।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.2)
Hey all demigods-deities! Grant Tej of Sury, Agni, Indr and Gold etc. to the devotee. Let him have self control and destroy the wicked. In this manner the man should attain success in life by achieving the best progress in human life.
येनेन्द्राय समभरः पयांस्युत्तमेन ब्रह्मणा जातवेदः।
तेन त्वमग्न इह वर्धयेमं सजातानां श्रेष्ठ्य आ धेह्येनम्॥
हे अग्नि देवता! जिस प्रकार आपके द्वारा प्राप्त दिव्य ज्ञान से राजा इन्द्र आदि देवता सभी रसों (सुखों) का पान करके आनंद उठाते हैं, उसी प्रकार आप इस पुरुष को भी वह दिव्य ज्ञान प्रदान कर उसके जीवन को प्रकाशमान करते हुए उच्च स्थान प्राप्त करायें, जिससे कि वह मानव देवताओं की तरह श्रेष्ठ जीवन का लाभ उठाए।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.3)
Hey Agni Dev! The way Devraj Indr Dev and demigods have pleasure-enjoyment, similarly grant divine knowledge to this man-devotee so that he attain high position in society making his life illuminated-benefited like the demigods.
ऐषां यज्ञमुत वर्षों ददेऽहं रायस्पोषमुत चित्तान्यग्ने।
सपत्ना अस्मदधरे भवन्तूत्तमं नाकमधि रोहयेमम्॥
हे अग्नि देव! हम इस मावन के तेज, धर्म, श्रेष्ठ कर्मों को स्वीकारते हैं। आप इसके कष्टों को दूर कर इसे सुख-शांति प्रदान करें बैर रखने वालों को सदैव इससे दूर रखें। आप अपनी कृपा इस पर सदैव बनाए रखें ताकि कोई भी शत्रु इसका अहित न कर पाएँ।(अथर्ववेद, विजय प्रार्थना सूक्त 1.9.4)
Hey Agni Dev! We accept the Tej and best deeds of this man. Remove his troubles and grant pleasure-comforts to him, keeping the envious away. Shower your mercy over him so that the enemy is not able to harm him.
अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त (1.10) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 असुर, 2-4 वरुण; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 ककुम्मती अनुष्टुप्, 4 अनुष्टुप्।
अयं देवानामसुरो वि राजति वशा हि सत्या वरुणस्य राज्ञः।
ततस्परि ब्रह्मणा शाशदान उग्रस्य मन्योरुदिमं नयामि॥
देवताओं में बली देव वरुण सर्वत्र हैं। उनकी कामना ही सत्य है। तथापि हम पीड़ित मनुष्यों को दैवी ज्ञान की शक्ति के आधार पर स्तुतियों द्वारा वरुण देव के क्रोध को अग्नि से सुरक्षित रखते हैं।(अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त 1.10.1)
Mighty amongest the demigods Varun Dev pervade all places. His desire is truthful. Though we keep safe the humans safe by virtue of divine knowledge and Stuties of Varun Dev & his anger from Agni Dev.(23.03.2026)
नमस्ते राजन् वरुणास्तु मन्यवे विश्वं ह्युग्र निचिकेषि दुग्धम्।
सहस्त्रमन्यान् प्र सुवामि साकं शतं जीवाति शरदस्तवायम्॥
है तेजस्वी वरुण देव! आपके क्रोध से दुःखी होकर हम सब आपकी शरण में आकर आपकी वन्दना करते हैं। आप सर्वज्ञानी है अर्थात् आप हमारे सभी दोषों से परिचित हैं। मनुष्यों को यह ज्ञात हो रहा है कि आपके शरण में आने से ही उन्हें सुख और दीर्घायु की प्राप्ति होगी।(अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त 1.10.2)
Hey Tejaswi Varun Dev! Pained by your anger we all come under your asylum and worship you. You know everything. You know our faults-defects. Let the humans know that they will get comfort-pleasure & long life after coming under your shelter.
यद्वक्थानृतं जिह्वया वृजिनं बहु। राज्ञस्त्वा सत्यधर्मणो मुञ्चामि वरुणादहम्॥
हे पीड़ित मनुष्य! तुमने अपनी जिव्हा का दुरूपयोग करते हुए झूठ एवं पाप वचन बोलकर अपनी गरिमा का हनन किया है। वरुण देव की कृपादृष्टि एवं अनुकंपा के द्वारा इस अपराध से मैं तुम्हें मुक्ति दिलाने में समर्थ हुआ हूँ।(अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त 1.10.3)
पीड़ित :: दुखी, क्लेशित, पर्याक्रान्त, व्यथित, असंतुष्ट, आर्त; victim, afflicted, infested, aggrieved.
Hey victimised person! You misused your tongue, spoke lies and sinful words loosing your glory. I am capable of relieving from this sin-crime by virtue of the mercy of Varun Dev.
मुञ्चागि त्वा वैश्वानरादर्णवान् महतस्परि। सजातानुग्रेहा वद ब्रह्म चाप चिकीहि नः॥
हे मनुष्यो! हम तुम्हें प्रचंड बलशाली समुद्र के अधिष्ठाता वरुणदेव के क्रोध से सुरक्षा प्रदान करते हैं। हे उग्र देव! आप अपने दूतों को आदेश दें कि वह मनुष्यों को बारम्बार प्रताड़ित न करें।(अथर्ववेद, पाशविमोचन सूक्त 1.10.4)
दूत :: राज-दूत, प्रतिनिधि; messengers, envoy, emissary, legate.
Hey humans! We grant you protection from the fury of mighty ocean, deity-Lord of Varun Dev. Hey furious deity! Order your messengers not to trouble humans again & again.
अथर्ववेद, नारी सुख प्रसूति सूक्त (1.11) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- पूषा, अर्यमा, वेधा, दिक्, देवगण; छन्द :- पंक्ति, 2 अनुष्टुप्, 3 चतुष्पदा उष्णिक्गर्भा ककुम्मती अनुष्टुप्, 4-6 पथ्यापंक्ति।
वषट् ते पूषन्नस्मिन्त्सूतावर्यमा होता कृणोतु वेधाः।
सिस्त्रतां नार्वृतप्रजाता वि पर्वाणि जिहतां सूतवा उ॥
हे उत्तम मनुष्यों के पूषा देव! हम (ऋत्विक, अर्यमा तथा वेधा) आपको हवि अर्पित करते हैं। आपकी कृपा से यह गर्भवती नारी संतान को जन्म दे तथा आप इसे प्रसव के समय होने वाले कष्ट से बचाएँ। यह सावधानी रखते हुए अपने अंगों को कोमल रखे ताकि उसकी संतान सुखपूर्वक जन्म ले।(अथर्ववेद, नारीसुखप्रसूति सूक्त 1.11.1)
Hey Pusha Dev deity of excellent-virtuous men! We Ritviz, Aryma and Vaedha make oblations-offerings to you. By virtue of your mercy, let this woman give birth to the child. Protect her from the delivery pains. Make efforts to keep her organs soft so that she give birth to the child comfortably-easily. Let her delivery be normal.
चतस्त्रो दिवः प्रदिशश्चतस्त्रो भूम्या उत। देवा गर्भ समैरयन् तं व्यूर्णवन्तु सूतवे॥
इस पृथ्वीलोक एवं स्वर्ग लोक को चारों दिशाएँ आवृत्त किए हुए है। दिव्य एवं इन्द्रादि देवगण इस गर्भ को स्थिर किये हुए हैं। वे ही गर्भ को बाहर निकालने हेतु इस आवरण से उसे मुक्त करें।(अथर्ववेद, नारीसुखप्रसूति सूक्त 1.11.2)
Earth and heavens are pervaded from all sides-directions. Divinity and demigods like Devraj are protecting the foetus. They will make efforts to bring the infant out of this covering-uterus.
सूषा व्यूर्णोतु वि योनिं हापयामसि। श्रथया सूषणे त्वमव त्वं बिष्कले सृज॥
हे प्रसव (संतान उत्पन्न करने) में सहायता करने वाले देवताओं! आप गर्भवती स्त्री के गर्भ को मुक्त करें। आप इस नारी के अंगों को ढीला करें तथा गर्म को नीचे की तरफ करते हुए उसे जन्म लेने हेतु प्रेरित करें।(अथर्ववेद, नारीसुखप्रसूति सूक्त 1.11.3)
Hey demigods helping in delivery! Release the pregnant woman from the foetus. Make her veginal organs soft and inspire-push the infant down wards, for taking birth.
नेव मांसे न पीवसि नेव मज्जस्वाहतम्।
अवैतु पृश्नि शेवलं शुने जराय्वत्तवेऽव जरायु पद्यताम्॥
माता के गर्भ में शिशु जरायु (झिल्ली) में फँसा रहता है। यह गर्भवती स्त्री हेतु मांस, मज्जा अथवा चर्बी की तरह उपयोगी नहीं होती है, बल्कि यदि यह गर्भ में रहे तो इसके गम्भीर दुष्परिणाम सामने आ जाते हैं। अतः यह सेवार (जल की घास) नामक 'जेरी' बाहर निकलकर श्वानों का भोजन बनें। यह गर्भवती स्त्री हेतु अत्यंत आवश्यक है।(अथर्ववेद, नारी सुख प्रसूति सूक्त 1.11.4)
जरायु (झिल्ली) :: गर्भनाल या भीतरी झिल्ली-आँवल है जो भ्रूण को गर्भ में घेरे रहती है।placenta, amnion-chorion, amniotic sac/membrane, fetal membrane.
Infant is struck in the membrane. This membrane is not useful like meat, fat, marrow etc. and may result in serious troubles if it remain struck inside the body. Its presence is essential for the protection of foetus inside the Uterus. This is eaten by the dogs.
वि ते भिनद्मि मेहनं वि योनिं वि गतीनिके।
वि मातरं च पुत्रं च वि कुमारं जरायुणाव जरायु पद्यताम्॥
हे गर्भवती स्त्री! प्रसव के समय कष्ट न हो इसके लिए मैं तुम्हारे गर्भमार्ग योनि व नाड़ियों को खोलता हूँ। माता एवं शिशु दोनों को इस जरायु से मुक्त करता हूँ। ऐसा प्रयत्न करता हूँ कि यह 'जेरी' स्वयं भूमि पर गिर जाए और माँ एवं शिशु दोनों ही सुखपूर्वक रहें।(अथर्ववेद, नारीसुखप्रसूति सूक्त 1.11.5)
Hey pregnant woman! To relieve you from the pain, I open the vegina, cervix & birth canal and the nerves. I release both mother & the child from this membrane. I make efforts so that the membrane falls down automatically over the earth and both mother & child live comfortably.
यथा वातो यथा मनो यथा पतन्ति पक्षिणः।
एवा त्वं दशमास्य साकं जरायुणा पताव जरायु पद्यताम्॥
जिस प्रकार वायु बहुत तीव्रगति से चलती है, मन जिस तीव्रगति से इधर-उधर के विषयों में लिप्त होता है तथा पक्षी जिस तीव्रगति से आकाश में विचरण करते रहते हैं, उसी प्रकार शिशु की गर्भवती स्त्री के गर्भ में अत्यंत शीघ्र प्रयास करता है, तब वह जन्म लेता है। वह जरायु के साथ गर्भ से बाहर निकले।(अथर्ववेद, नारीसुखप्रसूति सूक्त 1.11.6)
The way air blows too fast, innerself too move hither & thither like the bird flying with great speed in the sky. Similarly, the infant make vigorous efforts in the stomach-uterus.. It comes out along from the uterus with the membrane.
अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (1.12) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता :- यक्ष्मनाशन; छन्द :-जगती, 2-3 त्रिष्टुप्, 4 अनुष्टुप्।
जरायुजः प्रथम उस्त्रियो वृषा वातभ्रजा स्तनयन्नेति वृष्ट्या।
स नो मृडाति तन्व ऋजुगो रुजन् य एकमोजस्त्रेधा विचक्रमे॥
जरायु से जन्मे बच्चे के समान शक्तिशाली सूर्य देव वायु के प्रभाव से बादलों के बीच से निकलकर हमारे शरीर को आनंदित करते हैं। वे सीधे पथ पर अग्रसर होते हुए एक ही प्रकाश को तीन तरह से विस्तारित करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (1.12.1)
Mighty Sury Dev comes out of the clouds and gladden us like the child coming out of the membrane. He move over the straight path (revolutionary cycle) spread the light in three ways.
अङ्गे अङ्गे शोचिषा शिश्रियाणं नमस्यन्तस्त्वा हविषा विधेम।
अङ्कान्त्समङ्कान् हविषा विधेम यो अग्रभीत् पर्वास्या ग्रभीता॥
अपने तेज से अंग-प्रत्यंग में व्याप्त हे सूर्य! वन्दना और आहुतियाँ द्वारा हम आपको तथा आपके निकटवर्ती देवताओं की अराधना करते हैं। जिसका शरीर जोड़ों के रोग में पीड़ित है, उसके रोग-निवारण हेतु भी हम आपका यजन करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (1.12.2)
Hey Sury Dev pervading all organs with your Tej! We worship you and the demigods near you with prayers-Stuties and offerings. We worship you for the release of the knees pain of the diseased.
मुञ्च शीर्षक्तत्या उत कास एनं परुष्परुराविवेशा यो अस्य।
यो अभ्रजा वातजा यश्च शुष्मो वनस्पतीन्त्सचतां पर्वतांश्च॥
हे आरोग्यदाता सूर्य देव! आप हमें सिरदर्द और खाँसी से होने वाले कष्ट से मुक्ति दिलाएँ। सन्धियों में घुसे कीटाणुओं (रेगाणुओं) को नष्ट कर दें। वर्षा, शीत तथा ग्रीष्म ऋतुओं के प्रभाव से जन्म लेने वाले वात, पित्त, कफ जनित रोगों का निवारण करें। इन रोगों के निवारण हेतु हम वृक्षों, पर्वतों तथ वन की औषधिओं का आश्रय लेते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (1.12.3)
Hey Sury Dev granting immunity-good health! Relieve us from cough and head pain (migrain). Destroy the microbes, germs, virus from the body parts. Destroy the Cough, Pitt, Vat which generate due to the impact of changing whether condition of rain, cold and summer. We depend over the trees, mountains and forests (Ayurvedic medicine, Jadi, buti etc.).(24.03.2026)
शं मे परस्मै गात्राय शमस्त्ववराय मे। शं मे चतुभ्यों अङ्गेभ्यः शमस्तु तन्वे 3 मम॥
हमारे सिर इत्यादि उत्कृष्ट अंगों का उद्धार हो। हमारे पेट आदि साधारण अंगों को सुख-प्राप्त हो। हमारे दोनों पैर और दोनों हाथों का उद्धार हो। हमारे सम्पूर्ण शरीर को रोगों से मुक्त करते हुए हमें लाभ की प्राप्ति हो।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (1.12.4)
उद्धार :: निस्तार, मुक्ति, छुटकारा, बचाव, छुड़ाना; deliverance, extrication, releasement, rescue.
Let our head, legs, hands and other excellent organs be subjected to deliverance. Let our stomach get pleasure-comfort. Our whole body should be rescued from diseases-ailments.
अथर्ववेद, विद्युत् सूक्त (1.13) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता :- विद्युत्; छन्द :- अनुष्टुप्, 3 चतुष्पाद् विराट् जगती, 4 त्रिष्टुप् परा बृहतीगर्भा पंक्ति।
नमस्ते अस्तु विद्युते नमस्ते स्तनयित्नवे। नमस्ते अस्त्वश्मने येना दूडाशे अस्यसि॥
विद्युत् (देवी) को हमारा प्रणाम है। गड़गड़ाहट करने वाली ध्वनि और अशनि को हमारा प्रणाम है। सर्वत्र फैलने वाले बादलों को हमारा प्रणाम है। विद्युत् देवी! आप कष्टदायी दुष्टों, दुर्जनों को अपने वज्र के प्रहार द्वारा विनष्ट करने वाली हैं।(अथर्ववेद, विद्युत् सूक्त 1.13.1)
अशनि :: बिजली, तड़ित या वज्र; lightening, electricity, Vajr.
Salutation to lightning (as goddess). Our salutations to lightning, electricity, Vajr. Our Salutations to clouds spreading all around. Hey goddess of electricity! You are the destroyer of the wicked, vicious, sinner with Vajr.
नमस्ते प्रवतो नपाद् यतस्तपः समूहसि। मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि॥
हे देव (पर्जन्य) आप अपने भीतर जल धारण किये हुए रहते हैं तथा अनुचित समय नीचे नहीं गिरने देते। हम आपको नमन करते हैं, क्योंकि आप हमारे भीतर तप को संगृहीत करते हैं। आप हमारे शरीर को सुखी करते हुए हमारी सन्तत्तियों को भी सुख शान्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, विद्युत् सूक्त 1.13.2)
Hey Parjany Dev! You hold water in the body and do not let it fall down. We salute you, since you hold-maintain the heat in the body. You grant comfort and solace to our progeny as well, keeping our body comfortable.
प्रवतो नपान्नम एवास्तु तुभ्यं नमस्ते हेतये तपुषे च कृण्मः।
विद्म ते धाम परमं गुहा यत् समुद्रे अन्तर्निहितासि नाभिः॥
ऊँचाई से न गिराने वाले हे पर्जन्य! आपको हम नमन करते हैं। आपके शस्त्र एवं तेज को हम नमस्कार करते हैं। आप जिस हदय रूपी गुफा में रहते हैं, वह हमें मालूम है। आप उस सागर में नाभि के समान प्रतिष्ठित रहते हैं।(अथर्ववेद, विद्युत् सूक्त 1.13.3)
Hey Parjany, not falling from a height! We salute you. We salute your Shastr & Tej. We are aware of the cave in the form of heart, where you live. You are established in that ocean as the navel.
यां त्वा देवा असृजन्त विश्व इषु कृण्वाना असनाय धृष्णुम्।
सा नो मृड विदथे गृणाना तस्यै ते नमो अस्तु देवि॥
हे अशने! शत्रुओं का विनाश करने हेतु सभी देवगणों ने शक्तिशाली 'शर' (बाण) के रूप में आपका निर्माण किया है। आकाश में गजरने वाले हे अशनि! हम आपको प्रणाम करते हैं। आप हमारे डर को विनष्ट करके हमें सुखी करें।(अथर्ववेद, विद्युत् सूक्त 1.13.4)
Hey Ashani! You have been evolved-made to destroy the enemies by the demigods-deities as an arrow. Hey Ashani, passing through the sky-space! We salute you. Destroy-remove our fear and make us comfortable.
अथर्ववेद, कुलपाकन्या सूक्त (1.14) :: ऋषि :- भृग्विङ्गिरा; देवता :- वरुण अथवा यम; छन्द :- 1 ककुम्मती अनुष्टुप्, 2, 4 अनुष्टुप्, 3 चतुष्यात् विराट् अनुष्टुप्।
भगमस्या वर्च आदिष्यधि वृक्षादिव स्रजम्। महाबुध्न इव पर्वतो ज्योक् पितृष्वास्ताम्॥
जिस प्रकार मनुष्य वृक्षों से पुष्प को ग्रहण करते हैं, उसी प्रकार इस कन्या (या विद्युत्) की सुन्दरता एवं तेज को हम स्वीकारते हैं। जिस प्रकार बृहत पहाड़ पृथ्वी पर अचल रहता है, उसी प्रकार यह कन्या भय से मुक्त होकर दीर्घकाल तक (अपने या मेरे) माता-पिता के गृह में रहें।(अथर्ववेद, कुलपाकन्या सूक्त 1.14.1)
The way humans get flowers from the trees, similarly we accept the beauty & Tej of this girl (electricity). The a huge mountain remain fixed-unmoved over the earth, similarly this girl should become free from fear and live for long in her house (either parents or in laws, husband).
एषा ते राजन् कन्या वधूर्ति धूयतां यम। सा मातुर्बध्यतां गृहेऽथो भ्रातुरथो पितुः॥
हे नियम पालक प्रकाशवान्! यह कन्या आपकी वधू बनकर आचरण करे। यह कन्या आपके गृह में निवास करे माता-पिता या भ्राता के गृह में सुख से वास करे।(अथर्ववेद, कुलपाकन्या सूक्त 1.14.2)
Hey follower of rules, regulations, law illuminated! Let this girl become your daughter in law and act virtuously. Let this girl reside in your house live comfortably with the parents or brothers.
एषा ते कुलपा राजन् तामु ते परि दद्यसि। ज्योक् पितृष्वासाता आ शीष्र्णः समोप्यात्॥
हे राजन्! यह कन्या सदैव आपके कुल की रक्षा करने वाली है। उसको हम आपको सौंपते हैं। यह सदैव (अपने अथवा मेरे) माता-पिता के गृह में रहे। श्रेष्ठ स्तर पर रहकर या ऊँचे विचारों से सुख एवं शान्ति बनाए रखे।(अथर्ववेद, कुलपाकन्या सूक्त 1.14.3)
Hey king! This girl will protect your hierarchy-clan. We hand over her to you. Let she remain in (your or mine) parents house. Maintain peace of the higher level of comforts and peace, having excellent virtuous thoughts-ideas.
असितस्य ते ब्रह्मणा कश्यपस्य गयस्य च।
अन्तः कोशमिव जामयोऽपि नह्यामि ते भगम्॥
हे कन्ये! आपके सौभाग्य को हम 'असित', 'गयु,' 'कश्यप' ऋषियों के मंत्र के माध्यम से उसी प्रकार बाँधकर सुरक्षा प्रदान करते हैं; जिस तरह घर की स्त्रियाँ अपने कपड़ों-गहनों आदि को छुपा कर सुरक्षित रखने की चेष्टा करती है।(अथर्ववेद, कुलपाकन्या सूक्त 1.14.4)
Hey girl! We grant you good luck-protection by the Mantrs of Asit, Gyau, Kashyap Rishis; similar to the house wives keeping their clothing & ornaments hidden for safety.
अथर्ववेद, पुष्टिकर्म सूक्त (1.15) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- सिन्धु समूह (वात, पतत्रिण पक्षी); छन्द :- अनुष्टुप्, 1 भुरिक् बृहती, 2 पथ्या पंक्ति।
सं सं स्रवन्तु सिन्धवः सं वाताः सं पतत्रिणः।
इमं यज्ञं प्रदिवो मे जुषन्तां संस्त्राव्येण हविषा जुहोमि॥
हवा एवं सभी प्रकार की नदियाँ एक साथ मिलकर सदैव प्रवाहित होती रहें और पक्षी भी अच्छी तरह से एक साथ मिलकर उड़ते रहें। देवता हमारे यज्ञ को स्वीकार करें, क्योंकि हम हविष्यों की आहुति देकर यज्ञ को पूर्ण करते हैं।(अथर्ववेद, पुष्टिकर्म सूक्त 1.15.1)
Ler air and all rivers flow together and birds too fly together. Let the demigods-deities accept our Yagy, since we accomplish the Yagy by making offerings.
इहैव हवमा यात म इह संस्स्रावणा उतेमं वर्धयता गिरः।
इहैतु सर्वो यः पशुरस्मिन् तिष्ठतु या रयिः॥
हे हवि स्वीकार करने वाले देवताओं! आप यहाँ हमारे इस यज्ञ में पदार्पण करें तथा इस संगठन का संवर्द्धन करें। स्तुतियों को स्वीकार करने पर आप इस हवि समर्पित करने वाले याजक को प्रजा, पशु, धन आदि से समृद्ध बनाएँ।(अथर्ववेद, पुष्टिकर्म सूक्त 1.15.2)
Hey demigods-deities accepting offerings! Come to our Yagy and strengthen this organisation. Having accepted the Stuties-prayers grant the Yajak subjects, animals wealth making him prosperous.
ये नदीनां संस्स्रवन्त्युत्सासः सदमक्षिताः। तेभिर्मे सर्वैः संस्रावैर्धनं सं स्त्रावयामसि॥
नदियों के जो अविनाशी स्त्रोत संयुक्त होकर बह रहे हैं, उन सभी स्रोतों से हम पशु, धन आदि प्राप्त करते हैं।(अथर्ववेद, पुष्टिकर्म सूक्त 1.15.3)
We avail our animals, wealth etc from river flowing out of the imperishable-inexhaustible sources.(25.03.2026)
ये सर्पिषः संस्रवन्ति क्षीरस्य चोदकस्य च। तेभिर्मे सर्वैः संस्त्रावैर्धनं सं स्त्रावयामसि॥
श्री, दूध और पानी की जो धाराएँ बह रही है, उन सभी धाराओं से हम धन-सम्पत्तियाँ आदि प्राप्त करते हैं।(अथर्ववेद, पुष्टिकर्म सूक्त 1.15.4)
Streams of wealth, milk and water are flowing awarding us prosperity.
अथर्ववेद, शत्रुबाधन सूक्त (1.16) :: ऋषि :- चातन; देवता :- अग्नि, इन्द्र, वरुण (3-4) दधत्य सीस; छन्द :- अनुष्टुप्, 4 ककुम्मती अनुष्टुप्।
ये ऽमावास्यां 3 रात्रिमुदस्थुजिमत्त्रिणः। अग्निस्तुरीयो यातुहा सो अस्मभ्यमधि ब्रवत्॥
अमावस्या की रात्रि पहर में मानवों को पीड़ा एवं हानि पहुँचाने वाले जो राक्षस आदि घूमते रहते हैं, उन राक्षसों का संहार करने वाले चतुर्थ अग्नि देव हमें उनके विषय में सूचना प्रदान करें।(अथर्ववेद, शत्रुबाधन सूक्त 1.16.1)
During the dark night-Amavasya demons roam to torture-tease the humans. Let the fourth Agni Dev destroyer of demons, inform us about them.
सीसायाध्याह वरुणः सीसायाग्निरुपावति। सीसं म इन्द्रः प्रायच्छत् तदङ्ग यातुचातनम्॥
वरुण देव सीसे के विषय में कहते हैं कि अग्नि देवता ने उस 'सीसे' को मानवों का रक्षक कहा है। ऐश्वर्यवान् देवराज इन्द्र ने हमें 'सीसा' देते हुए कहा है हे आत्मीय! देवगणों के द्वारा दिया गया यह 'सीसा' राक्षसों का विनाश करने वाला है।(अथर्ववेद, शत्रुबाधन सूक्त 1.16.2)
Varun Dev says that the mirror is termed as the protector of humans by Agni Dev. Grendeourous Devraj Indr gave us the mirror and said that; hey intimate-close to heart! Mirror granted by the demigods-deities is the destroyer of demons.
इदं विष्कन्धं सहत इदं बाधते अत्त्रिणः। अनेन विश्वा ससहे या जातानि पिशाच्याः॥
यह 'सीसा' बाधा उत्पन्न करने वालों का निष्कासन करता है एवं राक्षसों को पीड़ित करता है अर्थात् उनका संहार करता है। इस 'सीसे' के द्वारा हम राक्षसों के सम्पूर्ण कुल को नष्ट कर सकते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुबाधन सूक्त 1.16.3)
सीसा (Lead) :: नरम, भारी और अत्यधिक लचीली (malleable) नीली-सफेद रंग की धातु।
Mirror removes those who create obstructions and torture the demons. We can destroy the clan-hierarchy of the demons completely.
यदि नो गां हंसि यद्यश्वं यदि पूरुषम्। तं त्वा सीसेन विध्यामो यथा नोऽसो अवीरहा॥
हे शत्रुओं! यदि तुम हमारी गायें, घोड़ों एवं मानवों का विनाश करते हो, तो हम तुम्हारा इस 'सीसे' के द्वारा संहार करते हैं, जिसके परिणाम स्वरूप तुम हमारे शूरवीरों का विनाश न कर सको।(अथर्ववेद, शत्रुबाधन सूक्त 1.16.4)
Hey enemies!If your destroy our cows, horses and humans, we will strike you with mirror so that you are unable to destroy our brave warriors.
अथर्ववेद, रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त (1.17) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- योषित्, लोहितवासस, हिरा; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 भूरिक् अनुष्टुप्, 4 त्रिपदार्षी गायत्री।
अमूर्या यन्ति योषितो हिरा लोहितवाससः। अभ्रातर इव जामयस्तिष्ठन्तु हतवर्चसः॥
शरीर में सुर्ख वर्ण के रुधिर का वहन करने वाली जो योषा-धमनी हैं, वे गतिहीन हो जाएँ। जैसे भ्राता की अनुपस्थिति में निस्तेज बहनें बाहर नहीं जातीं, वैसे ही योषा (धमनियों) का रुधिर बाहर न निकले।(अथर्ववेद, रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त 1.17.1)
Let the carrier of pure-red blood, arteries become motionless. The way sisters do not come out in the absence of brothers, similarly blood should not ooze-come out of the arteries.
तिष्ठावरे तिष्ठ पर उत त्वं तिष्ठ मध्यमे। कनिष्ठिका च तिष्ठति तिष्ठादिद् धमनिर्मही॥
हे शरीर के नीचे, ऊपर एवं मध्य भाग वाली योषा (धमनियाँ) आप स्थूल (गतिहीन) हो जाएँ और छोटी-बड़ी धमनियाँ भी रुधिर का बहाव रोक कर स्थूल हो जाएँ।(अथर्ववेद, रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त 1.17.2)
Hey arteries in the body! You should become motionless and become thick to block the passing out of blood from the body.
शतस्य धमनीनां सहस्रस्य हिराणाम्। अस्थुरिन्मध्यमा इमाः साकमन्ता अरंसत॥
सैकड़ों धमनियों एवं सैकड़ों नाड़ियों के बीच में मध्यम नाड़ियाँ स्थूल हो गई हैं तथा इसके साथ ही साथ अन्तिम धमनियाँ भी ठीक हो गई हैं, जिसका रुधिर का बहना रूक गया है।(अथर्ववेद, रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त 1.17.3)
Middle nerve has become thick amongest the hundreds of arteries and nerves and with it, the last arteries have become perfect, leading to blockage of blood oozing out of the body.
परि वः सिकतावती धनूर्बृहत्यक्रमीत्। तिष्ठतेलयता सु कम्॥
हे नाड़ियों! आपको रज नाड़ी ने एवं धनुष के समान वक्र धनु नाड़ी ने व बृहती नाड़ी ने चारों ओर से व्याप्त कर लिया है। अतः आप रुधिर का बहाव रोक कर इस रोगी को सुख प्रद्रान करें।(अथर्ववेद, रुधिरस्रावनिवर्तनधमनीबन्धन सूक्त 1.17.4)
Hey nerves! You have been surrounded by the Raj, Dhanu and brahati Nadi from all sides. Grant solace-comfort to the patient by stopping the blood flow out of the body.
अथर्ववेद, अलक्ष्मीनाशन सूक्त 1.18) :: ऋषि :- द्रविणोदा; देवता :- विनायक; छन्द :- 1 उपरिष्टाद् विराट् बृहती, 2 निवृत् जगती, 3 विराट् आस्तारपंक्ति, त्रिष्टुप्, 4 अनुष्टुप्।
निर्लक्ष्म्यं ललाम्यं 1 निररातिं सुवामसि।
अथ या भद्रा तानि नः प्रजाया अरातिं नयामसि॥
पटल (माथे) पर स्थित अशुभ लक्षणों को हम पूर्ण रूपेण दूर करते हैं एवं जो लाभकारी लक्षण हैं, उन्हें हम अपने व अपनी सन्तानों हेतु ग्रहण करते हैं। इसके अतिरिक्त कुलक्षणों को विनष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, अलक्ष्मीनाशन सूक्त 1.18.1)
We completely remove the unfortunate signs present over the forehead. We accept the fortunate sign for the welfare of our progeny. Any other unfortunate sign is vanished by us.
निररणिं सविता साविषक् पदोर्निर्हस्तयोर्वरुणो मित्रो अर्यमा।
निरस्मभ्यमनुमती रराणा प्रेमां देवा असाविषुः सौभगाय॥
हमारे हस्त एवं पैरों के अशुभ लक्षणों को मित्र एवं वरुण, सविता व अर्यमा देव दूर करें। सबको प्रेरित करने वाली अनुमति भी इच्छित फल देती हुई शरीर के अशुभ लक्षणों को दूर करे। देवगणों ने भी इसी सौभाग्य को प्रदान करने के लिए प्रेरणा दी है।(अथर्ववेद, अलक्ष्मीनाशन सूक्त 1.18.2)
Let Mitr, Varun, Savita and Aryma Dev remove the inauspicious signs present over our hands and legs. Let all inspiring permission should grant auspicious results removing the inauspicious signs. Demigods-deities have inspired to grant good luck.
यत्त आत्मनि तन्वां घोरमस्ति यद्वा केशेषु प्रतिचक्षणे वा।
सर्वं तद् वाचाप हन्मो वयं देवस्त्वा सविता सूदयतु॥
हे अशुभ लक्षणों वाले मनुष्यों! आपकी आत्मा, शरीर, बाल एवं नेत्रों में जो वीभत्सता का कुलक्षण है, उन्हें हम मन्त्रोच्चारण द्वारा दूर करते हैं। सविता देव आपका कल्याण करे, आपको समृद्धशाली बनाएँ।(अथर्ववेद, अलक्ष्मीनाशन सूक्त 1.18.3)
Hey humans having in auspicious signs! We remove the in auspicious disgusting-repulsive characters-signs over your soul, body, hair and eyes by using Mantropchar. Let Savita Dev resort to your welfare and make you prosperous.
रिश्यपदीं वृषदतीं गोषेधां विधमामुत। विलीढ्यं ललाम्यं1 ता अस्मन्नाशयामसि॥
ऐसी नारी जिसका पैर मृग के सदृश, दंत वृषभ के सदृश, चाल गौ के सदृश एवं वाणी निष्ठुर है, हम उसके पटल पर स्थित अशुभ लक्षणों को मन्त्रों द्वारा विनष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, अलक्ष्मीनाशन सूक्त 1.18.4)
A woman whose foot is like the deer, tooth like the bull, movement like he cow and voice is cruel, we remove the in auspicious signs present over her head by Mantropchar.(26.03.2026)
अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.19) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- ईश्वर (1 इन्द्र, 2 मनुष्यों के बाण, 3 रुद्र, 4 विश्वदेवा; छन्द :- अनुष्टुप्, 2 पुरस्ताद् बृहती, 3 पथ्या पंक्ति।
मा नो विदन् विव्याधिनो मो अभिव्याधिनो विदन्।
आराच्छरव्या अस्मद्विषूचीरिन्द्र पातय॥
हे इन्द्र! सर्वत्र फैल जाने वाले बाणों को आप हमारे समीप न आने दें अर्थात् हमसे दूर करें। आयुधों से आहत करने वाले शत्रुओं को हमारे समीप न आने दें एवं चारों तरफ से आक्रमण करने वाले शत्रुओं को भी हमारे समीप न आने दें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त 1.19.1)
Hey Devraj Indr! Do not let the arrows come to us. Do not let the enemies harmed by the weapons. Do not let the enemies attacking us from all directions-sides.
विष्वञ्चो अस्मच्छरवः पतन्तु ये अस्ता ये चास्याः।
दैवीर्मनुष्येषवो ममामित्रान् वि विध्यत॥
चारों ओर व्याप्त शर जो सभी छोड़े जा चुके है एवं जो छोड़े जाने वाले है, वे सभी हमारे स्थान से दूर जाकर गिरे। हे पुरुषों के द्वारा चलाए जाने वाले दैवी बाणों! आप हमारे शत्रुओं का विनाश कर डालें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त 1.19.2)
Arrow either shot or going to be shot from all directions should fall away from us. Hey divine arrows shot by the humans! Destroy our enemies.
यो नः स्वो यो अरणः सजात उत निष्ट्यो यो अस्माँ अभिदासति।
रुद्रः शरव्य यैतान् ममामित्रान् वि विध्यतु॥
जो हमारे अपने लोग हैं अथवा दूसरे अन्य लोग हों या अपनी जाति वाले हों अथवा दूसरी जाति वाले हीन लोग हों; यदि वे हमारे ऊपर आघात करके हमें अपना दास बनाने की चेष्टा करें, तो उन शत्रुओं को रुद्र देव अपने बाणों से छलनी (विदीर्ण) कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त 1.19.3)
Let Rudr Dev penetrate arrows in the bodies of those who are our own people or any one else. Let those who attack us or those who belong to other-lower castes, religion, country trying to enslave us should also be pierced with the arrows by Rudr Dev.
यः सपत्नो योऽसपत्नो यश्च द्विषञ्छपाति नः। देवास्तं सर्वे धूर्वन्तु ब्रह्म वर्म ममान्तरम्॥
जो हमारे प्रकट एवं छिपे हुए शत्रु हैं, वे यदि ईर्ष्या भाव से हमारा विनाश करने का प्रयास करते हैं या हमें अभिशापित करते हैं, उन शत्रुओं का सभी देवगण संहार कर दें। ब्रह्मज्ञान कवचरूपी मंत्र हमें संरक्षण प्रदान करें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त 1.19.4)
Our hidden-secret enemies, who either curse or envy us should be destroyed by the demigods-deities. Grant us protective shield-armour in the form of Brahm Gyan Mantr.
अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.20) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 सोम, मरुद्गण, 2 मित्रा वरुण, 3 वरुण, 4 इन्द्र; छन्द :- अनुष्टपु, 1 त्रिष्टुप्।
अदारसृद् भवतु देव सोमास्मिन् यज्ञे मरुतो मृडता नः।
मा नो विददभिभा मो अशस्तिर्मा नो विदद् वृजिना द्वेष्या या॥
हे सोमदेव! आपस में वैमनस्य उत्पन्न करने का कर्म हमसे न हो। हे मरुतो! हम जिस हवि को संपन्न कर रहे हैं, आप उसमें हमें उत्तम फल प्रदान करके प्रसन्न करें, जिसके फलस्वरूप हमारे समीप आता हुआ रिपु (शत्रु) हमारे निकट न आ सके एवं हमारा वैभव भी कम न हो। जो ईष्या भाव से युक्त पापकर्म हैं, वे भी हमारे निकट न आ सकें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.20.1)
Hey Som Dev! We should not try to create animosity. Hey Marud Gan! Grant us best reward of the offerings. As a result of it the enemy should not be able to approach us and our grandeur should be maintained. Those sufferings from enmity for us should keep off from us.
यो अद्य सेन्यो वधोऽघायूनामुदीरते। युवं तं मित्रावरुणावस्मद् यावयतं परि॥
हे मित्र व वरुण देवताओं! शत्रुओं द्वारा संधान किए गए अस्त्र-शस्त्र को आप हमसे दूर रखें ताकि वह हमें स्पर्श न कर सकें। आप युद्ध में हिंसा की इच्छा से संधान किए गए शत्रुओं के आयुधों को हमसे दूर करने का प्रयत्न करें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.20.2)
Hey Mitr & Varun Dev! Keep the weapons targeted over us so that they are unable to touch us. Try to keep the weapons of the enemy meant for harming us.
इतश्च यदमुतश्च यद् वधं वरुण यावय। वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्॥
हे वरुण देव! पास में खड़े हुए एवं दूरस्थ शत्रुओं के जो अस्त्र विनाश करने के लक्ष्य से हमारे
सम्मुख आ रहे हैं, उन संधान किए गए आयुधों को आप हमसे अलग करें। हे वरुण देव! शत्रुओं से प्राप्त न हो पाने वाले सुखों आनन्दों को आप हमें प्रदान करें और उनके भयावह अस्त्रों से हमारी रक्षा करें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.20.3)
Hey Varun Dev! Keep off the weapons targeted over us by the enemies close or away from us. Hey Varun Dev! Grant the comforts-pleasure meant for the enemies to us and protect us from the furious-dangerous weapons of the enemies.
शास इत्था महाँ अस्यमित्रसाहो अस्तृतः। न यस्य हन्यते सखा न जीयते कदाचन॥
हे राजन् इन्द्र देव! आपकी शत्रुओं को पराजित करने की क्षमता महान् व विलक्षण है, आपके सखा की भी कभी मृत्यु नहीं होती तथा न ही कभी वह अपने शत्रुओं से पराजित होते हैं।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.20.1)
Hey Devraj Indr! Your power to defeat the enemy is amazing & great. Your companions should neither die nor defeated.
अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.21) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- इन्द्र; छन्द :- अनुष्टुप्।
स्वस्तिदा विशां पतिर्वृत्रहा विमृधो वशी। वृषेन्द्रः पुर एतु नः सोमपा अभयङ्करः॥
इन्द्र देवता सभी का उद्धार करने वाले, मानव जनों का पालन-पोषण करने वाले, वृत्र असुर का संहार करने वाले, संग्राम करने वाले शत्रुओं को वश में करने वाले, उपासकों की इच्छापूर्ति करने वाले सोमरस का सेवन करने वाले एवं निर्भयता प्रदाता हैं। वे हमारे सम्मुख उपस्थित हों।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.21.1)
Devraj Indr is the savior of all, nourish-nurture all, destroyer of demon Vratr, controls the enemy in the war, drink Somras which accomplish the desires of the worshipers and grant fearlessness. Let him invoke before us.
वि न इन्द्र मृधो जहि नीचा यच्छ पृतन्यतः। अधमं गमया तमो यो अस्माँ अभिदासति॥
हे इन्द्र देवता! आप हमारे शत्रुओं का विनाश करें। हमारी सेनाओं से परास्त हुए शत्रुओं को मुख लटकाए हुए भागने पर विवश कर दें। हमें अपने आधीन करने की कामना करने वाले शत्रुओं को गर्त में भेज दें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.21.2)
Hey Indr Dev! Destroy our enemies. Compel the defeated enemies with their lowered mouth to run away. Send the enemies who wish to keep us in their control to hell.
वि रक्षो वि मृधो जहि वि वृत्रस्य हनू रुज। वि मन्युमिन्द्र वृत्रहन्नमित्रस्याभिदासतः॥
हे इन्द्र देवता! आप असुरों का संहार करें। हिंसक प्रवृति रखने वाले दुष्टों का विनाश करें। वृत्रासुर का जबड़ा तोड़ दें। हे शत्रुओं का संहार करने वाले इन्द्र देव! आप उन शत्रुओं के क्रोध व दर्प को समाप्त कर दें, जो हमारा विनाश करने की इच्छा रखते हैं।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.21.3)
Hey Indr Dev! Destroy the demons-giants. Destroy the violent wicked-vicious people. Break the jaws of Vratra Sur. Hey destroyer of the enemies; Indr Dev! Destroy the ego and anger of the enemies who wish to destroy us.
अपेन्द्र द्विषतो मनोऽप जिज्यासतो वधम्।
से वि महच्छर्म यच्छ वरीयो यावया वधम्॥
हे इन्द्र देव! आप शत्रुओं की कामनाओं का हनन करें। हमारा विनाश करने की इच्छा रखने वाले शत्रुओं का संहार करें। शत्रुओं के आवेश से हमारी रक्षा करते हुए उत्तम सुख प्रदान करें। शत्रुओं द्वारा मिलने वाली मृत्यु का निवारण करें।(अथर्ववेद, शत्रु निवारण सूक्त (1.21.4)
Hey Devraj Indr! Do not let the desires-wishes of the enemies fulfilled. Destroy the enemies who wish to destroy us. Protect us from the charge-surge, huff of the enemies. Eliminate our death from the enemies.(27.03.2026)
अथर्ववेद, हृद्रोगकामलानाशन सूक्त (1.22) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- सूर्य, हरिमा और हृद्रोग; छन्द :- अनुष्टुप्।
Hey patient! We treat-cure your heart, lings, Gallbladder, ribs, kidneys, spleen, liver and destroy Tuberculosis (TB).(16.04.2026)
अनु सूर्यमुदयतां हृद्योतो हरिमा च ते। गो रोहितस्य वर्णेन तेन त्वा परि दध्मसि॥
हे रोगी मनुष्य! हृदय का रोग होने के कारण जो जलन आपके हृदय में होती हैं एवं पीलिया रोग होने के कारण आपके शरीर का जो पीलापन है, वह सूर्य की तरफ चला जाए। रक्त वर्ण (लाल रंग) की गौओं या सूर्य की लाल रंग की किरणों से हम आपको सब तरह से बलवान् बनाते हैं।(अथर्ववेद, हृद्रोगकामलानाशन सूक्त 1.22.1)
Hey diseased person! Let the etching caused due to heart disease in the heart and the yellowishness caused by Jaundice should move towards the Sun. Red colour of the Sun rays and cows make us strong in all possible manners.
परि त्वा रोहितैर्वणैर्दीर्घायुत्वाय दध्मसि। यथायमरपा असदथो अहरितो भुवत्॥
हे रोग पीड़ित मनुष्य! लम्बी आयु प्राप्त करने के निमित्त हम आपको लोहित वर्ण (लाल रंग) से आवृत करते हैं, जिसके फलस्वरूप आप रोग मुक्त होकर पाण्डु रोग (पीलियारोग) से मुक्त हो सकें।(अथर्ववेद, हृद्रोगकामलानाशन सूक्त 1.22.2)
Hey diseased person! We cover you with red colour for attaining long life so that you become free from jaundice.
या रोहिणीर्देवत्या 2 गावो या उत रोहिणीः। रूपंरूपं वयोवयस्ताभिष्ट्वा परि दध्मसि॥
देवगणों की जो लाल रंग की गौएँ है या लाल वर्ण की किरणें हैं, उनके विभिन्न स्वरूपों एवं आयु बढ़ाने वाले गुणों से आपको उपचारित करते हैं।(अथर्ववेद, हृद्रोगकामलानाशन सूक्त 1.22.3)
Red coloured-skinned cows and red coloured rays of the demigods and their various forms should increase your age and treat you for the disease.
शुकेषु ते हरिमाणं रोपणाकासु दध्मसि। अथो हारिद्रवेषु ते हरिमाणं नि दध्मसि॥
हम अपने पाण्डुरोग या शरीर को कमजोर करने वाले रोग को शुकों, पेड़ों तथा वनस्पतियों में प्रतिष्ठित करते हैं।(अथर्ववेद, हृद्रोगकामलानाशन सूक्त 1.22.4)
We transfer-move our jaundice and diseases weakening the body to parrots, trees and the vegetation.
अथर्ववेद, कुष्ठ नाशन सूक्त (1.23) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- असिक्नी वनस्पति; छन्द :-अनुष्टुप्।
नक्तंजातास्योषधे रामे कृष्णे असिक्नि च। इदं रजनि रजय किलासं पलितं च यत्॥
हे रामा-कृष्णा एवं असिक्नी औषधियों! आप सभी रात्रि पहर में उत्पन्न हुई हैं। वर्ण प्रदान करने वाली हे औषधियों! आप गलितकुष्ठ व्याधि (रोग) एवं श्वेतकुष्ठ व्याधि से पीड़ित व्यक्ति को वर्ण प्रदान करो।(अथर्ववेद, कुष्ठ नाशन सूक्त 1.23.1)
असिक्नी :: शंखिनी-Shankhpushpi, Aloes.
गलित कुष्ठ :: Hansen's Disease, Advanced Leprosy.
श्वेतकुष्ठ :: Leucoderma.
Hey Rama-Krashna and Asivani medicines! You evolved-grow at night. Hey medicine granting body colour! Grant the real colour of skin to the person who has suffered from
किलासं च पलितं च निरितो नाशया पृषत्।
आ त्वा स्वो विशतां वर्णः परा शुक्लानि पातय॥
हे औषधियों! आप कुष्ठ सफेद कुष्ठ रोग होने के कारण पड़ने वाले श्वेत धब्बों को दूर कर दें, ताकि इस रोग से पीड़ित मानव के शरीर में पहले जैसी लालिमा प्रवेश हो जाए। आप श्वेत धब्बों से इस मानव को मुक्त करके अपना वर्ण प्रदान करें।(अथर्ववेद, कुष्ठ नाशन सूक्त 1.23.2)
Hey medicines! Remove Leucoderma and the white spots caused by it so that the diseased attain reddishness as usual-before. Get the body freed from white spots and attain the original colour of the skin.
असितं ते प्रलयनमास्थानमसितं तव। असिक्न्यस्योषधे निरितो नाशया पृषत्॥
हे नील औषधे! आपके उत्पन्न होने की जगह कृष्ण वर्ण (काला रंग) है एवं जिस पात्र में आप विराजमान है, वह भी कृष्ण वर्ण का है। हे औषधे! आप स्वयं श्याम रंग वाली हैं। अतः उबटन आदि से इस व्याधिग्रस्त मनुष्य के कुष्ठ आदि दागों को विनष्ट कर दें।(अथर्ववेद, कुष्ठ नाशन सूक्त 1.23.3)
Hey blue medicine! You place of origin is black and the pot in which you grew too is black. Hey medicine! You possess black colour. Hence, remove the spots caused by Leucoderma-disease by using empasm.
अस्थिजस्य किलासस्य तनूजस्य च यत् त्वचि।
दूष्या कृतस्य ब्रह्मणा लक्ष्म श्वेतमनीनशम्॥
शरीर में स्थित अस्थि एवं चर्म के बीच के मांस में व चर्म पर जो सफेद कुष्ठ के दाग हैं, उसे हमने ब्रह्मज्ञान आदि के प्रयोग द्वारा दूर कर दिया है।(अथर्ववेद, कुष्ठ नाशन सूक्त 1.23.4)
We have removed the Leucoderma spots present between the bones and the skin and flesh & skin by using Brahm Gyan etc.
अथर्ववेद, श्वेत कुष्ठ नाशन सूक्त (1.24.1)
अथर्ववेद, श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त (1.24) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- आसुरी वनस्पति; छन्द :- अनुष्टुप्, 2 निद्युत् पथ्या पंक्ति।
सुपर्णो जातः प्रथमस्तस्य त्वं पित्तमासिथ। तदासुरी बुधा जिता रूपं चक्रे वनस्पतीन्॥
हे औषधे! सबसे पहले आप सुपर्ण पक्षी के वित्तरूप में थीं। शक्तिशाली सुपर्ण के साथ युद्ध में विजय प्राप्त करके उस पित्त को औषधि का रूप दिया, वही रूप नील आदि औषधि में विद्यमान् किया है।(अथर्ववेद, श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त 1.24.1)
Hey medicie! Earlier you were present in the form-appearance of Suparn bird. After fighting with mighty Suparn you rejected it as Pitt medicine which is now present as Neel etc medicines.
आसुरी चक्रे प्रथमेदं किलासभेषजमिदं किलासनाशनम्।
अनीनशत् किलासं सरूपामकरत् त्वचम्॥
उस आसुरी (शक्तिशाली) माया ने नील आदि औषधि को कुष्ठ रोग का निवारण करने वाली औषधि के रूप में निर्मित किया था। अतः यह औषधि कुष्ठ रोग का नाश करने वाली है। योग करने के पश्चात् इसने कुष्ठ रोग का विनाश किया। इस औषधि ने दूषित चर्म को रोग से मुक्त चर्म के सदृश वर्ण में परिवर्तित कर दिया।(अथर्ववेद, श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त 1.24.2)
The demonic cast converted the Neel (medicine) into the medicine for Leucoderma cure. This medicine destroys Leucoderma. After performing Yog it freed the skin from disease and granted it original colour.
सरूपा नाम ते माता सरूपो नाम ते पिता। सरूपकृत् त्वमोषधे सा सरूपमिदं कृधि॥
हे औषधे! आपकी माता आपके सदृश रंग वाली हैं एवं आपके पिता भी आपके सदृश रंग वाले हैं तथा आप भी समान स्वरूप वाले हैं। अतः हे नील औषधे! आप इस कुष्ठ रोग के कारण त्वचा के दूषित रंग को अपने सदृश वर्ण वाला कर दें।(अथर्ववेद, श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त 1.24.3)
नील :: आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी, जिसका उपयोग त्वचा रोगों, बालों की देखभाल (सफेद बालों को काला करना), पेट की समस्याओं, और सूजन-रोधी (anti-inflammatory) औषधि के रूप में किया जाता है। इस पौधे के पत्तों, जड़ों और फूलों का उपयोग खांसी, सांस लेने में तकलीफ और त्वचा पर घाव या जलन को शांत करने के लिए किया जाता है; Indigofera tinctoria.
Hey medicine! You along with the parents possess the same colour. Hey Neel medicine make the contaminated colour suffering from Leucoderma like yours.
श्यामा सरूपङ्करणी पृथिव्या अध्युद्धृता। इदमू षु प्र साधय पुना रूपाणि कल्पय॥
हे काले रंग वाली औषधे! आप सदृश स्वरूप बनाने वाली हो। आसुरी माया ने आपको पृथ्वी के ऊपर उत्पन्न किया है। आप इस कुष्ठ रोग से पीड़ित शरीर को अच्छी प्रकार रोग शून्य करके पहले के समान वर्ण वाला बना दें।(अथर्ववेद, श्वेतकुष्ठ नाशन सूक्त 1.24.4)
Hey medicine having black colour! You turn the colour like yours i.e., you are the creator of the likeness. Demonic cast has evolved you over the earth. Make the body free from Leukoderma granting it its original colour.(28.03.2026)
अथर्ववेद, ज्वर नाशन सूक्त (1.25) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता :- यक्ष्मनाशन अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, 2-3 विरागर्भात्रिष्टुप्, 4 पुरोऽनुष्टुप् त्रिष्टुप्।
यदग्निरापो अदहत् प्रविश्य यत्राकृण्वन् धर्मधृतो नमांसि।
तत्र त आहुः परमं जनित्रं स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्॥
हे ज्वर! जिस स्थान पर धर्म अनुसरण करने वाले सदाचारी मनुष्य प्रणाम करते हैं, जहाँ अग्नि देवता प्रवेश करके प्राण धारण करने वाले जल तत्त्व को जलाते हैं, वही स्थान आपकी (ज्वर की) उत्पति का वास्तविक स्थान है, ऐसा आपके विषय में कहा जाता है। इसलिए हे ज्वर! यह सब अच्छी प्रकार से जानकर आप हमें व्याधि से मुक्त कर दें।(अथर्ववेद, ज्वर नाशन सूक्त 1.25.1)
Hey fever! The place occupied by the virtuous people following Dharm, there Agni Dev enter and burn the water component. That place is the real place of your origin, this is what has been said about you. Hence, hey fever! Having understood this, relieve us from the ailment.
यद्यर्चिर्यदि वासि शोचिः शकल्येषि यदि वा ते जनित्रम्।
ह्रुड्डुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्॥
हे जीवन को पीड़ा (कष्ट) देने वाले ज्वर! यदि आप अग्नि के समान गुण से सम्पत्र हैं एवं शरीर को पीड़ा पहुँचाने वाले हैं, यदि आप लकड़ी के टुकड़ों की इच्छा करने वाले अग्नि देवता से उत्पन्न हुए है, तो आप 'हूड', नाम वाले हैं। हे पीलापन उत्पन्न करने वाले ज्वर! आप अपने कारण अग्नि देवता को ज्ञात करते हुए हमें मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, ज्वर नाशन सूक्त 1.25.2)
Hey fever giving pain to life! If you possess traits like Agni Dev and resort to paining body, if you have evolved from Agni Dev desirous of pieces of wood, you are termed Hood. Hey fever causing yellowishness! Relieve us knowing-identifying Agni Dev, causing-producing you.
यदि शोको यदि वाभिशोको यदि वा राज्ञो वरुणास्यासि पुत्रः।
हृूड्डुर्नामासि हरितस्य देव स नः संविद्वान् परि वृङ्ग्धि तक्मन्॥
हे जीवन को कष्टप्रद बनाने वाले ज्वर! यदि आप शरीर को अत्यधिक कष्ट देने वाले हैं या सभी स्थान पर पीड़ा को जन्म देने वाले हैं अथवा दुराचारियों को दण्ड देने वाले वरुण देव के पुत्र हैं, तो भी आपका नाम 'हृड्डु' है। आप अपने कारण अग्नि देव को जानकर हमें मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, ज्वर नाशन सूक्त 1.25.3)
Hey fever making the life painful! If you give excessive pain to body, give pain at all places or you are the son of Varun who punish the wicked, then you are named Hraddu. You should know Agni Dev, the cause-reason behind you and relieve us.
नमः शीताय तक्मने नमो रूराय शोचिषे कृणोमि।
यो अन्येद्युरुभयद्युरभ्येति तृतीयकाय नमो अस्तु तक्मने॥
शीत को उत्पन्न करने वाले शीत ज्वर को हम नमस्कार करते हैं और रूखे ताप को जन्म देने वाले ज्वर को भी हम नमस्कार करते हैं। एक दिन के अंतराल पर दूसरे दिन के अंतराल पर एवं तीसरे दिन के अंतराल पर आने वाले शीत ज्वर को हम नमस्कार करते हैं।(अथर्ववेद, ज्वर नाशन सूक्त 1.25.4)
We salute the fever causing cold-shivering and the fever which cause dry temperature. We salute the fever which which repeats after an interval of one, two or three days.
अथर्ववेद, शर्म (सुख) प्राप्ति सूक्त (1.26) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- 1 देवा, 2 इन्द्र, भग, सविता, 3-4 मरुद्गण; छन्द :- गायत्री, 2 एकावसाना त्रिपदा साम्नी त्रिष्टुप्, 4 एकावसाना पादनिवृत् गायत्री।
आरे 3 सावस्मदस्तु हेतिर्देवासो असत्। आरे अश्मा यमस्यथ॥
हे देवगणों! शत्रुओं (शत्रुओं) द्वारा संधान किए गए ये आयुध हमारे निकट न आएँ एवं हमारी मृत्यु की कामना से आपके द्वारा फेंके गये अभिमंत्रित पत्थर भी हमारे निकट न पहुँचे।अथर्ववेद, शर्म (सुख) प्राप्ति सूक्त (1.26.1)
Hey demigods! Weapons launched by the enemy should not reach us. Those weapons launched at us with the desire of killing us too should not reach us, in addition to the stones treated-charmed with Mantrs.
सखासावस्मभ्यमस्तु रातिः सखेन्द्रो भगः सविता चित्रराधाः॥
दानवीर, धन-वैभव से युक्त सविता देव एवं विचित्र धन से युक्त इन्द्र देव और भग देव हमारे मित्र हों।अथर्ववेद, शर्म (सुख) प्राप्ति सूक्त (1.26.2)
Let donor, possessing wealth and grandeur Savita Dev, Devraj Indr & Bhag Dev having amazing wealth should be our friends.
यूयं नः प्रवतो नपान्मरुतः सूर्यत्वचसः। शर्म यच्छाथ सप्रथाः॥
अपने आप की स्वयं रक्षा करने वाले, धरती पर सूर्य के द्वारा संचित जल को धारण करने वाले हे सूर्य के सदृश तेज से संपन्न मरुतो! आप सभी हमें अधिक मात्रा में सुख प्रदान करें।अथर्ववेद, शर्म (सुख) प्राप्ति सूक्त (1.26.3)
Hey Marud Gan protecting yourself, possessing the Tej like the Sun, who support the water over the earth; grant us comforts-pleasure in excess quantity.
सुषूदत मृडत मृडया नस्तनूभ्यो मयस्तोकेभ्यस्कृधि॥
इन्द्र आदि देवगण हमें अपनी शरण में लेकर हमें आनन्दित करें। वे हमारे शरीरों को रोग से मुक्त करें एवं हमारे संतानों को हर्षित करें।अथर्ववेद, शर्म (सुख) प्राप्ति सूक्त (1.26.4)
Devraj Indr & other demigods should grant us shelter and pleasure-comforts. They should relieve our bodies from diseases and gladden our progeny.
अथर्ववेद, स्वस्त्ययन सूक्त (1.27) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- चन्द्रमा और इन्द्राणी; छन्द :- अनुष्प, 1 पथ्या पंक्ति।
अमूः पारे पृदाक्वस्त्रिषप्ता निर्जरायवः।
तासां जरायुभिर्वयमक्ष्या 3 वपि व्ययामस्यघायोः परिपन्थिनः॥
सर्वलोक में जिन सर्पों की इक्कीस जातियाँ (त्रिसप्त) रहती हैं, उनके जरायु (केंचुलियों) से हम युद्ध में उपस्थित क्षति पहुँचाने वाले शत्रुओं के नेत्रों को ढाँकते हैं।(अथर्ववेद, स्वस्त्ययन सूक्त 1.27.1)
21 varieties-castes of snakes live in the Sarv Lok, who's slough-snake skin is used by us to cover-close the eyes of the enemies.
विषूच्येतु कृन्तती पिनाकमिव बिभ्रती। विष्वक् पुनर्भुवा मनोऽ समृद्धा अघायवः॥
शत्रुओं का संहार करने में समर्थ पिनाक (शिव धनुष) की तरह शस्त्रों को धारण करके शत्रुओं को काटने वाली हमारी सेनाएँ चारों ओर से आगे बढ़े, जिससे फिर से इकट्ठा हुई शत्रुओं के सेना के चित्त तितर-बितर हो जाए एवं उसके राजा सदैव के लिए निर्धन हो जाएँ।(अथर्ववेद, स्वस्त्ययन सूक्त 1.27.2)
Let our armies capable of destroying the enemy by Pinak-Shiv Dhanush move ahead from all directions and disperse and their king should become poor for ever.
न बहवः समशकन् नार्थका अभि दाधृषुः। वेणोरद्गा इवाभितोऽ समृद्धा अघायवः॥
बहुत अधिक शत्रु भी हम पर विजय प्राप्त नहीं कर सकते एवं कम शत्रु भी हमारे समक्ष आने का प्रयास नहीं कर सकते। जिस प्रकार बांस की शाखा अकेले दुर्बल होती है, उसी प्रकार कुटिलकृत्य में लगे हुए मनुष्य धन से हीन हो जाएँ।(अथर्ववेद, स्वस्त्ययन सूक्त 1.27.3)
Too many enemies dare not win us and enemies in small numbers dare not approach us. The way a single branch of bamboo is weak, similarly those involved in wicked-vicious deeds should become penniless.
प्रेतं पादौ प्र स्फुरतं वहतं पृणतो गृहान्। इन्द्राण्येतु प्रथमाजीतामुषिता पुरः॥
हे दोनों पादों (पैरों)! आप तीव्र गति से जाकर आगे बढ़े एवं मनचाहा फल प्रदान करने वाले मनुष्य के घर तक हमें ले जाएँ, जिन पर कोई भी विजय न प्राप्त कर सके एवं न ही उनके अभिमान कोई लूट पाए, (इन्द्राणी) सबके आगे-आगे चलें।(अथर्ववेद, स्वस्त्ययन सूक्त 1.27.4)
Hey feet! Move with fast speed and take us to the person to have desires good-boons from him; who can not be won by anyone and who's ego can not be crushed by any one. Let Devi Shuchi-Indrani walk ahead of us.
अथर्ववेद, रक्षोघ्न सूक्त (1.28) :: ऋषि :- चातन; देवता :- 1-2 अग्नि, 3-4 यातुधानी; छन्द :-अनुष्टुप्, 3 विराट् पथ्याबृहती, 4 पथ्या पंक्ति।
उप प्रागाद् देवो अग्नी रक्षोहामीवचातनः।
दहन्नप द्वयाविनो यातुधानान् किमीदिनः॥
रोगों का संहार करने वाले राक्षसों का संहार करने वाले अग्नि देवता शंकालुओं, लुटेरों एवं दो मुख वाले धूर्तों को अपनी ज्वाला के द्वारा भस्म करते हुए इस उद्विग्न मनुष्य के पास पहुँचते हैं।(अथर्ववेद, रक्षोघ्न सूक्त 1.28.1)
धूर्त :: शरारती, कुटिल, चालाक, छली, कपटपूर्ण, शातिर, कपटी, धोखेबाज़, चतुर; sly, artful, Machiavellian.
Agni Dev who destroy the diseases and demons, reach the perturbed humans, burning the artful-sky making dual speak with his flames.
प्रति दह यातुधानान् प्रति देव किमीदिनः। प्रतीचीः कृष्णवर्तन सं दह यातुधान्यः॥
हे अग्नि देवता! आप लुटेरों एवं शंकालुओं को सर्वदा अपनी ज्वाला से भस्म करें। हे काले मार्ग वाले अग्नि देवता! मनुष्यों के अनुकूल कर्म करने वाली लुटेरी नारियों को भी आप अपनी ज्वाला से जलाकर भस्म कर दीजिए।(अथर्ववेद, रक्षोघ्न सूक्त 1.28.2)
Hey Agni Dev! Burn the looters and doubtful; with your flames. Hey deity of the dark route Agni Dev! Burn the looter women, who too function in favour of the retched person.(29.03.2026)
या शशाप शपनेन याधं मूरमादधे।
या रसस्य हरणाय जातमोरेभे तोकमत्तु सा॥
जो आसुरियाँ शाप द्वारा शापित करती हैं एवं जो कुटिल कृत्य को भी हिंसात्मक प्रवृति रखते हुए करती हैं एवं जो रक्तरूपी रस का पान करने हेतु उत्पन्न हुए संतानों का भक्षण, करना आरम्भ करती हैं, वे आसुरियाँ अपने संतानों को एवं हमारे शत्रुओं की संतानों का भक्षण करें।(अथर्ववेद, रक्षोघ्न सूक्त 1.28.3)
Let the demonic powers which curse, have violent tendency even towards wickedness, who drink the blood of the children; should eat their own progeny along with the progeny of our enemy.
पुत्रमत्तु यातुधानीः स्वसारमुत नप्त्यम्।
अधा मिथो विकेश्यो 3 वि घ्नतां यातुधान्यो 3 वि तृह्यन्तामराय्यः॥
वे राक्षसियाँ अपने पुत्र, बहिन एवं पौत्र का भक्षण करें। वे केशों को खींचकर आपस में लड़ती हुई मृत्यु को प्राप्त करें एवं दान की भावना से वंचित घात करने वाली आसुरियाँ आपस में झगड़ती हुए मृत्यु को प्राप्त हो जाएँ।(अथर्ववेद, रक्षोघ्न सूक्त 1.28.4)
The demon women should eat their own son and grandson. They should die pulling each other's hair. The demon women who have no intension of donation should strike each other and die.
अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त (1.29) :: ऋषि :- वसिष्ठ; देवता:-अभीवर्तमणि, ब्रह्मणस्पति; छन्द :- अनुष्टुप्।
अभीवर्तेन मणिना येनेन्द्रो अभिवावृधे। तेनास्मान् ब्रह्मणस्पतेऽभि राष्ट्राय वर्धय॥
हे ब्रह्मणस्पते! जिस समृद्धि प्रदान करने वाले मणि के द्वारा इन्द्र की प्रगति हुई, उसी मणि के द्वारा आप हमें राष्ट्र का कल्याण करने के उद्देश्य से विस्तृत करें।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.1)
Hey Brahman Spatye! The Jewel-Mani which granted progress to Indr Dev, you should use it for the progress of our Nation.
अभिवृत्य सपत्नानभि या नो अरातयः। अभि पृतन्यन्तं तिष्ठाभि यो नो दुरस्यति॥
हे राजन! हमारा विरोध करने के कारण हिंसक प्रवृति रखने वाले हमारे शत्रु सेनाओं को जो हमसे संग्राम करने की आकांक्षा रखते हैं, जो हमसे इर्ष्या भाव रखते हैं, आप उन्हें सीमाबद्ध करके बलहीन बना दें।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.2)
Hey king! Discipline those who oppose us due to their violent nature and the enemy armies who are envious to us and make them powerless.
अभि त्वा देवः सविताभि सोमो अवीवृधत्। अभि त्वा विश्वा भूतान्यभीवर्तों यथाससि॥
हे शासक! सविता देव, सोमदेवता एवं सम्पूर्ण जनसमुदाय आपको शासन के आसन पर बैठा हुआ स्वीकार करें। इन सबके सहयोग से आप शौर्य एवं यश को प्रसारित करते हुए अच्छी प्रकार से राज्य करें।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.3)
He emperor! Let Savita Dev, Som Dev and the entire populace-subjects accept you as the king. By virtue of their cooperation you should attain glory, fame and rule decently.
अभीवर्तो अभिभवः सपलक्षयणो मणिः। राष्ट्राय मह्यं बध्यता सपलेभ्यः पराभुवे॥
यह मणि शत्रुओं को वशीभूत करके उनको पराभूत करने वाली है एवं विपक्षी दलों का संहार करने वाली है। विपक्षीदलों को पराजित करने हेतु एवं शासन की प्रगति हेतु इस मणि को आप हमारे शरीर में बाँधें।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.4)
Let this Mani-jewel subjugate the enemies, defeat them and destroy the enemy forces. Tie this Mani over our body to defeat the enemies and our progress.
उदसौ सूर्यो अगादुदिदं मामकं वचः। यथाहं शत्रुहोऽसान्यसपत्नः सपत्नहा॥
सभी जनों को उत्साहित करने के उद्देश्य से सूर्यदेव उदित हो गये, हमारी मंत्ररूपी वाणी भी प्रकट हो गई। (इनके प्रभाव से) हम शत्रुओं के संहारक, कुटिल कृत्य करने वालों का विनाश करने वाले एवं शत्रु विहीन हों।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.5)
For encouraging all people Sury Dev rise and our voice in the form of Mantr has appeared. By virtue of it, we should become destroyer of the enemy & those performing wicked deeds becoming free from enemies.
सपलक्षयणो वृषाभिराष्ट्रो विषासहिः। यथाहमेषां वीराणां विराजानि जनस्य च॥
हे मणे! आप से प्राप्त होने वाली शक्ति के द्वारा हम शत्रु का विनाश करने वाले, शक्तिशाली व विजय प्राप्त करके शासन के प्रतिकूल वीरों एवं प्रजाजनों के हित में भली-भाँति शासन करने वाले बनें।(अथर्ववेद, राष्ट्र अभिवर्धन, सपत्नक्षयण सूक्त 1.29.6)
Hey Mani-Jewel! By virtue of the power granted by you, we should become destroyer of the enemy, mighty-powerful and victorious. We should govern those brave who are against the government and become properly governing the subjects.
अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त (1.30) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- विश्वेदेवा; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 शाक्वरगर्भा विराट् जगती।
विश्वे देवा वसवो रक्षतेममुतादित्या जागृत यूयमस्मिन्।
मेमं सनाभिरुत वान्यनाभिर्मेमं प्रापत् पौरुषेयो वधो यः॥
हे सम्पूर्ण देवगणों! हे वसुओं! इस आयु की इच्छा करने वाले मानव की आप रक्षा करें। हे आदित्यों! आप सभी इस विषय में सावधान रहें। इसका संहार करने हेतु इसके मित्रगण या दूसरे इसके शत्रु इसके निकट न आ सकें। इसको मृत्यु के मुख की ओर ले जाने में कोई भी समर्थ न हो सके।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 1.30.1)
Hey entire demigods-deities! Hey Vasu Gan! Protect this man desirous of long life. Hey Adity Gan! You should be alert in this matter. For destroying him neither the friends nor the enemy reach close to him. None should be capable of taking him to death.
ये वो देवाः पितरो ये च पुत्राः सचेतसो मे शृणुतेदमुक्तम्।
सर्वेभ्यो वः परि ददाम्येतं स्वस्त्ये नं जरसे वहाथ॥
हे देवगणों! आपके जो पितामह व पुत्र हैं, वे सभी आयुष्य की अभिलाषा करने वाले मनुष्य के सम्बन्ध में मेरी विनति को सावधानीपूर्वक श्रवण करें। हम इस मनुष्य को आपके हेतु समर्पित करते हैं। आप इसकी विपदाओं से रक्षा करते हुए इसे दीर्घ आयु तक आनंदपूर्वक पहुँचायें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 1.30.2)
Hey Dev Gan! Your grand parents and son should carefully listen to my request with regard to this man, desirous of longevity. We handover this man to you. Protect this man from troubles and lead him to long life.
ये देवा दिविष्ठ ये पृथिव्यां ये अन्तरिक्ष ओषधीषु पशुष्वप्स्व 1 न्तः।
ते कृणुत जरसमायुरस्मै शतमन्यान् परि वृणक्तु मृत्यून्॥
हे सम्पूर्ण देवगणों! आप संसार का उद्धार करने के उद्देश्य से द्युलोक में वास करते हैं। हे वायु देव! आप अंतरिक्ष में वास करते हैं। हे औषधियों एवं गौओं में स्थित देवगणों! आप इस आयु की अभिलाषा करने वाले मनुष्य को दीर्घायु प्रदान करें। आप इस व्यक्ति को मृत्यु का कारण बनने वाले सैंकड़ों ज्वर आदि व्याधियों से सुरक्षा प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 1.30.3)
Hey entire group of demigods! You reside in the heaven for the well being-welfare of the universe. Hey Vayu Dev! You reside in the space-sky. Hey Dev Gan residing in the medicine and cows! Grant longevity to this man desirous of long life. Protect this man from hundreds of fevers and diseases-ailments.
येषां प्रयाजा उत वानुयाजा हुतभागा अहुतादश्च देवाः।
येषां वः पञ्च प्रदिशो विभक्तास्तान् वो अस्मै सत्रसदः कृणोमि॥
जिन अग्निदेव के लिए पंचयज्ञ किए जाते हैं एवं जिन इन्द्र आदि देवों हेतु तीन यज्ञ किए जाते है तथा अग्नि में होमी हुई आहुतियाँ जिनका भाग हैं; अग्नि से बाहर डाली हुई आहुतियों का सेवन करने वाले बलि हरण आदि देवता एवं पंच दिशाएँ जिनके वश में रहती हैं, उन सभी देवताओं को हम आयु की कामना रखने वाले मनुष्य की दीर्घायु हेतु उत्तरदायी बनाते हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 1.30.4)
Five Yagy for Agni Dev, three Yagy for Indr Dev, offerings-sacrifices are made in fire. Sacrifices falling out of the Vedi-Agni Kund, are used by Bali Haran demigods controlling the five directions. We make all these demigods responsible for long life of this human who wish to live long.(30.03.2026)
अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त (1.31) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- आशापालाक वास्तोष्पतिगण; छन्द :- अनुष्टुप्, 3 विराट् त्रिष्टुप्, 4 परानुष्टुप् त्रिष्टुप्।
आशानामाशापालेभ्यश्चतुर्थ्यो अमृतेभ्यः। इदं भूतस्याध्यक्षेभ्यो विधेम हविषा वयम्॥
सभी जनों के मालिक एवं अमृत्व से युक्त इन्द्र आदि चार दिक्पालों के लिए हम सब हवि अर्पित करते हैं।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 1.31.1)
दिक्पाल :: दिशाओं के रक्षक; guardians of the directions.
We make offerings for the Lord of all people, possessor of elixir-nectar, Devraj Indr and the deities of four directions-Dikpals.
व आशानामाशापालाश्चत्वार स्थन देवाः। ते नो निर्ऋत्याः पाशेभ्यो मुञ्चतांहसोअंहसः॥
हे देवताओं! आप चारों दिशाओं के चार दिशापालक है। आप हमारी सभी प्रकार के कुटिल कृत्यों से रक्षा करें एवं पतन की ओर जाने वाले बन्धनों से मुक्त करें।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 1.31.2)
Hey demigods! You are the guardian of the four directions. Protect us from the wicked-vicious deeds and release us from the ties-bonds, which lead to our down fall-hells.
अस्त्रामस्त्वा हविषा यजाम्यश्लोणस्त्वा घृतेन जुहोमि।
य आशानामाशापालस्तुरीयो देवः स नः सुभूतमेह वक्षत्॥
हे कुबेर! हम मनोवांछित वैभव की प्राप्ति हेतु अथक (अश्रान्त) होकर आपके लिए आहुति अर्पित करते हैं। हम पंगु (लंगड़ापन) नामक व्याधि से रहित होकर आपके हेतु घी आहुति अर्पित करते हैं। हमारी आहुति से प्रसन्न होकर चौथे दिज्ञा पालक हमें सुर्वण आदि संपदा प्रदान करें एवं हमारी आहुतियों से प्रमुदित हो।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 1.31.3)
Hey Kuber-deity of wealth! We make offerings to you for attaining grandeur without being tired. We become free from lame hood for making offerings of Ghee. On being happy with our offerings, let the fourth Dikpal grant us gold and prosperity gladdened with our offerings-sacrifices.
स्वस्ति मात्र उत पित्रे नो अस्तु स्वस्ति गोभ्यो जगते पुरषेभ्यः।
विश्वं सुभूतं सुविदत्रं नो अस्तु ज्योगेव दृशेम सूर्यम्॥
हमारी माता एवं हमारे पिता भली प्रकार से रहें। हमारी गौएं, हमारे अपने बंधु-बान्धव एवं सारा जगत् प्रसन्नतापूर्वक रहे। हम सभी उत्तम वैभव व उत्तम ज्ञान वाले हों सैकड़ों वर्षों तक सूर्य के दर्शन करने वाले हों अर्थात् दीर्घजीवी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 1.31.4)
Let our parents remain well. Our cows, relatives, brothers and the whole world should remain well happily. We should have all sorts of grandeur, enlightenment and view the Sun for hundreds of years, i.e., live long.
अथर्ववेद, महद्ब्रह्म सूक्त (1.32) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- द्यावा-पृथिवी; छन्द :- अनुष्टुप्, 2 ककुम्मती अनुष्टुप्।
इदं जनासो विदथ महद् ब्रह्म वदिष्यति। न तत् पृथिव्यां नो दिवि येन प्राणन्ति वीरुधः॥
हे ज्ञानियों! आप इस सम्बन्ध में जानकारी प्राप्त करें कि वह ब्रह्म पृथ्वी पर या स्वर्गलोक में ही नहीं रहता, जिससे औषधियों में जीवन तत्त्व का संचार होता है।(अथर्ववेद, महद्ब्रह्म सूक्त 1.32.1)
Hey learned scholars! Attain the information whether the Brahm is present in the heavens or the earth, which produce life in the medicines.
अन्तरिक्ष आसां स्थाम श्रान्तसदामिव।
आस्थानमस्य भूतस्य विदुष्टद् वेधसो न वा॥
ज्ञान औषधियों का रहने का स्थान पृथ्वी एवं स्वर्ग के मध्य का स्थान (आकाश) है। जिस प्रकार श्रोत हुए मनुष्य आराम करते हैं, उसी तरह ये औषधियाँ आकाश में रहती हैं। इस निर्मित स्थान के सम्बन्ध में परमेश्वर व मनु जानते हैं या नहीं।(अथर्ववेद, महद्ब्रह्म सूक्त 1.32.2)
Place of the medicine which boost knowledge is between the heavens & earth. Just as a tired (or exhausted) person rests, similarly the medicines live in the sky. Do the Parmeshwar or Manu know about it or not.
यद् रोदसी रेजमाने भूमिश्च निरतक्षतम्। आर्द्र तदद्य सर्वदा समुद्रस्येव स्त्रोत्याः॥
हे द्यावा-पृथ्वी! आपने एवं पृथ्वी ने जो कुछ भी पैदा किया है; वह सभी उसी तरह हर समय नवीन रहते हैं, जिस तरह तालाब से निष्कासित होने वाले जलस्रोत अविनाशी रूप में निकलते रहते हैं।(अथर्ववेद, महद्ब्रह्म सूक्त 1.32.3)
Hey heavens-earth! Everything produced by you & the earth remains new at all times, similar to the water source which remain intact moving out of the pond-reservoir.
विश्वमन्यामभीवार तदन्यस्यामधिश्रितम्। दिवे च विश्ववेदसे पृथिव्यै चाकरं नमः॥
आकाश इस संसार का सुरक्षा कवच है। पृथ्वी के शरण में निवास करने वाला यह संसार आकाश से वृष्टि-वर्षा करने हेतु विनती करता है। उस स्वर्गलोक एवं सम्पूर्ण वैभव से युक्त धरती को हम नमस्कार करते हैं।(अथर्ववेद, महद्ब्रह्म सूक्त 1.32.4)
Sky is the protective layer-shield, armour of the universe. This world which under the asylum of the earth request the sky for rains. We salute the heavens & the earth, full of grandeur.
अथर्ववेद, आपः सूक्त (1.33) :: ऋषि :- शन्ताति; देवता :- चन्द्रमा और आप; छन्द :-त्रिष्टुप्।
हिरण्यवर्णाः शुचयः पावका यासु जातः सविता यास्वग्निः।
या अग्निं गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु॥
जो जल स्वर्ण के सदृश प्रकाशित होने वाले वर्ण से युक्त, अत्यन्त सुन्दर, पवित्रता प्रदाता है, जिससे सविता देव एवं अग्निदेव का जन्म हुआ है। जो उत्तम वर्ण वाला जल अग्नि को गर्भ में धारण करता है अर्थात् अग्निगर्भ है, वह जल हमारे रोगों को दूर करके हम सभी को प्रसन्नता व शान्ति प्रदान करे।(अथर्ववेद, आपः सूक्त 1.33.1)
Let the water which shine like the gold, is highly beautiful-adorable, grant piousity, produced Savita Dev & Agni Dev, supports the Agni-fire; remove our all diseases-ailments and grant us happiness.
यासां राजा वरुणो याति मध्ये सत्यानृते अवपश्यञ्जनानाम्।
या अग्निं गर्भ दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु॥
जिस जल में निवास करते हुए शासक वरुण सच व झूठे का परिक्षण करते चलते हैं। जो रमणीय वर्ण वाला जल अग्निगर्भ है, वह हमारे लिए शान्ति प्रदान करने वाला हो।(अथर्ववेद, आपः सूक्त 1.33.2)
The emperor Varun Dev who live in water, examine true or false. The adorable water, which is Agni Garbh; should grant us peace, solace, tranquillity.
यासां देवा दिवि कृण्वन्ति भक्षं या अन्तरिक्षे बहुधा भवन्ति।
या अग्नि गर्भं दधिरे सुवर्णास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु॥
जिस जल के सारभूत तत्त्व का एवं सोमरस का पान इन्द्रदेव आदि देवगण स्वर्गलोक में करते है। जो आकाश में अनेक प्रकार से निवास करते हैं, वह अग्नि को गर्भ में धारण करने वाला जल हम सभी को सुख एवं शान्ति प्रदान करे।(अथर्ववेद, आपः सूक्त 1.33.2)
Devraj Indr and demigods who drink the gist of water i.e., Somras, reside in the heavens. The water who reside in the space-sky in various manners, who support the fire-Agni should grant us pleasure-comforts and peace-solace.
शिवेन मा चक्षुषा पश्यतापः शिवया तन्वोप स्पृशत त्वचं मे।
घुतश्चतः शुचयो याः पावकास्ता न आपः शं स्योना भवन्तु॥
हे जल के अधिष्ठाता देवताओं! आप अपने कल्याणकारी नयनों द्वारा हमें देखें एवं अपने कल्याणकारी शरीर द्वारा हमारी त्वचा को स्पर्श करे। तेजवान् बनाने वाला स्वच्छ व पावन जल हमें सुख व शान्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, आपः सूक्त 1.33.4)
Hey Lord of the water, demigods! Watch us with your blissful eyes, touch our skin with your welfare-well being body-hands. Clean and pious making water should make us Tejaswi granting us comforts-pleasure and solace-peace.
अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त (1.34) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- मधुवनस्पति; छन्द :-अनुष्टुप्।
इयं वीरुन्मधुजाता मधुना त्वा खनामसि।
मधोरधि प्रजातासि सा नो मधुमतस्कृधि॥
सम्मुख विद्यमान् बढ़ने वाली मधुक नामक लता मधुरता के साथ जन्मी हैं। हम इसे मधुरता के साथ खोदते हैं। हे वीरुत्! आप स्वभाव से ही मधुरता से युक्त हैं। इसलिए आप हमें भी माधुर्यता प्रदान करें।(अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त 1.34.1)
वीरुध्-वीरुत् :: यह एक ऐसी लता या पौधे को संदर्भित करता है जो अन्य वृक्षों के सहारे ऊपर बढ़ता है। इसे गुल्मिनी (गुच्छेदार) या प्रतानी (पसारने वाली) भी कहा जाता है; Creeper, Spreading Plant, Herb, Vine.
Creeper Madhuk present before us, is born with sweetness. We dig it with sweetness-carefully. Hey Veerut-Veerudh! Your nature possess sweetness. Hence, grant us sweetness.(31.03.2026)
जिह्वाया अग्रे मधु मे जिह्वामूले मधूलकम्। ममेदह क्रतावसो मम चित्तमुपायसि॥
हमारी जीभ के अग्र भाग में एवं जीभ के मूल भाग में मधुरता रहे। हे मधुलक लते! आप हमारी देह, चित्त एवं कृत्य में स्थित रहें।(अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त 1.34.2)
Let our tongue has sweetness in the forward region and the root position. Hey Madhu Lata! You should be present in our body, mind-mood and the deeds.
मधुमन्मे निक्रमणं मधुमन्मे परायणम्। वाचा वदामि मधुमद् भूयासं मधुसन्दृशः॥
हे मधुलक लते! आपको प्राप्त करके हमारा समीप का जाना मधुर हो एवं दूर का गमन भी मधुर हो। हमारे वचन भी मधुरता से सम्पन्न हो, जिससे हम सभी के प्रेम के योग्य बन जाएँ।(अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त 1.34.3)
Hey Madhu Lata! Our movement far or near to collect-have you, should be sweet. Let our words be sweet so that we become suitable for love.
मधोरस्मि मधुतरो मदुघान्मधुमत्तरः। मामित् किल त्वं वनाः शाखां मधुमतीमिव॥
हे मधुक लते! आपकी निकटता को प्राप्त करके हम मधुक से ज्यादा मधुर हों एवं माधुर्य पदार्थों से भी अधिक मीठे हो जाएँ। आप हमारा ही भक्षण करें। जिस प्रकार मधुर फल से परिपूर्ण लता से पक्षीगण स्नेह करते हैं, उसी प्रकार हम सभी लोगों के प्रिय बन जाएँ।(अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त 1.34.4)
Hey Madhu Lata! Having attained proximity to you, we should become even more sweet. The way the birds love the branch full of fruits, we too become dear to all people.
परि त्वा परितत्नुनेक्षुणागामविद्विषे। यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः॥
सभी दिशाओं से घिरे हुए, मधुर ईख के सदृश, एक दूसरे के प्रिय एवं मधुरता से परिपूर्ण रहने के उद्देश्य से ही हे पत्नि! हम तुमको प्राप्त हुए है। हमारी इच्छा करने वाली रहो एवं हमें छोड़कर कहीं भी गमन न कर सको, अतः हम तुम्हारे निकट उपस्थित हुए हैं।(अथर्ववेद, मधुविद्या सूक्त 1.34.5)
Hey wife! We have been made for each other like the sweet sugar can surrounded from all directions. You have attained me. Desire for me and do not go else where, that's why I have come close to you.
अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त (1.35) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- हिरण्य, इन्द्राग्नी या विश्वेदेवा; छन्द :- जगती, 4 अनुष्टुप्गर्भा चतुष्पदा त्रिष्टुप्।
यदाबध्नन् दाक्षायणा हिरण्यं शतानीकाय सुमनस्यमानाः।
तत् ते बध्नाम्याचुषे वर्चसे बलाय दीर्घायुत्वाय शतशारदाय॥
हे दीर्घजीवी बनने की अभिलाषा करने वाले मानव! उत्तम विचार वाले दक्ष गोत्रीय महर्षियों ने 'शतानीक शासक' को जो प्रसन्नता प्रदान करने वाला सोने के रंग का नीलम बाँधा था, उसी स्वर्ण को हम आपके दीर्घायु के लिए तेज और वैभव की प्राप्ति हेतु एवं सैकड़ो वर्ष की आयु प्राप्त करने हेतु आपको बाँधते हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 1.35.1)
Hey human desiring to become long lived! Descendants of Daksh clan Maharishis tied the blue sapphire having golden hue to the emperor of Shataneek to gladden him, we tie the same gold to you for long life of hundreds of years, Tej & grandeur.
नैनं रक्षांसि न पिशाचाः सहन्ते देवानामोजः प्रथमजं ह्ये 3 तत्।
यो बिभर्ति दाक्षायणं हिरण्यं स जीवेषु कृणुते दीर्घमायुः॥
स्वर्ण को धारण करने वाले मानव को ज्वर आदि व्याधि पीड़ा नहीं पहुँचाते। मांस को खाने वाले राक्षस उसको कष्ट नहीं पहुँचा सकते, क्योंकि यह हिरण्य (सोना) इन्द्र आदि देवगणों से पूर्व में ही जन्मा है। जो मनुष्य दाक्षायण स्वर्ण धारण करते हैं, वे सभी दीर्घ आयु प्राप्त करते हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 1.35.2)
One who support the heavens is not pained-troubled by fever. Meat eater demons do not tease him, since gold had evolved from the demigods-deities earlier. The humans who wear Dakshayan Gold, they all attain long life.
अपां तेजो ज्योतिरोजो बलं च वनस्पतीनामुत वीर्याणि।
इन्द्रइवेन्द्रियाण्यधि धारयामो अस्मिन् तद् दक्षमाणो बिभरद्धिरण्यम्॥
हम इस मनुष्य में जल का ओज, तेज, बल, वैभव एवं औषधियों के सम्पूर्ण गुण विद्यमान् करते है। जिस तरह इन्द्र से सम्बन्ध रखने वाला बल इन्द्र के अन्दर स्थापित रहता है, उसी प्रकार हम कथित गुणों को इस मनुष्य में विद्यमान् करते हैं। इसलिए शक्ति को बढ़ाने की इच्छा रखने वाले मनुष्य स्वर्ण धारण करें।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 1.35.3)
We grant the Tej, Oz, strength, grandeur and all qualities of medicine of water, to this human being. The way the might of Devraj Indr is present within him, similarly we install the desired qualities in this man. Hence, he should wear gold for increasing his strength.
समानां मासामृतुभिष्ट्वा वयं संवत्सरस्य पयसा पिपर्मि।
इन्द्राग्नी विश्वे देवास्तेऽनु मन्यन्तामहृणीयमानाः॥
हे सम्पूर्ण धन-सम्पदा की अभिलाषा करने वाले मानव! हम आपको समान मास वाली ऋतुओं एवं संवत्सर पर्यन्त रहने वाले गौ दूध से युक्त करते हैं। इन्द्र, अग्नि एवं दूसरे सभी देवता आपकी त्रुटियों से क्रोधित न होकर सुवर्ण धारण करने से प्राप्त होने वाली फल की प्राप्ति हेतु आज्ञा प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 1.35.4)
Hey human being desirous of wealth & prosperity! We grant you cow milk till the seasons and Sanvatsar having same months. Let Devraj Indr, Agni Dev and other demigods should not be angry with your mistakes and order for the rewards attained by wearing Gold.
Please refer to :: Ancient Hindu Calendar काल गणना santoshkipathshala.blogspot.com
(01.04.2026)
अथर्ववेद, परमधाम सूक्त (2.1) :: ऋषि :- वेन; देवता :- ब्रह्मात्मा; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 जगती।
वेनस्तत् पश्यत् परमं गुहा यद् यत्र विश्वं भवत्येकरूपम्।
इदं पृश्निरदुहज्जायमानाः स्वर्विदो अभ्यनूषत व्राः॥
अन्तःकरण में जो सत्य, ज्ञान आदि लक्षणों से युक्त ब्रह्म हैं, जिसमें सम्पूर्ण संसार समाया है, उस अति उत्तम परम पिता को वेन ने देखा। उसी ब्रह्म का दोहन करके प्रकृति के नाम-रूप वाले भौतिक संसार को उत्पन्न किया। आत्मज्ञान से परिपूर्ण मनुष्य उस परब्रह्म की वंदना करते हैं।(अथर्ववेद, परमधाम सूक्त 2.1.1)
Ven saw the Ultimate-excellent Param Pita Par Brahm Parmeshwar in his innerself possessing the truth, Gyan-enlightenment and other characterises, in whom entire universe is present. That Brahm was churned to produce nature and the physical world. A self realised person worship that Par Brahm.
प्र तद् वोचेदमृतस्य विद्वान् गन्धर्वो धाम परमं गुहा यत्।
त्रीणि पदानि निहिता गुहास्य यस्तानि वेद स पितुष्पितासत्॥
गन्धर्व (वाणी अथवा किरणों से सम्पन्न विद्वान् या सूर्य) के विषय में उपदेश दें। इस ब्रह्म के तीन पद हृदय की गुहा में स्थित है। जो मनुष्य उसे जान लेता है, वह पिता का भी पिता हो जाता है अर्थात् सर्वज्ञाता परमपिता ब्रह्म से भी उत्तम श्रेणी का हो जाता है।(अथर्ववेद, परमधाम सूक्त 2.1.2)
Let the Gandarbh (Voice-speech, enlightened or Sun) preach about the Brahm. Three stages of the Brahm are there in the heart. One who realises HIM become the father of fathers. i.e., attains the status of the Param Pita Par Brahm Parmeshwar.
स नः पिता जनिता स उत बन्धुर्धामानि वेद भुवनानि विश्वा।
यो देवानां नामध एक एव तं संप्रश्नं भुवना यन्ति सर्वा॥
सर्वज्ञ उत्पत्ति कर्ता ब्रह्म ही हमारा पिता जन्मदाता व भ्राता है। वही सम्पूर्ण लोकों एवं स्थानों का ज्ञाता है। वह एकल ही सम्पूर्ण देवगणों के नामों को धारण करने वाला है। सम्पूर्ण लोक उसी ब्रह्म के सम्बन्ध में प्रश्न पूछने हेतु ज्ञाता के निकट पहुँचते हैं।(अथर्ववेद, परमधाम सूक्त 2.1.3)
Ultimate, the Brahm is our progenitor and brother. He know the all abodes and places. HE alone has the names of all demigods. All abodes reaches the learned scholar on being asked about Brahm.
परि द्यावापृथिवी सद्य आयमुपातिष्ठे प्रथमजामृतस्य।
वाचमिव वक्तरि भुवनेष्ठा धास्युरेष नन्वे3षो अग्निः॥
(ब्रह्मज्ञानी का कहना है) मैं जल्द ही द्यावा-पृथिवी को तत्त्वदृष्टि से जान गया हूँ, अतः परमसत्य की अराधना करता हूँ। जिस प्रकार बोलने वालों के अन्दर वाणी निहित रहती है, उसी प्रकार वह ब्रह्म सम्पूर्ण लोकों में उपस्थित रहता है तथा वही सभी प्राणियों का पालन-पोषण करके उन्हें धारण करता है। निश्चित रूप से अग्नि देव भी वहीं निवास करते हैं।(अथर्ववेद, परमधाम सूक्त 2.1.4)
The Brahm Gyani says, "I have realised the gist of the heaven & earth, hence I worship the Ultimate reality". The way voice-speech is involved in speaking, similarly the Brahm pervades the all abodes, nourishes-nurture all living beings. Agni Dev too certainly reside there.
परि विश्वा भुवनान्यायमृतस्य तन्तुं विततं दृशे कम्।
यत्र देवा अमृतमानशानाः समाने योनावध्यैरयन्त॥
जहाँ अमृत पान करने वाले, समान अधर वाले देवता भ्रमण करते हैं, उस परम सत्य के ताने-बाने का मैंने अनेकों बार दर्शन किया है।(अथर्ववेद, परमधाम सूक्त 2.1.5)
I have seen the net work of the Ultimate truth many times; where the demigods drinking elixir, roam.
अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त (2.2.1) :: ऋषि :- मातृनामा; देवता :- गन्धर्व, अप्सरा समूह; छन्द :- त्रिष्टुप्, विराट् जगती, 4 विराट् गायत्री, 5 भुरिगनुष्टुप्।
दिव्यो गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यो विश्वीड्यः।
तं त्वा यौमि ब्रह्मणा दिव्य देव नमस्ते अस्तु दिवि ते सधस्थम्॥
जो दिव्य गन्धर्व, धरती आदि लोकों को धारण करने वाले एकल स्वामी है, वे ही इस जगत् में स्तुति करने के योग्य हैं। हे परमात्मन! आपका रहने का स्थान स्वर्गलोक है, हम आपको नमस्कार करते हैं एवं अराधना के द्वारा आपसे मिलते हैं।(अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त 2.2.1)
HE who roam the earth & divine abodes is the sole Lord and deserve worship. Hey Almighty! You reside in the heavens. We salute & meet you through worship.
Ultimate abode (परम् धाम) in much-much higher than the heavens. There are numerous heavens and universes.
दिवि स्पृष्टो यजतः सूर्यत्वगवयाता हरसो दैव्यस्य।
मृडाद् गन्धर्वो भुवनस्य यस्पतिरेक एव नमस्यः सुशेवाः॥
सभी लोकों के एकमात्र स्वामी गंधर्व स्वर्ग लोक में स्थित रहने वाले, दैवी आपदाओं का निवारण करने वाले एवं सूर्य के त्वचा अर्थात् आवरण रूप हैं। वे सबके द्वारा नमन करने तथा स्तुति करने योग्य हैं। सभी को सुख प्रदान करने वाले हमें भी सुख प्रदान करे।(अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त 2.2.2)
Sole Lord of all abodes, resident of Gandarbh Lok, remover of divine troubles-tortures and has the covering known as Sun like skin. HE deserve to be bowed (saluted) by all and worshiped by all. HE who grants comforts-pleasure to all should grant us pleasure & comforts.
अनवद्याभिः समु जग्म आभिरप्सरास्वपि गन्धर्व आसीत्।
समुद्र आसां सदनं म आहुर्यतः सद्य आ च परा च यन्ति॥
प्रशंसनीय स्वरूप वाली अप्सराओं से गन्धर्व देव सुसंगत हो गए हैं। इन अप्सराओं का रहने का स्थान अंतरिक्ष है। हमें कहा गया है कि ये अप्सराएँ वहीं से आती हैं और वहीं पर चली जाती हैं।(अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त 2.2.3)
Gandarbh Dev has been in the company of Apsaras-nymphs. The residence of the Apsaras is the space. We have been told that they come from there and return there.
अग्निये दिद्युन्नक्षत्रिये या विश्वावसुं गन्धर्वं सचध्वे।
ताभ्यो वो देवीर्नम इत् कृणोमि॥
हे देवियों! आप बादलों की गर्जना या नक्षत्रों के आलोक में संसार का पालन करने वाले गन्धर्व देव से संयुक्त होती हैं, इसलिए हम आपको नमस्कार करते हैं।(अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त 2.2.4)
Hey Devis-goddesses! You nurture the universe with the thunder of clouds or the aura of Constellations joining the Gandarbh, hence we salute.
याः क्लन्दास्तमिषीचयोऽक्षकामा मनोमुहः।
ताभ्यो गन्धर्वपत्नीभ्योऽप्सराभ्योऽ करं नमः॥
प्रेरित करने वाली, ग्लानि का शमन करने वाली, आँखों की कामनाओं को पूरित करने वाली एवं चित्त को अस्थिर करने वाली, जो गन्धर्व-पत्नी स्वरूप हैं, हम उन्हें नमस्कार करते हैं।(अथर्ववेद, भुवनपति सूक्त 2.2.5)
ग्लानि :: बेहोशी, अवसाद, क्षीणता, किसी गलती या कुकर्म के लिए पछतावा या खेद महसूस करना, अनुचित काम करने पर लजाना अस्पष्टता, पश्चाताप, खेद, मानसिक दुख; repentance. guilt, faintness.
We salute her, who accomplish our desires of the eyes making the mind unstable, who is a form of the Gandarbh Patni-wife, inspires, removes repentance.
अथर्ववेद, आस्रावभेषज (सूक्त 2.3) :: ऋषि :- अङ्गिरा; देवता :- भैषज्य, आयु, धन्वन्तरि; छन्द :- अनुष्टुप्, 6 त्रिपात् स्वराट् उपरिष्टात् महाबृहती।
अदो यदवधावत्यवत्कमधि पर्वतात्। तत्ते कृणोमि भेषजं सुभेषजं यथाससि॥
जो रक्षक-प्रवाह (सोम) मुञ्जवान् शिखर के ऊपर से नीचे की ओर लाया जाता है, उसके आगे के भाग वनस्पति का हम इस तरह से निमार्ण करते हैं, जिससे वह आपके लिए अति उत्तम औषधि बनें व रोगों को दूर करने में समर्थ हों।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.1)
मुंजवान :: हिमालय की श्रृंखला में स्थित कैलाश पर्वत के निकट एक पवित्र पर्वत, जहाँ भगवान् शिव तपस्या करते हैं। यह सोमलता (औषधीय पौधा) से भी संबंधित है।
Flowing protector Som, is brought from the cliff of Mujvan mountain to the ground. Its top portion is converted into highly potential medicine to remove all ailments.
आदङ्गा कुविदङ्गा शतं या भेषजानि ते। तेषामसि त्वमुत्तममनास्त्रावमरोगणम्॥
हे दिव्य प्रवाह! जो आप से जन्म लेने वाली अपार औषधियाँ है, वे अतिसार, बहुमूत्र एवं नाड़ीव्रण आदि व्याधि का विनाश करने में पूरी तरह से समर्थ है।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.2)
नाड़ी व्रण :: Sinus tubular wound or pilonidal sinus containing pus, an acute problem between the hips due to lack of cleanliness.
Hey divine flow! The numerous medicines produced from you, are capable of destroying-curing diseases like diarrhoea, Polyuria, Sinus tubular wound or pilonidal sinus.(02.04.2026)
नीचैः खनन्त्यसुरा अरुस्राणमिदं महत्। तदास्त्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
जीवन का अंत करने वाले एवं शरीर को नष्ट करने वाले राक्षस रूप व्याधि व्रण के मुँह को भीतर कसे फाड़ते हैं, लेकिन यह मूँज नाम की औषधि घाव के लिए अति श्रेष्ठ औषधि है। वह अनेकानेक व्याधियों का विनाश कर देती है।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.3)
व्रण :: विद्रधि, जख्म, क्लेश, छाला, फुंसी; ulcer, abscess, sore, boil.
The demonic disease tear opening of the Ulcer-abscess, which lead to end of life, but the medicine named Munj is best for curing wounds. It destroys many diseases.
उपजीका उद्धरन्ति समुद्रादधि भेषजम्। तदास्रावस्य भेषजं तदु रोगमशीशमत्॥
पृथ्वी के निचले भाग में स्थित जल राशि से रोगों का नाश करने वाली औषधि रूप बमई (दीमक की बाँबी) की मिट्टी ऊपर आती है। यह मिट्टी सभी प्रकार के स्रावों की औषधि है। यह अतिसार आदि रोगों का भी नाश करती है।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.4)
स्राव :: टपकना, क्षरण, बहाव, स्रवण, निस्सारण, क्षरण-क्रिया; discharge, secretion.
Water present below the termite hill, cures several diseases. This soil is a medicien for curing several secretions. It destroys diarrheal disease as well.
अरुस्राणमिदं महत् पृथिव्या अध्युद्धृतम्। तदास्त्रावस्य भेषजं तदु रोगमनीनशत्॥
खेत से उठाकर प्रयोग में ली जाने वाली औषधि रूप मिट्टी व्रण आदि को पकाने वाली एवं अतिसार आदि रोगों को पूरी तरीके से समाप्त करने वाली औषधि है अर्थात् यह औषधि इन रोगों के लिए रामबाण है।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.5)
पकना :: scorch, ripen, rankle, ripening.
The soil collected from the field-farm ripen-saturate the diarrhoea; completely destroys it i.e., a perfect medicine for its cure.
शं नो भवन्त्वप ओषधयः शिवाः।
इन्द्रस्य वज्रो अप हन्तु रक्षस आराद् विसृष्टा इषवः पतन्तु रक्षसाम्॥
औषधि हेतु प्रयुक्त किया हुआ जल प्रसन्नता प्रदान करने वाला होकर हमारी व्याधियों का नाश करने वाला हो। व्याधियों की उत्पत्ति करने वाले (असुरों) को इन्द्र देवता का वज्र नष्ट कर दें। असुरों द्वारा मानवों पर छोड़े गए रोगरूपी बाण हम सभी से दूर जाकर गिरे।(अथर्ववेद, आस्रावभेषज सूक्त 2.3.6)
Water used in the preparation of medicines should cure our ailments and grant us pleasure-comfort. Let Vajr of Devraj Indr destroy the demons who produce diseases for the humans. Arrows in the form of diseases shot over the humans should fall away.
अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त (2.4) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- चन्द्रमा अथवा जङ्गिड़; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 विराट् प्रस्तार पंक्ति।
दीर्घायुत्वाय बृहते रणायारिष्यन्तो दक्षमाणाः सदैव।
मणि विष्कन्धदूषणं जङ्गिडं बिभृमो वयम्॥
लम्बी आयु की प्राप्ति हेतु एवं रोगों से रहित होकर उसका पूरा सुख अनुभव करने हेतु हम अपने शरीर पर जंगिड़ मणि को धारण करते हैं। यह जंगिड़ मणि व्याधि नाशक है और यह कमजोरी को दूर करके सामर्थ्य की वृद्धि करने वाली है।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.4.1)
For attaining long life free from diseases and enjoyment, we should wear the Jewel named Jangid. Jangid Mani is the destroyer of diseases, compensate for weakness and increase potential.
जङ्गिडो जम्भाद् क्शिराद् विष्कन्धादभिशोचनात्।
मणिः सहस्रवीर्यः परि णः पातु विश्वतः॥
यह जंगिड़ मणि हजारों शक्तियों से युक्त होकर जमुहाई की वृद्धि करने वाली, कमजोरी को जन्म देने वाली, शरीर को सुखाने वाले रोग की एवं बिना किसी कारण के नेत्रों से अश्रु लाने वाले रोगों से हमारी रक्षा करती है।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.4.2)
जम्हाई :: थकान, नींद या बोरियत के कारण मुंह को चौड़ा खोलकर गहरी सांस लेने की एक अनैच्छिक शारीरिक क्रिया है; yawning, chasma.
Jangid Moni protects us from diseases like weakness, yawning-chasma, tears from the eyes etc.
अयं विष्कन्यं सहतेऽयं बाधते अत्त्रिणः।
अयं नो विश्वभेषजो जङ्गिडः पात्वंहसः॥
यह जंगिड़मणि शरीर को सुखाने वाले रोगों से हमारी रक्षा करती है तथा हमारा भक्षण करने वाली कृत्या आदि का नाश करती है। यह हमारे शरीर से संबन्धित सभी व्याधियों का विनाश करने वाली सम्पूर्ण औषधिरूप है। यह कुटिल कृत्यों से हमारी रक्षा करती है।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.4.3)
Jangid Mani protects from the diseases that dry out the body and destroy the action called Kratya which eats away the body. It destroys all ailments of the body and is a perfect medicien. It protects us from devious acts leading to longevity.
देवैर्दत्तेन मणिना जङ्गिडेन मयोभुवा। विष्कन्धं सर्वा रक्षांसि व्यायामे सहामहे॥
देवताओं के द्वारा दिए जाने वाले, आनन्दप्रद जंगिड़मणि के द्वारा हम सभी प्रकार के सुखाने वाली व्याधियों एवं सम्पूर्ण रोगों के असुरों को इनके भ्रमण करने वाले स्थानों पर दबा सकते हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.4.4)
Jangid Mani granted by the demigods grants pleasure, destroys all diseases leading to drying up of the body and the disease causing demons including their places of impact.
शणश्च मा जङ्गिडश्च विष्कन्धादभि रक्षताम्। अरण्यादन्य आभृतः कृष्या अन्यो रसेभ्यः॥
रस्सी आदि का निर्माण करने वाले सन एवं जंगिड़ मणि विष्कंध व्याधि से हमारी सुरक्षा करें। इनमें से एक की पूर्ति जंगलों द्वारा एवं दूसरे की कृषि द्वारा उत्पन्न होने वाले रसों से की गई हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.4.5)
विष्कंध व्याधि :: गले या गर्दन का रोग, कंधों, गर्दन की जकड़न से होता है; disease pertaining to the neck and shoulders.
Let hemp used for making ropes etc. help us curing the disease pertaining to the neck and shoulders. One of them is nourished by the jungles and the other is obtained from agriculture.
कृत्यादूषिरयं मणिरथो अरातिदूषिः। अथो सहस्वाञ्जङ्गिङः प्र ण आयूंषि तारिषत्॥
यह जंगिड़मणि कृत्या आदि से रक्षा करने वाली है एवं शत्रुरूप रोगों को विनाश करने वाली है। यह बलशाली जंगिडमणि हमारी आयु को बढ़ाए।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.4.6)
Jangid Mani protects from Kratya etc and destroys the enemies in the form of diseases. Let this mighty Mani, Jangid increase our age.
अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5) :: ऋषि - भृगु आथर्वण; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, 1 निवृत् उपरिष्टात् बृहती, 2 विराट् उपरिष्टात् बृहती, 3 विराट् पथ्या बृहती, पुरोविराट् जगती।
इन्द्र जुषस्व प्र वहा याहि शूर हरिभ्याम्। पिबा सुतस्य मतेरिह मधोश्चकानश्चारुर्मदाय॥
हे पराक्रमी इन्द्र देवता! आप प्रसन्न होकर आगे बढ़ें। आप अपने घोड़ों के द्वारा इस याग (यज्ञ) में पधारे। सन्तुष्ट एवं प्रसन्न होने के लिए विद्वान् पुरुषों के द्वारा शुद्ध किए गए मधुर सोमरस का सेवन करें, यह आपको संतुष्टि प्रदान करने वाला है।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.1)
Hey might-majestic Devraj Indr! You should be happy and march forward. Ride the horses and come to the Yagy. On being satisfied and gladden drink sweet Somras extracted by the learned-scholars. Let it grant you satisfaction.
इन्द्र जठरं नव्यो न पृणस्व मधोर्दिवो न।
अस्य सुतस्य स्व 1 र्णोप त्वा मदाः सुवाचो अगुः॥
हे पराक्रमी इन्द्र देवता! आप प्रशंसनीय एवं आनंददायक मीठे सोम रस के सेवन के द्वारा अपने उदर को शांत करें। तत्पश्चात् अभिषुत (शुद्ध) सोमरस एवं वंदना के माध्यम से आपको द्युलोक (स्वर्गलोक) की भाँति सुख की प्राप्ति हो।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.2)
Hey majestic-mighty Devraj Indr! Fill your belly by drinking appreciable sweet Somras. Thereafter, let the extracted Somras and worship; grant you pleasure-comforts like the heavens.
इन्द्रस्तुराषाण्मित्रो वृत्रं यो जघान यतीर्न।
बिभेद वलं भृगुर्न ससहे शत्रून् मदे सोमस्य॥
जो सभी जनों के सखा हैं तथा शत्रुओं पर शीघ्रतापूर्वक आक्रमण करने वाले हैं। उन्होंने वृत्रासुर तथा अवरोधक मेघ का विनाश किया था। भृगु ऋषि के सदृश उन्होंने अंगिराओं के यज्ञों की साधनभूतों का अपहरण करने वाले शक्तिशाली असुर का विनाश किया था, इन्द्र ने इन सभी कार्यों को सोमरस के सेवन से आनंदित होकर किया था।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.3)
He who is the companion of the humans and attack the enemies quickly. He destroyed Vratra Sur and blocking clouds. He destroyed the abductors of means of the Yagy materials like Bhragu Rishi and the mighty demons. Devraj Indr did this all, after being satisfied-gladdened by drinking Somras.(03.04.2026)
आ त्वा विशन्तु सुतास इन्द्र पृणस्व कुक्षी विड्ढि शक्र धियेह्या नः।
श्रुधी हवं गिरो मे जुषस्वेन्द्र स्वयुग्भिर्मत्स्वेह महे रणाय॥
हे पराक्रमी इन्द्र देवता! आपको अभिषुत सोमरस प्राप्त हो तथा आप उससे अपनी दोनों कुक्षियों को शान्त करें। हे इन्द्र देव! आप हमारे आवाहन को श्रवण करके, विचारपूर्वक हमारे समक्ष आएँ और हमारी विनती, वाणी दोनों (वचनों) को स्वीकृत करें तथा विशाल युद्ध हेतु अपने रक्षा करने वाले साधनों के साथ आनन्दपूर्वक तत्पर रहें।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.4)
Hey majestic-mighty Indr Dev! You should get Somras and fill the two segments of your belly with it. Hey Indr Dev! Listen-consider our invocation and come before us, accept our requests, be ready-prepared for large scale war with your means of protection, gladly.
इन्द्रस्य नु प्रा वोचं वीर्याणि यानि चकार प्रथमानि वज्री।
अहन्नहिमन्वपस्ततर्द प्र वक्षणा अभिनत् पर्वतानाम्॥
वज्र धारण करने वाले इन्द्र देवता के पराक्रम से युक्त कर्मों का हम वर्णन करते हैं। उन्होंने वृत्रासुर एवं मेघ का विनाश किया था। तत्पश्चात् उन्होंने वृत्र के द्वारा रूके हुए जल को प्रवाहित किया एवं शिखरों को तोड़कर नदियों हेतु मार्ग निर्मित किया।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.5)
We describe the excellent endeavours of Vajr wielding Indr Dev. He killed Vratra Sur and the clouds. Thereafter, he released the water blocked by Vratra Sur, breaking down the cliffs, paving way for the rivers.
अहन्नहिं पर्वते शिश्रियाणं त्वष्टास्मै वज्रं स्वर्यं ततक्ष।
वाश्रा इव धेनवः स्यन्दमाना अञ्जः समुद्रमव जग्मुरापः॥
उन पराक्रमी इन्द्र देवता ने वृत्र का विनाश किया तथा मेघ को विदीर्ण किया, तब वृत्र के पितामह त्वष्टा ने इन्द्रदेवता के उद्देश्य से अपने वज्र को तेज किया। तत्पश्चात् गौओं के समान अधोमुख होकर तीव्रता से बहने वाली नदियाँ समुद्र तक पहुँचीं।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.6)
Majestic Indr Dev killed Vratra Sur and teared the clouds. At that moment grand father of Vratr Twasta, sharpened the Vajr for Indr Dev. Thereafter, rivers moved towards the ocean with high speed looking at the cows.
वृषायमाणो अवृणीत सोमं त्रिकद्रुकेष्वपिबत् सुतस्य।
आ सायकं मघवादत्त वज्रमहन्नेनं प्रथमजामहीनाम्॥
वृषभ की तरह व्यवहार करने वाले इन्द्र देवता ने सोमरूप अन्न को प्रजापति से प्राप्त किया एवं तीन ऊँचे स्थानों में अभिषुत सोमरस का सेवन किया। इसी सोम की शक्ति से शक्तिशाली होकर उन्होंने बाण रूप वज्र धारण किया और हिंसक प्रवृति वाले शत्रुओं में पहले उत्पन्न हुए वृत्रासुर का संहार किया।(अथर्ववेद, इन्द्रशौर्य सूक्त 2.5.7)Indr Dev behaving like the bull, obtained food grain in the form of Som and drunk Somras extracted at three high rise places. He attained strength from the Som and wielded Vajr as an arrow. He then destroyed Vratra Sur and the enemies indulged in violent acts.
अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त (2.6) :: ऋषि :- शौनक; देवता :- अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, 4 चतुष्पदार्षी पङ्कि, 5 विराट् प्रस्तारपङ्कि।
समास्त्वाग्न ऋतवो वर्धयन्तु संवत्सरा ऋषयो यानि सत्या।
सं दिव्येन दीदिहि रोचनेन विश्वा आ भाहि प्रदिशश्चतस्रः॥
हे अग्नि देवता! आपको महीना, ऋतु, वर्ष (साल), ऋषि एवं सत्य-व्यवहार समृद्ध करें। आप दिव्य प्रकाश (तेज) से युक्त होकर सभी दिशाओं को आलोकित करें।(अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त 2.6.1)
Hey Agni Dev! Let months, seasons, Rishi Gan and truthful behaviour enrich you. You should be accompanied with divine light and illuminate all directions.
सं चेध्यस्वाग्ने प्र च वर्धयेममुच्च तिष्ठ महते सौभगाय।
मा ते रिषन्नुपसत्तारो अग्ने ब्रह्माणस्ते यशसः सन्तु मान्ये॥
हे अग्नि देवता! आप अच्छी प्रकार से दीप्तियुक्त होकर इस याजक (यज्ञ करने वाले) की मनोकामना की पूर्ति करें तथा इसे अधिक मात्रा में धन-धान्य प्रदान करने हेतु उत्साहित करें। हे अग्नि देवता! आपके साधक का कभी विनाश न हो। आपके निकट रहने वाले ब्राह्मण यज्ञ से युक्त हों एवं दूसरे अन्य जन (जो यज्ञ आदि नहीं करते) यशवान् न हों।(अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त 2.6.2)
यशवान् :: having fame or reputation; celebrated; renowned.
Hey Agni Dev! You should have shine, accomplish the desires of the Yajak granting him wealth and food grains, encouraging him. Hey Agni Dev! The means of your worshiper should never be destroyed. Brahmans close to you accomplish Yagy and those who do not perform Yagy should never become celebrated-renowned.
त्वामग्ने वृषाते ब्राहाणा हुये शिवो अग्ने संवरणे भवा नः।
समपत्नहारने अभियातिजिद् भव स्वे गये जागृहाप्रयुच्छन्॥
हे अग्नि देवता! ये विप्र याजक आपकी उपासना करते हैं। हे अग्नि देव! आप हमारी गलतियों से क्रोधित न हों। हे अग्नि देव! आप हमारे शत्रुओं एवं कुटिल कृत्य को हरा करके अपने गृह में सावधान होकर जाग्रत रहें।(अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त 2.6.3)
Hey Agni Dev! These Brahman Yajak worship you. Hey Agni Dev! Do not become angry due to our mistakes. Hey Agni Dev! Defeat our enemies and the wicked deeds, staying awake-alert in our house.
क्षत्रेणाग्ने स्वेन से रभस्व मित्रेणारने मित्रधा यतस्व।
सजातानां मध्यमेष्ठा राज्ञामग्ने विहव्यो दीदिहीह॥
हे अग्नि देवता! आप क्षत्रिय शक्ति से अच्छी प्रकार से सम्पत्र हों। हे अग्नि देव! आप अपने सखाओं के साथ सखाभाव से व्यवहार करें। हे अग्नि देव! आप समान जन्म वाले ब्राह्मणों के मध्य में विराजित होकर एवं शासकों के बीच में विशेष रूप से आवाहनीय होकर, इस यज्ञ में आलोकित हों।(अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त 2.6.4)
Hey Agni Dev! You should have the enormous strength of the Kshatriy clan. Behave like brother with your companions. You should reside amongest the Brahmans having origin like you. Become special invitee amongest the rulers-emperors and illuminate the Yagy.
अति निहो अति सृघोऽ त्यचित्तीरति द्विषः।
विश्वा ह्यग्ने दुरिता तर त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः॥
हे अग्नि देवता! आप हमारी बुराईयों (जो हमें सूअर, कुत्ते आदि की घिनौनी योनि में डालने वाले हैं।), सूखा रोगों से एवं कुटिल कृत्यों को करने के लिए उत्साहित करने वाली दुर्बुद्धियों (distracted brains, wickedness, vicious thoughts-ideas) से दूर करें। आप हमारे शत्रुओं का नाश करें या हमें शूरवीर संतानों से सम्पन्न प्रभुत्व प्रदान करें।(अथर्ववेद, सपत्नहाग्नि सूक्त 2.6.5)
घिनौनी योनि :: disgusting-nasty species, vile, dirty, abominable.
Hey Agni Dev! You should retrain us from the sins-wicked deeds which may lead to birth in lower species which are disgusting-nasty species, vile, dirty, abominable. Destroy our enemies, grant us might-power accompanied with brave sons.
अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त (2.7) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- भैषज्य, आयु, वनस्पति; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 भुरिगनुष्टुप्, 4 विराडुपरिष्टाद् बृहती।
अघद्विष्टा देवजाता वीरुच्छपथयोपनी।
आपो मलमिव प्राणैक्षीत् सर्वान् मच्छपथाँ अधि॥
भूतों द्वारा किये हुए कुटिल कृत्य को दूर करने वाली, विप्र के शाप को नष्ट करने वाली एवं देवगणों के द्वारा जन्म लेने वाली वीरुधू (पूर्वा औषधि) हमारे सम्पूर्ण शापों को उसी तरह धो डालती है, जैसे जल सम्पूर्ण गन्दगी को धो डालता है।(अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त 2.7.1)
Veerudhu (Purva medicine) evolved by the demigods, destroys the wicked-vicious deeds of the ghosts, eliminate the curse of the Brahmans and our previous curses just as the water cleanse entire filth.
यश्च सापत्नः शपथो जाम्याः शपथश्च यः।
ब्रह्मा यन्मन्युतः शपात् सर्वं तन्नो अधस्पदम्॥
शत्रुओं के शाप, नारियों के शाप एवं विप्र के द्वारा कोप में दिये गये शाप हमारे पैर के नीचे हो जाएँ (अर्थात् विनष्ट हो जाएँ)।(अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त 2.7.2)
Curses by the enemies, women and the Brahmans under anger should come below our feet i.e., are destroyed.
दिवो मूलमवततं पृथिव्या अध्युत्ततम्। तेन सहस्त्रकाण्डेन परि णः पाहि विश्वतः॥
स्वर्गलोक से मूल भाग के रूप में आने वाली एवं पृथ्वी के ऊपर फैली हुई उस सहस्रों गाँठों वाली वनस्पति (दूब) से हे मणे! आप हमारी सभी प्रकार से रक्षा करें।(अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त 2.7.3)
Hey Doob grass-Mani, having thousands of knots! Arising from the root-base of heavens spreading over the earth! Protect us in all possible ways.(04.04.2026)
परि मां परि मे प्रजां परि णः पाहि यद् धनम्।
अरातिर्नो मा तारीन्मा नस्तारिषुरभिमातयः॥
हे मणे! आप हमारी, हमारे पुत्र-पौत्रों तथा हमारे धन-वैभव की रक्षा करें। अदानी (कृपण) शत्रु हमसे आगे न बढ़े एवं हिंसा करने वाले मानव हमारा संहार करने में समर्थ न हो।(अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त 2.7.4)
Hey Mani-Jewel! Protect our sons-grandsons, wealth-grandeur. Our enemy who do not make donations should not progress more than us and the volent persons should not be able to destroys-harm the humans.
शप्तारमेतु शपथो यः सुहार्त्तेन नः सह। चक्षुर्मन्त्रस्य दुर्हार्दः पृष्टीरपि शृणीमसि॥
शाप देने वाले मनुष्य के निकट ही शाप वापस चला जाए। जो अति उत्तम अन्तःकरण वाले व्यक्ति है, वह हमारे सखा के रूप में विद्यमान् हो। हे मणे! आप अपने नेत्रों से घृणित संकेत करने वाले व्यक्तियों की पसलियों को तोड़-फोड़ डालें।(अथर्ववेद, शापमोचन सूक्त 2.7.5)
घृणित संकेत :: disgusting sign, repugnant gesture, vile sign, offensive gesture, loathsome sign.
Let the curse return to the person who cursed us. Those who have excellent innerself should be with us, as a companion. Hey Mane! Break the ribs of the person who look at us with repugnant gestures.
अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त (2.8) :: ऋषि :- मृग्वङ्गिरा; देवता-वनस्पति, यक्ष्मनाशन; छन्द :- अनुष्टुप्, 3 पथ्यापङ्क्ति, 4 विराट् अनुष्टुप्, 5 निघृत् पथ्यापंक्ति।
उदगातां भगवती विचृतौ नाम तारके। वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्॥
विचृत नाम की प्रभावपूर्ण दो तारिकाओं का जन्म हुआ है। वे वंशानुगत (माता-पिता) द्वारा मिले कुष्ठ व मिर्गी आदि व्याधि के बन्धन को खोल दें और उनका सम्पूर्ण नाश कर दें।(अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त 2.8.1)
Two starlets named Vichrat were born. Let them destroy the hereditary leprosy and hysteria.
अपेयं रात्र्युच्छत्वपोच्छन्त्वभिकृत्वरीः। वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु॥
यह रात चली जाए, हिंसक कीटाणु भी चले जाएँ वंशानुगत (कुष्ठ व मिर्गी) व्याधि की औषधि उस व्याधि का समूल नाश कर दें।(अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त 2.8.2)
Let the night pass, destructive microbes (germs, virus, bacteria), hereditary leprosy and hysteria be cured, completely by the medicine.
बभ्रोरर्जुनकाण्डस्य यवस्य ते पलाल्या तिलस्य तिलपिञ्ज्या।
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु॥
भूरे एवं श्वेत वर्ण वाले अर्जुन की काष्ठ (लकड़ी), जौ की बाल और तिल के साथ तिल की मञ्जरी रोगों को नष्ट करें। वशं परम्परा से प्राप्त रोगों का नाश करने वाली औषधि इस रोगों से मुक्त करे।(अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त 2.8.3)
जौ की बाल :: barley ear, barley spike.
तिल की मंजरी :: sesame plant flower spike-blossom, sesame inflorescence.
Let Brownish and white coloured wood-bark of Arjun tree, barley spike sesame and sesame flower spike-blossom destroy the ailments-diseases. The medicien should destroy the hereditary diseases.
नमस्ते लाङ्गलेभ्यो नम ईषायुगेभ्यः। वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु॥
व्याधि के विनाश हेतु (औषधि उत्पादन हेतु) बैलों से युक्त हल एवं काष्ठ युक्त अवयव को हम प्रणाम करते हैं। वंश परम्परा से प्राप्त व्याधि का विनाश करने वाली औषधि आपके क्षेत्रिय व्याधि को नष्ट करे।(अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त 2.8.4)
We salute the plough & its segment of wood, deploying bulls-oxen. The medicien should destroy the hereditary local diseases.
नमः सनिस्रसाक्षेभ्यो नमः संदेश्येभ्यो नमः क्षेत्रस्य पतये।
वीरुत् क्षेत्रियनाशन्यप क्षेत्रियमुच्छतु॥
(औषधि उत्पादन में सहयोगी) जल प्रवाहक अक्ष को प्रणाम, संदेश (खबर) पहुँचाने वाले को प्रणाम, औषधि उत्पादन के क्षेत्र के अधिपति को प्रणाम, क्षेत्रिय व्याधि का निवारण करने वाली औषधि इस व्याधि का शमन करे।(अथर्ववेद, क्षेत्रियरोगनाशन सूक्त 2.8.5)
Salutations to the pole directing water, messenger, lord of the land where medicines are produced. Medicine meant for local ailments cure the disease.
अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता :- यक्ष्मनाशन, वनस्पति; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 विराट् प्रस्तारपांक्ति।
दशवृक्ष मुञ्चेमं रक्षसो ग्राह्या अधि यैनं जग्राह पर्वसु।
अथो एनं वनस्पते जीवानां लोकमुन्नय॥
हे दशवृक्ष! आसुरी की भाँति इसको जकड़ने वाले गठिया नामक रोग से आप मुक्ति दिलाएँ। हे वन की औषधि! रोग के कारण कुछ भी करने योग्य न रहे जाने वाले इस मनुष्य को फिर से मानव समाज में जाने-आने के योग्य बनाएँ।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9.1)
दशवृक्ष :: दस वृक्षों का समूह, यह एक विशेष वनस्पति समूह है जिसका उपयोग यक्ष्मा (टीबी) नाशक और रोग-मुक्ति के लिए किया जाता है।
Hey Dash Vraksh! Remove-cure the arthritis. Hey forest medicine! Grant potential to the person who's vitality has been lost due to disease making him fit for movement in the society.
आगादुदगादयं जीवानां व्रातमप्यगात्। अभूदु पुत्राणां पिता नृणां च भगवत्तमः॥
हे वनस्पते! आपकी कृपा से यह मनुष्य जिंदगी पाकर प्राणधारी व्यक्तियों के समूह में फिर से आ जाए तथा अपने पुत्रों का पितामह (पिता) हो जाए एवं व्यक्तियों के मध्य में अत्यन्त सौभाग्यशाली बन जाए।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9.2)
Hey vegetation! By virtue of your mercy the person suffering from communicable diseases return to normal life and become very lucky-fortunate for the grandsons.
अधीतीरध्यगादयमधि जीवपुरा अगन्। शतं ह्यस्य भिषजः सहस्रमुत वीरुधः॥
रोगों से मुक्त हुए मनुष्यों को विद्याओं का ज्ञान हो जाए एवं मनुष्यों के रहने की जगह पुनः ज्ञात हो जाए, क्योंकि इस व्याधि के सैकड़ों वैद्य हैं एवं सहस्रों औषधियाँ हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9.3)
A person having become free from diseases acquire knowledge in various disciplines, since their are hundred of Vaedy-doctors for this ailment and thousands of medicines.
देवास्ते चीतिमविदन् ब्रह्माण उत वीरुधः। चीतिं ते विश्वे देवा अविदन् भूम्यामधि॥
हे औषधे! रोगों के दर्द से रोगी को मुक्त करने एवं व्याधि को रोकने में आपकी शक्ति से सभी देवता परिचित हैं। इस तरह भूमि के ऊपर आपके गुण-धर्म से देवता, विप्र तथा वैद्य परिचित हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9.4)
Hey medicine! The demigods are aware of your power to relieve the patient from the pain caused by the disease. Over the earth demigods, Brahmans and Vaedy are aware of your characterises.
यश्चकार स निष्करत् स एव सुभिषक्तमः।
स एव तुभ्यं भेषजानि कृणवद् भिषजा शुचिः॥
जो वैद्य (चिकित्सक) निरंतर चिकित्सा का कार्य करते हैं, वही सफलता प्राप्त करते हैं तथा वही अति उत्तम चिकित्सक बनते हैं। वही वैद्य दूसरे वैद्यों से विचार विमर्श करके आपके व्याधियों की चिकित्सा कर सकते हैं।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.9.5)
The medical practitioner who continue with the practice, become a successful doctor. He can discuss the disease-ailments with other doctors to cure you.
अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त (2.10) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता :-1-8 द्यावापृथिवी, 1 ब्रह्म, निर्ऋति, 2 आपोदेव, अग्नि (पूर्वपाद), सोम, ओषधि समूह (उत्तर पाद), 3 पूर्वपाद का वात, उत्तर पाद का चारों दिशाएँ, 4-8 वातपत्नी, सूर्य, यक्ष्म, निर्ऋति; छन्द :- सप्तपदा धृति, 1 त्रिष्टुप्, 2 सप्तपादष्टि, 6 सप्तपदा अत्यष्टि।
क्षेत्रियात् त्वा निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्।
अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
हे रोगिन! हम तुम्हे पिता प्राप्त रोग से, पीड़ा से, द्रोह से, बन्धुओं के कोप से एवं वरुण देव के बन्धन से मुक्त करते हैं। हम तुम्हें ब्रह्मज्ञान से दोष मुक्त करते हैं तथा यह द्यावापृथिवी भी तुम्हारे हेतु कल्याणकारी हो।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.1)
Hey person suffering from disease! We relieve you from the hereditary disease, cheating, pain-sorrow, anger of brothers and ties-bonds developed by Varun Dev. We relieve from the defect-flaws by the use of Brahm Gyan and let the heavens & earth become beneficial to you.(05.04.2026)
शं ते अग्निः सहाद्भिरस्तु शं सोमः सहौषधीभिः। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
है रोगों से पीड़ित मनुष्य! सम्पूर्ण जल के साथ अग्नि देवता आपके हेतु हित करने वाले हो एवं काम्पील (कबीला) आदि औषधियों के संग सोम का रस भी आपके हेतु सन्तुष्टकारी हो। हम आपको क्षेत्रिय व्याधि में, दुःख से, प्रोह से, स्वजन के कोप से एवं वरुण देव के बंधन से मुक्त करके, ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोषों से रहित करते हैं। यह धावा-पृथिवी भी आपके हेतु लाभकारी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.2)
Hey man suffering from diseases! Let Agni Dev along with entire water should be beneficial to you. Let Kampeel (Kabila) and other medicine along with Somras be beneficial-curative to you. We relieve you from local ailments, pain-sorrow, anger of own people and the ties-bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
शं ते वातो अन्तरिक्षे वयो धाच्छं ते भवन्तु प्रदिशश्चतस्त्रः। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद द्वहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणः त्वा कृणौमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
हे रोगों से अस्त प्राणी! द्यावा-पृथ्वी पर भ्रमण करने वाले वायु देव आपको शक्ति एवं लाभ प्रदान करें एवं चहुँ दिशा आपके हेतु कल्याणकारी हों। हम आपको वंश परम्परा से प्राप्त व्याधि, द्रोह, दुःख, स्वजन के कोप एवं वरुणदेव के बन्धन से मुक्त करके, ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोषों से मुक्त करते है। यह द्यावापृथ्वी भी आपके हेतु शुभकारी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.3)
द्रोह :: दुष्टता, द्वेष, डाह, दुष्ट भाव, बदख़्वाहता, हानिकरता, नमकहरामी, बेवफ़ाई, राज-द्रोह, नुक़सान देह, कपट, treachery, malignancy, disloyalty, malevolence.
Hey living being suffering from diseases! Let Vayu Dev roaming over the earth grant you strength and become beneficial to you in all directions. We relieve you from hereditary diseases, malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
इमा या देवीः प्रदिशश्चतस्रो वातपत्नीरभि सूर्यो विचष्टे। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् हुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
प्रकाशमयी चहुँ उपदिशाएँ वायुदेव की भार्या हैं, उनको आदित्यदेव चारों ओर से देखते हैं। वे आपका कल्याण करें। हे रोगों से ग्रस्त मनुष्य! हम भी आपको वंश परम्परा से प्राप्त व्याधि, द्रोह स्वजन के कोप एवं वरुण देव के बन्धन से मुक्त करके ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोष मुक्त करते हैं। यह द्यावा-पृथिवी भी आपके हेतु हितकारी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.4)
Shinning-illuminated sub directions are wife of Vayu Dev watched by Adity Dev from all sides. Hey man sufferings from ailments! We relieve you from hereditary diseases, malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
तासु त्वान्तर्जरस्या दधामि प्र यक्ष्म एतु निर्ऋतिः पराचैः। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्हत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
हे रोगिन्! हम आपको रोगों से मुक्त करके दीर्घ आयु (वृद्धावस्था) तक जीवित रहने हेतु उन चारों दिशाओं में विद्यमान् करते हैं। आपके निकट से क्षय नामक व्याधि और समस्त पीड़ा अधोमुखी होकर दूर चली जाएँ। हे रोगों से पीड़ित प्राणी! हम आपको वंश परम्परा से प्राप्त व्याधि, पीड़ा, द्रोह संबन्धियों के कोप तथा वरुणदेव के बन्धन से मुक्त करके, ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोषों से मुक्त करते हैं। यह द्यावापृथिवी भी आपके हेतु शुभकारी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.5)
Hey patient! We establish you in the four directions relieving from diseases, granting you long life. Let tuberculosis TB and all sorts of pains look down and move away from you. Hey living being suffering from ailments! We relieve you from hereditary diseases, malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
अमुक्था यक्ष्माद् दुरितादवद्याद् द्रुहः पाशाद् ग्राह्याश्चोदमुक्थाः। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
हे रोग से पीड़ित मनुष्य! क्षय रोग (दमा रोग), रोग के पाप, निन्दनीय कर्म, विद्रोह के पाश एवं जकड़ने वाले वात रोग से आप मुक्ति पा रहे हैं। कहने का तात्पर्य यह है कि पूर्णतया छुटकारा पा रहे है। हम भी आपको पिता से प्राप्त रोगों की तकलीफ, द्रोह, सम्बन्धियों के कोप एवं वरुणदेव के बन्धन से मुक्त करके, ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोष रहित करते हैं। यह द्यावापृथिवी भी आपके हेतु शुभकारी सिद्ध हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.6)
Hey patient! You are being relieved from TB-asthma, sins of diseases, vicious deeds, bonds of treachery, arthritis. We relieve you from hereditary diseases, malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
अहा अरातिमविदः स्योनमप्यभूर्भद्रे सुकृतस्य लोके। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद् द्रुहो मुञ्चामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
हे रोग से पीड़ित मनुष्य! आप शत्रु सदृश बाधक व्याधि से मुक्ति प्राप्त करके प्रसन्नतापूर्वक रहें। आप अपने अच्छे कर्मों के फलस्वरूप इस मंगलकारी लोक में आए हैं। हम भी आपको वंश परम्परा से प्राप्त व्याधि की पीड़ा, द्रोह, सम्बन्धियों के कोप एवं वरुणदेव के बन्धन से मुक्त करके, ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोष मुक्त करते हैं। यह द्यावा-पृथिवी भी आपके हेतु मंगलकारी सिद्ध हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.7)
Hey patient! You should be relieved from the disease caused-induced by the enemy and live happily. We relieve you from hereditary diseases, malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
सूर्यमृतं तमसो ग्राह्या अधि देवा मुञ्चन्तो असृजन्त्रिरेणसः। एवाहं त्वां क्षेत्रियान्निर्ऋत्या जामिशंसाद इहो मञ्जामि वरुणस्य पाशात्। अनागसं ब्रह्मणा त्वा कृणोमि शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्॥
जिस तरह देवगणों ने सत्य रूप सूर्य की राहु नाम के ग्रह से रक्षा की थी, उसी तरह हम आपको विहा से प्राप्त व्याधि को पीडा, द्रोह के बुरे कर्म, सम्बन्धियों के क्रोध एवं वरुण देवता के बन्धन से मुक्त करके ब्रह्मज्ञान के द्वारा दोष से मुक्त करते हैं। यह द्यावा-पृथिवी आपके हेतु मंगलकारी हों।(अथर्ववेद, पाशमोचन सूक्त 2.10.8)
The way demigods protected truthful Sury Dev from Rahu, similarly we relieve you from the disease called Viha malevolence, pain sorrow, anger of own people, bonds of Varun Dev with the help of Brahm Gyan. Let heavens & earth be beneficial to you.
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अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त (2.11) :: ऋषि :- शुक; देवता :- कृत्यादूषण; छन्द :- त्रिपदा परोष्णिक्, 1 चतुष्पदा विराट् गायत्री, 4 पिपीलिक मध्या निवृत् गायत्री।
दूष्या दूषिरसि हेत्या हेतिरसि मेन्या मेनिरसि। आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम॥
हे तिलक मणे! आप दोषों का भी विनाश करने में सक्षम है। विनाशक अस्त्रों के लिए आप संहारक अस्त्र की भाँति है। आप वज्र के भी वज्र हैं, अतः श्रेयस्कर बनें। दोषों की समानता से आगे सिद्ध हों अर्थात् हमारा विनाश करने वाले शत्रुओं का आप संहार करें।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.11.1)
श्रेयस्कर :: यह उस चीज़ को संदर्भित करता है जो भलाई, सुख या बेहतर परिणाम लाए। कल्याणकारी, अधिक वांछनीय-बेहतर, लाभकारी, preferable, beneficial, salutary.
Hey Tilak Mani! You are capable of removing defects. You are like the weapon to destroy destructive weapons. You are the Vajr of Vajr, hence become salutary & destroy our destroyers. Prove beyound the defects.
स्रवक्त्योऽसि प्रतिसरोऽसि प्रत्यभिचरणोऽसि। आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम॥
आप स्रक्त्य हैं अर्थात् तिलक वृक्ष से उत्पन्न हैं। आप प्रतिसर हैं अर्थात् आघात को उलट देने बाले हैं। आप प्रत्याक्रमण अर्थात् शत्रुओं को उलट कर जबाव देने में सक्षम है। अस्तु, आप कल्याणकारी बनें एवं शत्रुओं की समानता से आगे सिद्ध हो अर्थात् अपने समान शक्तिशाली शत्रुओं को परास्त करके उससे भी बलशाली शत्रुओं का संहार करें।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.11.2)
स्रक्त्य :: एक विशेष मणि या ताबीज से है। यह आम तौर पर 'तिलक वृक्ष' की लकड़ी से बना होता है और माना जाता है कि यह वशीकरण या सुरक्षात्मक गुणों वाला होता है।
You are born out of the wood called Satrkty as a jewel-Mani. You reverse the strike. You are capable of answering the enemy in the same coin. Hence, become beneficial and proved beyond the capability-power of the enemy.
प्रति तमभि चर यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः। आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम॥
वो शत्रु हमसे ईष्या करते हैं अर्थात् हमारे कार्य में बाधा उत्पन्न करते हैं एवं जिससे हम ईर्ष्या करते है, उन पर आप उलट कर आक्रमण करें। इस प्रकार आप कल्याणकारी बनें, अपने सदृश शतिशाली शत्रुओं को परास्त करके उससे भी बलशाली शत्रुओं का संहार करें।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.11.3)
Counter attack the enemy who is envious to us, create obstecles in our endeavours. Become beneficial to us. Defeat the enemies stronger than us and destroy the powerful enemies as well.
सूरिरसि वर्चीधा असि तनूपानोऽसि। आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम॥
हे मणे! आप ज्ञान से युक्त हैं, तेज को धारण करने में सक्षम हैं एवं शरीर की रक्षा करने वाले है। इस प्रकार आप कल्याणकारी सिद्ध हों, दोषों की समानता से आगे बढ़े अर्थात् अपने सदृश और असे भी अधिक शक्तिशाली शत्रुओं का विनाश करने में सक्षम हों।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.11.4)
Hey Mani! You are associated with Gyan-enlightenment, capable of holding radiance-aura and protector of the body. Prove beneficial, proceed beyond the equality of defects becoming capable of destroying the enemies either equivalent to you or powerful than you.(06.04.2026)
शुकोऽसि भ्राजोऽसि स्वरसि ज्योतिरसि। आप्नुहि श्रेयांसमति समं क्राम॥
आप शुक्र (उज्जवल या पराक्रमी) है, तेज से युक्त है, आत्मसत्ता से युक्त हैं एवं ज्योतिरूप अर्थात् सूर्य की तरह स्वयं प्रकाशवान् हैं। आप कल्याणकारी सिद्ध हों एवं अपने से समान स्तर वाले शत्रुओं से आगे बढ़े।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.11.5)
You are majestic, possess Tej, has self control and bright like the Sun. You should be beneficial and grow-rise more than the enemy of same status.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.12) :: ऋषि :- भरद्वाज; देवता :- 1 द्यावापृथिवी, अन्तरक्षि, 2 देवगण, 3 इन्द्र, 4 आदित्यगण, वसुगण, पितर अङ्गिरस, 5 पितर सौम्य, 6 मरुद्गण, ब्रह्मद्विट्, 7 यमसादन (यमस्थान), ब्रह्म, 8 अग्नि; छन्द :- त्रिष्टुप्, 2 जगती, 7-8 अनुष्टुप्।
द्यावापृथिवी उर्व 1 न्तरिक्ष क्षेत्रस्य पत्न्यूरुगायोऽद्भुतः।
उतान्तरिक्षमुरु वातगोपं त इह तप्यन्तां मयि तप्यमाने॥
द्यावा-पृथिवी, फैला हुआ अंतरिक्ष, सम्पूर्ण स्थानों की प्रकृति (पत्नी), दिव्य सूर्य देवता, वायु को जगह देने वाला विस्तृत अंतरिक्ष आदि हमारे तप्त होने पर ये सभी संतप्त हो जाएँ अर्थात् अनिष्ट निवारण हेतु उद्यत हो जाएँ।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.1)
Heavens-earth and the vast sky-space, nature, divine Sury Dev, vast space granting place to Vayu Dev should become satisfied-satiated when we are satisfied i.e., they should be ready to remove the unfortunate events (removal of evil/harm, prevention of misfortune/calamity, averting evil/untoward incidents).
इदं देवाः शृणुत ये यज्ञिया स्थ भरद्वाजो मह्यमुक्थानि शंसति।
पाशे स बद्धो दुरिते नि युज्यतां यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति॥
हे यजनीय (यज्ञ के योग्य) देवगणों! आप हमारी प्रार्थना सुनें कि ऋषि भरद्वाज हमें मनचाही वस्तुओं के फल के उद्देश्य से अभिचार योग्य मंत्र आदि प्रदान कर रहे हैं। अच्छे कार्यों में मग्न रहने वाले हमारे चित्त को जो शत्रु दुःखी करते हैं, उन पापों को बन्धन में बाँधकर सही जगह पर नियोजित करें।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.2)
अभिचार :: तंत्र-मंत्र और यंत्रों के माध्यम से किए जाने वाले अनुचित, हिंसात्मक या तांत्रिक क्रियाओं से है, जिन्हें अक्सर नकारात्मक ऊर्जा (ब्लैक मैजिक) माना जाता है। इसका उद्देश्य आमतौर पर किसी को हानि पहुँचाना, वश में करना या शत्रु को दूर करना होता है; Black Magic, witchcraft, sorcery, incantation, malevolent purpose.
अभिचार के मुख्य प्रकार (छह कर्म) :-
मारण :- शत्रु की हत्या या प्राणनाश करना।
मोहन :- किसी को मोहित करना या अचेत करना।
स्तंभन :- किसी की गति या शक्ति को रोकना।
विद्वेषण :- दो लोगों के बीच द्वेष या नफरत पैदा करना।
उच्चाटन :- किसी के मन को चंचल कर उसे स्थान से विचलित करना।
वशीकरण :- किसी को अपने वश में करना।
Hey worshipable demigods! Respond to our prayers that Rishi Bhardwaj is granting Occult Rituals for attaining desired goods. Our enemies tease us while we are busy with virtuous deeds. Tie them up with sins and put-fix at the proper place.
इदमिन्द्र शृणुहि सोमप यत् त्वा हृदा शोचता जोहवीमि।
वृश्चामि तं कुलिशेनेव वृक्षं यो अस्माकं मन इदं हिनस्ति॥
हे वज्रधारी इन्द्र देव! आप सोमरस के सेवन द्वारा प्रसन्न चित्त से हमारी बातों का श्रवण करें। शत्रुओं द्वारा किये गये बुरे कर्मों के कारण हम आपको बार-बार बुलाते हैं। जो शत्रु हमारे चित्त को दुःख पहुँचाते हैं, हम उनको फरसे से पेड़ की भाँति काटते हैं।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.3)
Hey Vajr wielding Indr Dev! You gladden by drinking Somras and respond-listen to our words. By invoke you again and again, since the enemies resort to wicked-vicious, evil deeds. We tear them like trees with axes, when they pain our innerself.
अशीतिभिस्तिसृभिः सामगेभिरादित्येभिर्वसुभिरङ्गिरोभिः।
इष्टापूर्तमवतु नः पितृणामामुं ददे हरसा दैव्येन॥
तीन (विद्याओं अथवा छन्दों) और अस्सी मंत्रो के साथ सामगान करने वालों के संग, वसु, अंगिरा (रुद्र) व आदित्यों अर्थात् दिव्य पितरों के साथ हमारे पितरों द्वारा किये गए इष्ट (यज्ञ-उपासनादि) एवं पुण्य कर्म हमारी सुरक्षा करें। हम अद्भुत सामर्थ्य तथा क्रोध पूर्वक अपने शत्रु को अपने अधीन कर लेते हैं।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.4)
अधीन कर लेना :: subjugate, bring under control, master, take over.
Let the Yagy accomplish by us with three branches of learning Chhand etc, 80 Mantrs sung with Sam Gan, Vasu Gan, Rishi Angira, Rudr, divine Manes and our Manes-Pitr Gan, our virtuous-auspicious endeavours. We subjugate our enemy with our amazing power and anger.
द्यावापृथिवी अनु मा दीधीथां विश्वे देवासो अनु मा रभध्वम्।
अङ्गिरसः पितरः सौम्यासः पापमार्छत्वपकामस्य कर्ता॥
हे द्यावा-पृथिवी हमारे अनुकूल होकर आप तेज से युक्त बनें। हे सम्पूर्ण देवगणों! हमारे अनुकूल होकर आप काम की शुरुआत करें। हे अंगिराओं एवं सोमवान् पितरों! हमारा बुरा चाहने वाले पाप के हिस्सेदार बने।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.5)
Hey heavens & earth! You should be favourable to us and become majestic, acquiring Tej. Hey entire demigods! Become favourable to us and begin with work. Hey Angira Gan and Som Pitr Gan! Those who wish to go against us should share our sins.
अतीव यो मरुतो मन्यते नो ब्रह्म वा यो निन्दिषत् क्रियमाणम्।
तपूंषि तस्मै वृजिनानि सन्तु ब्रह्मद्विषं द्यौरभिसंतपाति॥
हे मरुद्गणो! जो अतिवादी ब्रह्मज्ञान की एवं तदनरूप (समयानुसार) किये जाने वाले काम की बुराई करते हैं, उनकी सभी कोशिश उन्हें दुःख देने वाली हो। द्युलोक (स्वर्गलोक) उन ब्रह्म द्वेषियों को दुःख पहुंचाएँ।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.6)
Hey Marud Gan! The extremists who blaspheme Brahm Gyan or the endeavours under taken as per occasion their efforts should pain-torture them. Let heavens pain -torture who cause pain-sorrow to the Brahm Gyani.
सप्त प्राणानष्टौ मन्यस्तांस्ते वृश्चामि ब्रह्मणा। अया यमस्य सादनमग्निदूतो अरङ्कृतः॥
हे शत्रु अथवा रोग! तुम्हारे सप्त प्राणों एवं अष्ट प्रमुख नाड़ियों आदि को हम भेदते हैं। तुम अग्नि देव को दूत बनाकर यमराज के गृह में विराजमान हो जाओ अर्थात् यमस्थान चले जाआ।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.7)
Hey enemy or disease! We tear-pierce into you seven Air vital and the eight main nerves. You should move to Yam Lok as an emissary of Vayu Dev.
आ दधामि ते पदं समिद्धे जातवेदसि। अग्निः शरीरं वेवेष्ट्वसुं वागपि गच्छतु॥
हम तुम्हारे पदों (पैरों) को प्रज्वलित अग्नि में डालते हैं। यह अग्नि आपके शरीर में घुस जाए एवं आपकी वाणी तथा प्राण में व्याप्त हो जाए।(अथर्ववेद, श्रेयः प्राप्ति सूक्त 2.12.8)
We burn your feet and put them into fire. Let the Agni-fire pierce your body and pervade your speech-voice and the air Vital.
अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त (2.13) :: ऋषि :- अथवां; देवता :- 1 अग्नि, 2-3 बृहस्पति, 4-5 आयु, विश्वेदेवा; छन्द :- त्रिष्टुप्, 4 अनुष्टुप्, 5 विराट् जगती।
आयुर्दा अग्ने जरसं वृणानो घृतप्रतीको घृतपृष्ठो अग्ने।
घृतं पीत्वा मधु चारु गव्यं पितेव पुत्रानभि रक्षतादिमम्॥
हे तेज से युक्त अग्नि देवता! आप जीवन प्रदाता एवं स्तुति स्वीकार करने वाले हैं। आप घी के सदृश बलशाली और घी का उपभोग करने वाले हैं। आप मधुर गव्य पदार्थों का उपभोग करके इस प्राणी की सभी तरह से उसी तरह सुरक्षा करें, जिस प्रकार पिता पुत्र की सुरक्षा करता है।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.13.1)
गव्य पदार्थ :: गाय से प्राप्त पाँच पवित्र और पौष्टिक तत्व; दूध, दही, घी, गोमूत्र और गोबर का मिश्रण है। आयुर्वेद में इसे गौपैथी के रूप में जाना जाता है, जो रोग प्रतिरोधक क्षमता बढ़ाने, शारीरिक शुद्धि और पाचन में सुधार के लिए अत्यंत औषधीय माना जाता है। इसके अलावा, यह कृषि में जैविक खाद और कीटनाशक के रूप में भी प्रयोग होता है।
Hey Agni Dev possessing Tej-aura, radiance! You are the life granter and accept the Stuties-prayers. You are strong like Ghee and consume Ghee. You consume the sweet goods obtained from cow and protect this living being like the father who protect his son.
परि धत्त धत्त नो वर्चसेमं जरामृत्युं कृणुत दीर्घमायुः।
बृहस्पतिः प्रायच्छद् वास एतत् सोमाय राज्ञे परिधातवा उ॥
हे देवताओं! आप इस बालक को तेज से युक्त बनाने के साथ ही वस्त्र आदि प्रदान करे। आप लम्बी आयु प्रदान करें। आप बुढ़ापे के बाद मृत्यु प्राप्त करने वाला बनाएँ। बृहस्पति देवता ने यह परिधान राजा सोम को दयापूर्वक दिया था।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.13.2)
Hey demigods! Make this boy majestic-having Tej by granting clothing etc. Grant him long life. Let it make death prone after the old age. Dev Guru Brahaspati granted this cloth to King Som due to mercy.
परीदं वासो अधिथाः स्वस्तयेऽ भूगृष्टीनामभिशस्तिपा उ।
शतं च जीव शरदः पुरूची रायश्च पोषमुपसंव्ययस्व॥
हे बालक! इस परिधान को तुम अपने मंगल (कल्याण) के उद्देश्य से धारण करो। तुम गौओं (इन्द्रियों) को नष्ट होने से रक्षा करने हेतु ही हो। तुम सैकड़ों वर्ष की लम्बी आयु प्राप्त करो एवं प्रभुत्व व पोषण का ताना-बाना बुनते रहो अर्थात् पुत्र-पौत्रों से सुखी हो व प्रभुत्व प्राप्त करो।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.13.3)
Hey child! Wear this cloth for your welfare. You should become protector of cow-sense organs. You should attain life of hundreds of years, attain power and keep on nourishing-nurturing the sons-grandsons and become mighty.(07.04.2026)
एह्यश्मानमा तिष्ठाश्मा भवतु ते तनूः। कृण्वन्तु विश्वे देवा आयुष्टे शरदः शतम्॥
हे बालक! आओ इस पत्थर पर विद्यमान हो जाओ अर्थात् साधना करने के लिए जिससे कि तुम्हारा शरीर पत्थर के सदृश मजबूत बन जाए। देव शक्तियों तुम्हें दीर्घायु प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.13.4)
साधना :: जानना, प्राप्त करना, वसूल करना, अनुभव करना, पूर्ण करना, सिद्ध करना, साध लेना, साधन करना, अभ्यास करना, उद्यम करना, जीविका चलाना, मांजना; meditation, practice, accomplish, realize.
Hey boy-child! Come, sit over this rock for meditation so that your body become strong like the rock. Let divine powers grant you long life.
यस्य ते वासः प्रथमवास्यं 1 हरामस्तं त्वा विश्वेऽवन्तु देवाः।
तं त्वा भ्रातरः सुवृधा वर्धमानमनु जायन्तां बहवः सुजातम्॥
हे बालक! तुम्हारे जिस अस्तित्व हेतु यह पहला वस्त्र प्रदान किया गया है, उसकी सुरक्षा सभी देवगण करें। इसी तरह उत्तम उत्पत्ति वाले, सुवर्धित एवं विकास करने वाले और भी भाई तुम्हारे पीछे हों।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 2.13.5)
Hey child! The purpose for which this first cloth has been given to you, should be protected by the demigods-deities. Similarly, brothers having excellent origin grown properly, should stand behind you.
अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त (2.14) :: ऋषि :- चातन; देवता :- शालाग्नि; छन्द :- अनुष्टुप्, 2 भुरिक अनुष्टुप, 4 उपरिष्टाद् विराट् बृहती।
निः सालां धृष्णुं धिषणमेकवाद्यां जिघत्स्वम्। सर्वाश्चण्डस्य नप्त्यो नाशयामः सदान्वाः॥
निःसाला अर्थात् निष्कासित करने वाली, धृष्णु (भयावह), धिषण (अभिभूत करने वाली), एकवाद्या (हठ के साथ एक ही स्वर से वार्तालाप करने वाली) संबोधन वाली, खा जाने वाली एवं सदैव चिल्लाने वाली, चण्ड (क्रोध अथवा कठोरता) की संतानों का हम नाश कर देते हैं।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.1)
We destroy the progeny which expel, make furious sounds, enchant, sound in one voice, eat, angry and tough (in behaviour) is destroyed by us.
निर्वी गोष्ठादजामसि निरक्षान्निरुपानसात्। निर्वी मगुन्द्या दुहितरो गृहेभ्यश्चातयामहे॥
हे मगुन्दी (पाप को जन्म देने वाली) आसुरी (राक्षसी) की पुत्रियों! हम तुम्हें अपने गौओं की गोशालाओं से निष्कासित करते हैं। हम तुम्हें ऐश्वर्य युक्त भवनों, वाहनों से बाहर निष्कासित करके नष्ट कर देते हैं।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.2)
Hey producer of sins, daughters of the demoness! We expel you from the cow shed. We expel from the houses having grandeur and torture-pain you.
असौ यो अधराद् गृहस्तत्र सन्त्वराय्यः। तत्र सेदिन्र्युच्यतु सर्वाश्च यातुधान्यः॥
(निष्कासित की जाने पश्चात्) अरायि (दरिद्रता अथवा विपत्ति जन्य) एवं सेदि (क्लेश अर्थात् लड़ाई-झगड़ा-महामारी को उत्पन्न करने वाली) संबोधन वाली (राक्षसी शक्तियाँ) जो नीचे वाले घर (पाताललोक) हैं, वही जाकर निवास करें।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.3)
After being expelled, the demonic powers which cause poverty, trouble, quarrel or epidemic should move to the nether world and stay there.
भूतपतिर्निरजत्विन्द्रश्चेतः सदान्वाः।
गृहस्य बुध्न आसीनास्ता इन्द्रो वज्रेणाधि तिष्ठतु॥
मनुष्यों के पालनहार एवं सोमरस का सेवन करने वाले इन्द्र देवता सदैव आक्रोश (क्रोध) करने वाली इन राक्षसियों को हमारे गृह से बाहर निष्कासित करें एवं अपने वज्र द्वारा इनका नाश करें।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.4)
Nurturer of the humans, drinker of Somras Devraj; should always expel the angry-furious demonesses from our house and crush them with Vajr.
यदि स्थ क्षेत्रियाणां यदि वा पुरुषेषिताः। यदि स्थ दस्युभ्यो जाता नश्यतेतः सदान्वाः॥
हे राक्षसियों! तुम कुष्ठ, संग्रहणी आदि अनुवांशिक (वंश परम्परा से प्राप्त) व्याधियों की मुख्य
करण हो। तुम शत्रुओं द्वारा उकसायी जाती हो तथा नुकसान पहुँचाने वाले चोरों के निकट जन्मी हो। इस प्रकार तुम हमारे गृह से बाहर होकर नष्ट हो जाओ।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.5)
संग्रहणी रोग :: जीर्ण अतिसार, पाचन विकार है जो अनियमित मल त्याग, पेट दर्द और पेट फूलने के रूप में प्रकट होता है; irritable bowel syndrome (IBS), bloating, chronic diarrhoea, dysentery.
उकसाना :: भड़काना, उत्तेजित करना, बढ़ाके दिखाना; provoke, incite, actuate, abet, blow up.
Hey demonesses! You are the main cause behind tuberculosis, chronic diarrhoea, dysentery and other hereditary diseases. You are incited by the enemies and born near the thieves. In this manner you move out of our home and get destroyed.
परि धामान्यासामाशुर्गाष्ठामिवासरन्। अजैषं सर्वानाजीन् वो नश्यतेतः सदान्वाः॥
जिस तरह द्रुतगामी (तीव्रगति से चलने वाले) घोड़े अपने उद्देश्य की प्राप्ति हेतु पराभूत (आक्रमण) करके खड़े हो जाते हैं अर्थात् पहुँच जाते हैं, वैसे ही इन पिशाचनियों के गृह पर हम हमला कर चुके हैं। हे राक्षसियों! तुम सब संग्राम में हार गई हो तथा हमने तुम्हारे रहने की जगह पर अपना अधिपत्य कर लिया है, इसलिए तुम सब निराश्रित होकर खत्म हो जाओ।(अथर्ववेद, दस्युनाशन सूक्त 2.14.5)
The way fast moving horses attack and stand, similarly we have attacked the houses of these Vampirella. Hey demonesses! You have lost the war and we have captures your houses, hence you should be destroyed being destitute.
अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त (2.15) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- प्राण, अपान, आयु; छन्द :-त्रिपाद् गायत्री।
यथा द्यौश्च पृथिवी च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस तरह स्वर्गलोक और भूलोक न तो डरते हैं और न ही विनष्ट होते हैं, वैसे ही हे हमारे जीवन (प्राण)! तुम भी मृत्यु के भय को त्याग दो।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.1)
The way neither the heavens nor earth are afraid nor destroyed, similarly hey our Air Vital! You should forget the fear of death.
यथाहश्च रात्री च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस तरह न तो रात भयभीत होती है और न ही दिन कभी भयभीत होता है, एवं उन्हें कभी विनष्ट होने का भी भय नहीं रहता। हे मेरे प्राण! तुम भी नष्ट होने के भय से भयभीत न हो।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.2)
The way neither night nor the day are afraid and are free from of fear of destruction, hey my Air Vital! You should not be afraid of destruction.
यथा सूर्यश्च चन्द्रश्च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस प्रकार सूर्य एवं चन्द्रमा न ही कभी डरते हैं और न ही कभी नष्ट होते हैं वैसे ही हे प्राण! तुम भी नष्ट होने की शंका से नहीं डरना।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.3)
The way neither Sun nor Moon are afraid of destruction, similarly hey Air Vital! You should not be afraid of destruction.
यथा ब्रह्म च क्षत्रं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस प्रकार विप्र एवं क्षत्रिय नहीं डरते और न ही कभी समाप्त होते हैं वैसे ही हे प्राण! तुम भी नष्ट होने की शंका से नहीं डरना।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.4)
The way neither the Brahman nor the Kshatriy afraid nor finished, similarly hey Air Vital! You should not be doubtful about destruction.
यथा सत्यं चानृतं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस तरह सत्य एवं अनृत न कभी किसी से डरते हैं और न ही कभी नष्ट होते हैं, वैसे ही हे प्राण! तुम भी मरने के डर से मुक्त होकर रहो।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.5)
अनृत :: असत्य, झूठ, मिथ्या, या धोखा; falsehood, untruth, lie, unreal.
The way neither truth nor falsehood are destroyed or fear any one; similarly, hey Air Vital! You should be free from the fear of death.
यथा भूतं च भव्यं च न बिभीतो न रिष्यतः। एवा मे प्राण मा बिभेः॥
जिस तरह भूत एवं भविष्य न किसी से डरते हैं और न ही कभी नष्ट होते हैं, वैसे ही हे हमारे प्राण! तुम भी मरने के डर से मुक्त होकर रहो।(अथर्ववेद, अभयप्राप्ति सूक्त 2.15.6)
The way neither past nor future are afraid of any one nor destroyed, similarly hey Air Vital! You should be free from the fear of death.(08.04.2026)
अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त (2.16) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- प्राण, अपान, आयु: छन्द :- 1, 3 एकपदासुरी त्रिष्टुप्, 2 एकपदासुरी उष्णिक्, 4-5 द्विपदासुरी गायत्री।
प्राणापानौ मृत्योर्मा पातं स्वाहा॥
हे प्राण व अपान! आप दोनों मृत्यु से हमारी रक्षा करें तथा हमारी आहुति (यज्ञाग्नि में हवन सामग्री) ग्रहण करें।(अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त 2.16.1)
प्राण व अपान :: प्राण वायु के रूप, प्राण छाती के क्षेत्र में स्थित है, जो अंदर की ओर (inhalation) काम करती है और सांस/ऊर्जा लेती है। अपान नाभि के नीचे स्थित है, जो बाहर की ओर (exhalation) मल-मूत्र त्याग, प्रजनन और शरीर से अपशिष्ट को बाहर निकालने का कार्य करती है। इन दोनों का संतुलन शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए अनिवार्य है।
Hey Pran & Apan! Both of you protect us from the death and accept our oblations-offerings in the Hawan-Yagy.
Pran Vayu is Air Vital which sustain life & helps in respiration and Apan Vayu is released by the decomposition of food in form of carbon dioxide and a mixture of foul smelling gases.
द्यावापृथिवी उपश्रुत्या मा पातं स्वाहा॥
हे द्यावा-पृथिवी! आप दोनों हमें श्रवण करने की शक्ति प्रदान करके हमारी रक्षा करें और आहुति स्वीकार करें।(अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त 2.16.2)
Hey heaven & earth! Grant us power to hear-listen, protect us and accept our oblations-offerings in the Hawan-Yagy.
सूर्य चक्षुषा मा पाहि स्वाहा॥
हे सूर्य देवता! आप हमें देखने की शक्ति प्रदान करके हमारी रक्षा करें तथा हमारी आहुति स्वीकार करें। (अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त 2.16.3)
Hey Sury Dev! Grant us power to see and protect us. Accept our oblations-offerings in the Hawan-Yagy.
अग्ने वैश्वानर विश्वैर्मा देवैः पाहि स्वाहा॥
हे वैश्वानर अग्नि देवता! आप सम्पूर्ण देवगणों सहित हमारी रक्षा करें तथा हमारी आहुति स्वीकार करें।(अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त 2.16.4)
Hey Vaeshwanar Agni! Protect us along with all demigods-deities and accept our oblations-offerings in the Hawan-Yagy.
विश्वम्भर विश्वेन मा भरसा पाहि स्वाहा॥
हे सम्पूर्ण जीवों का पालन-पोषण करने वाले विश्वम्भर देव! आप अपनी सम्पूर्ण पोषण-शक्ति से हमारी रक्षा करें एवं आप हमारी आहुति स्वीकार करें।(अथर्ववेद, सुरक्षा सूक्त 2.16.5)
Hey nurturer of all living beings Vishwambhar Dev! Protect us with you full nourishing-nurturing capability and accept our oblations-offerings in the Hawan-Yagy.
अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त (2.17) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- प्राण, अपान, आयु; छन्द :-एकपदासुरी त्रिष्टुप्, 7 आसुरी उष्णिक्।
ओजोऽस्योजो मे दाः स्वाहा॥
हे तेजस्वी अग्नि देवता! आप तेजस्वी (ओजस्वी) है। इसलिए हमें तेज (ओज) प्रदान करें, हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.1)
तेजस्वी और ओजस्वी :: radiant, brilliant, glorious, powerful, vigorous.
Hey radiant-aurous Agni Dev! You are Tejaswi, hence grant us Tej-aura. We make offerings-oblations for you.
सहोऽसि सहो मे दाः स्वाहा॥
हे शौर्यवान् अग्नि देवता! आप शौर्यवान् है, अतः हमें शौर्य प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.2)
शौर्यवान :: बहादुर, दिलेर, साहसी, वीर; heroic, valiant, courageous, brave, gallant, chivalrous.
Hey Valiant Agni Dev! You are valiant, hence make us brave-gallant. We make offerings-oblations for you.
बलमसि बलं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप बल से युक्त हैं, इसलिए हमें बल प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.3)
Hey Agni Dev! You are mighty-powerful, hence grant us strength. We make offerings-oblations for you.
आयुरस्यायुर्मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप आयु प्रदान करने वाले हैं, इसलिए आप दीर्घायु प्रदान करें, हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.4)
Hey Agni Dev! You grant longevity, hence grant us long life. We make offerings-oblations for you.
मनुष्य को देवी-देवताओं से जरामुक्त, उत्तम स्वास्थ्य युक्त, बीमारियों से मुक्त पूर्णायु माँगनी चाहिये।
One should pray to God-goddesses for long life free from old age, full life span, free from ailments-diseases, excellent health along with their blessings.
श्रोत्रमसि श्रोत्रं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप श्रवण शक्ति (सुनने की शक्ति) से युक्त है। इसलिए आप हमें सुनने की शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.5)
Hey Agni Dev! You possess power to hear, hence grant us power to listen-hear. We make offerings-oblations for you.
चक्षुरमि चक्षुर्मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप दर्शन शक्ति (देखने की शक्ति) से युक्त है, इसलिए आप हमें वह दर्शन शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.6)
Hey Agni Dev! You possess power to see, hence grant us power to see. We make offerings-oblations for you.
परिधाणमसि परिपाणं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप परिपालन की शक्ति से युक्त है, इसलिए आप हमें यह शक्ति अर्थात् पालन करने की शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, बलप्राप्ति सूक्त 2.17.7)
Hey Agni Dev! You possess power to nourish-nurture, hence grant us power to nurture-nourish. We make offerings-oblations for you.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18) :: ऋषि :- चातन; देवता :- अग्नि; छन्द :- द्विपदा साम्नी बृहती।
भ्रातृव्यक्षयणमसि भ्रातृव्यचातनं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप शत्रुओं का संहार करने की शक्ति से युक्त हैं, इसलिए आप हमें शत्रु विनाशक शक्ति प्रदान करें। हम आपको हवि समर्पित करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18.1)
Hey Agni Dev! You possess the power to destroy the enemy, hence grant us power to destroy vanish the enemy. We make offerings-oblations for you.
सपत्नक्षयणमसि सपत्नचातनं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप स्वयं ही बैरियों का विनाश करने वाली शक्ति से युक्त हैं, इसलिए आप हमें प्रतिद्वंदिनाशक शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18.2)
Hey Agni Dev! You your self is capable of destroying the enemies, hence grant us th power to vanish the competitors. We make offerings-oblations for you.
अरायक्षयणमस्यरायचातनं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप गरीबी का विनाश करने वाले हैं, अतः आप हमें निर्धनतानाशक शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति समर्पित करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18.3)
Hey Agni Dev! You remove poverty, hence we pray to you to grant us power to vanish poverty. We make offerings-oblations for you.
पिशाचक्षयणमसि पिशाचचातनं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप राक्षसों के संहारक हैं, अतः आप हमें पिशाच नाशक शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18.4)
Hey Agni Dev! You are the destroyer of demons, hence grant us the power to eliminate vampire-demons. We make offerings-oblations for you.
सदान्वाक्षयणमसि सदान्वाचातनं मे दाः स्वाहा॥
हे अग्नि देवता! आप हमारी राक्षसी शक्ति को नष्ट करने वाली शक्ति से सम्पन्न हैं, अतः आप हमें भी वह शक्ति प्रदान करें। हम आपको आहुति प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.18.5)
Hey Agni Dev! You possess the power to destroy the demonic power in us, hence grant us that power as well. We make offerings-oblations for you.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- अग्नि; छन्द :- एकावसाना निवृत् विषमा त्रिपदा गायत्री, 5 एकावसाना भुरिक् विषमा त्रिपदा गायत्री।
अग्ने यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे अग्नि देवता! आपके भीतर जो ताप निहित है, उस तापरूपी शक्ति के द्वारा आप शत्रुओं को तप्त करें अर्थात् शत्रुओं का संहार करके प्रकाशित करें। जो शत्रु हमसे द्वेष करते हैं एवं जिनसे हम द्वेष करते हैं, उन शत्रुओं को आप संतप्त करें।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19.1)
Hey Agni Dev! Roast the enemies with the power to heat-burn in you. Destroy-burn, torture the enemies who possess enmity with us or we are envious to them.(09.04.2026)
अग्ने यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे अग्नि देवता! आपके भीतर जो हरण करने की शक्ति निहित है, उस शक्ति के द्वारा आप उन राहुओं को शांति का हरण करें, जो हमसे विद्वेष करते हैं एवं हम जिनसे विद्वेष करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19.2)
Hey Agni Dev! Abduct the peace of the Rahus (wicked, vicious) who have either malice towards us or we possess malice for them.
अग्ने यत् तेऽचिस्तेन तं प्रत्यर्च यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे अग्नि देवता! आपके भीतर जो चमक है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को जला दें, जो हमसे द्वेष करते हैं एवं जिनसे हम द्वेष करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19.3)
Hey Agni Dev! Burn our enemies with your power who have either malice towards us or we possess malice for them.
अग्ने यत् ते शोच्चिस्तेन तं प्रति शोच यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे अग्नि देवता! आपके भीतर जो शोकाकुल (शोक से व्याकुल) करने की शक्ति हैं, उस शक्ति के द्वारा आप उन मनुष्यों को व्याकुल करें, जो हमसे बैर करते हैं एवं जिनसे हम बैर करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19.4)
शोकाकुल :: उदास, रंजीदा,रोना, रंजीदा; mournful, heart breaking, tearful.
Hey Agni Dev! Generate pain-sorrow, for those who either possess enmity for us or we have enmity for them. Make our enemies make them mournful with your power.
अग्ने यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे अग्नि देवता! आपके भीतर जो पराभिभूत (शत्रु को पराजित) करने की शक्ति विद्यमान् है, उस अद्भुत शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को तेजहीन कर दें, जो हमसे द्वेष करते हैं एवं जिनसे हम द्वेष करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.19.5)
Hey Agni Dev! Use amazing power to make the enemy lustreless who are enmity towards us or we have enmity for them.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.20) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- वायु; छन्द :- एकावसाना निवृत् विषमा त्रिपदागायत्री, 5 भुरिक् विषमा त्रिपदागायत्री।
वायो यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
अंतरिक्ष में भ्रमण करने वाले, हे वायुदेव! आपके भीतर जो ताप स्थित है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को तप्त करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं एवं जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.20.1)
Hey Vayu Dev roaming in the space-sky! Burn our enemies with your heat with, who have enmity for us or we possess enmity for them.
वायो यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे हरने की शक्ति प्रदान करने वाले वायु देव! आपके भीतर जो हरण करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं की शक्ति को हरने में करें, जो हमसे बैर करते हैं एवं जिनसे हम बैर करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.20.2)
Hey Vayu Dev, granter of the power of abduction! Use power to abduct our enemies who have enmity for us or we have enmity towards them.
वायो यत् तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे वायु देवता! आपके भीतर जो प्रज्वलन करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को प्रज्जवलित करें (जला दें), जो हमसे विद्वेष करते हैं तथा जिनसे हम विद्वेष करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.20.3)
Hey Vayu Dev use your power to burn our enemies, who are envious to us or we are envious to them.
वायो यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे वायु देवता! आपके भीतर जो शोकाकुल करने की शक्ति स्थित है, उस शक्ति से आप उन व्यक्तियों को व्याकुल करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं एवं जिसे हम अपना शत्रु समझते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.20.4)
Hey Vayu Dev! Use your power to cause mourning in our enemies or those whom we consider our enemy.
वायो यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे वायु देवता! आपके भीतर जो शत्रु को दबाने की शक्ति है, उस शक्ति से आप उन शत्रुओं को निस्तेज कर दें, जो हमसे शत्रुता करते हैं एवं जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.20.5)
Hey Vayu Dev! Use power to supress our enemies making them shine less or those whom we consider our enemies.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.21) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- सूर्य; छन्द :- एकावसाना निवृत् विषमा त्रिपदा-गायत्री, 5 भुरिक विषमा त्रिपदागायत्री।
सूर्य यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे सूर्य देवता! आपके भीतर जो संतप्त करने की शक्ति विद्यमान् हैं, उस शक्ति से आप उन शत्रुओं को संतप्त करें, जी हमसे विद्वेष करते हैं और जिनसे हम विद्वेष करते हैं।
Hey Sury Dev! Use your heat to torture those who have enmity for us or we possess enmity for them.
सूर्य यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे सूर्य देवता! आपके भीतर जो हरण करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति के द्वारा आप शत्रुओं की शक्ति का हरण करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.21.2)
Hey Sury Dev! Use your power to abduct the might-power of our enemy or we possess enmity for them.
सूर्य यत् तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे शक्तिशाली सूर्य देवता! आपके भीतर जो प्रज्वलन की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को जला दें जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.21.3)
Hey mighty, majestic Sury Dev! Burn those who have enmity for us or we posses enmity for them; with your power to burn.
सूर्य यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे शोकाभिभूत शक्ति सम्पन्न सूर्यदेवता! आपके भीतर जो शोकाभिभूत (शोक से त्रस्त) करने की शक्ति निहीत है, उस शक्ति के द्वारा आप उन व्यक्तियों को शोक से संतप्त (पीड़ित) करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.21.4)
Hey Sury Dev, having the power to produce mourning! Make our enemies mourn and those as well whom we consider our enemy; with your power to cause morning.
सूर्य यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे सूर्य देवता! आपके भीतर जो पराभिभूत करने की शक्ति निहीत है, उसके शक्ति के द्वारा आप उन व्यक्तियों को निस्तेज कर दें, जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.21.5)
निस्तेज :: सुस्त, मुरझाया हुआ, ठंडा, सुस्त, मुरझाया हुआ; dull, languid, languorous, dopey.
Hey Sury Dev! Use your power to defeat our enemies and those as well whom we consider our enemy, making them dull.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.22) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- चन्द्र; छन्द :- एकावसाना निवृत् विषमा त्रिपदा गायत्री, 5 एकावसाना भुरिक् विषमा त्रिपदा गायत्री।
चन्द्र यत् ते तपस्तेन तं प्रति तप यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे चन्द्र देवता! आपके भीतर जो तापशक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति के द्वारा आप उने शत्रुओं को संतप्त करें, जो हमसे विद्वेष (घृणा) करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.22.1)
Hey Chandr (Moon) Dev! Use your heat to torture our enemies who hate us or the once whom we consider our enemies and we hate them.
चन्द्र यत् ते हरस्तेन तं प्रति हर यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे चन्द्र देवता! आपके अन्दर जो हरने की शक्ति स्थित है, उस शक्ति के द्वारा आप उन मनुष्यों की शक्ति का हरण करें जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.22.2)
Hey Chandr Dev! Use your power to abduct the strength of our enemies and those whom we consider our enemies.
चन्द्र यत् तेऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्च यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे चन्द्र देवता! आपके भीतर जो प्रज्वलन करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं की शक्ति को जलाने के लिए करें जो हमसे घृणा करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.22.3)
Hey Chandr Dev! Use your power to burn our enemies in addition to those whom we consider our enemies.(10.04.2026)
चन्द्र यत् ते शोचिस्तेन तं प्रति शोच यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे चन्द्र देवता! आपके भीतर जो शोक पीड़ित (शोकाकुल) करने की शक्ति विद्यमान है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को शोक से पीड़ित करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.22.4)
Hey Chandr Dev! Torture the enemies with your power to make our enemy mourn. Make those mourn with whom we have enmity.
चन्द्र यत् ते तेजस्तेन तमतेजसं कृणु यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे चन्द्र देवता! आपके भीतर जो शत्रु को दबाने की शक्ति है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं को निस्तेज करने के लिए करे, जो हमसे विद्वेष करते हैं और जिनसे हम विद्वेष करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.22.5)
Hey Chandr Dev! Use your power to supress our enemy or else supress those with whom we have enmity.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.23) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- आपः; छन्द :- एकावसाना समविषमा त्रिपदागायत्री, 5 स्वराट् विषमा त्रिपदागायत्री।
आपो यद् वस्तपस्तेन तं प्रति तपत यो३स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे आपः (जल देव)! आपके भीतर जो तापशक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति के द्वारा आप उन शत्रुओं को संतप्त करें, जो हमसे घृणा करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.23.1)
संतप्त :: दुखी, पीड़ित, तपा हुआ, सूखा हुआ, जलाया हुआ, झुलसाया हुआ, व्यथित, सताया हुआ, तप्त; upset, tormented, torture, red-hot, distressed, scorched, afflicted, agonised.
Hey deity of water! Torture-tease our enemies with your power to agonise or else scorch those with whom we have enmity.
आयो यद् वो हरस्तेन तं प्रति हरत यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे जल देवता! आपके भीतर जो हरण शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं की शक्ति को हरने के लिए करें, जो हमसे घृणा करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.23.2)
हरण शक्ति :: power or capacity to remove, take away, snatch, steal.
Hey deity of water! Use your power to snatch the power-might of our enemy or those who hate us, or else take away the strength of those whom we hate.
आपो यद् वोऽर्चिस्तेन तं प्रत्यर्चत यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे जल देवता! आपके भीतर जो प्रज्वलन करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं को जलाने हेतु करें, जो हमसे घृणा करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.23.3)
Hey deity of water! Use your power to burn our enemies or those who hate us or else burn those who are hated by us.
आपो यद् वः शोचिस्तेन तं प्रति शोचत यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे जल देवता! आपके भीतर जो शोकाकुल (शोक-संतप्त) करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं को शोकाभिभूत करने के लिए करें, जो हमसे विद्वेष (घृणा) करते हैं और जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.23.4)
Hey deity of water! Use your power to generate mourning to our enemies or else those whom we are envious, hateful.
आपो यद् वस्तेजस्तेन तमतेजसं कृणुत यो 3 स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः॥
हे जल देवता! आपके अन्दर जो तेजहीन (पराभिभूत) करने की शक्ति विद्यमान् है, उस शक्ति का प्रयोग आप उन शत्रुओं को निस्तेज करने हेतु करें, जो हमसे शत्रुता करते हैं और जिनसे हम शत्रुता करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.23.5)
तेजहीन :: muzzy, pale, dull, lustreless.
Hey deity of water! Use your power to make our enemies powerless-weak or else make those person lustreless with whom we have enmity.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त (2.24) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- आयु; छन्द :- 1-4 वैराजपरा पञ्चपदा पथ्यापंक्ति, 1-2 भुरिक् पुर उष्णिक्, 3-4 निवृत् पुरोदेवत्यापंक्ति 5 चतुष्पदा बृहती, 6-8 चतुष्पदा भुरिक् बृहती।
शेरभक शेरभ पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
है वधिकों (वध करने वाले) एवं सुटेरों (लूट-पाट करने वाले)! हमारी तरफ प्रेरित (फेंके हुए) तुम्हारे प्रहार (आघात, वार) तथा यातनायें (कष्ट) हमारे पास से बारम्बार लौट जाएँ। तुम साथियों को ही खायो, जिन्होंने तुम्हें हमारे पास भेजा है, उनको खाओ, (भक्षण करो) अपने ही मांस (अभिष या गोश्त) का भक्षण करो।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.1)
Hey killers-butchers and looters! Your strikes and tortures thrown-launched over us should return to you again and again. Either eat those who ate you or else eat your own flesh-meat.
शेवृधक शेवृद्ध पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे आघात करने वाले शेवृधक (अपने आश्रितों में सुख प्रदान करने वाले व अनेक अनुचर लुटेरों)! हमारी ओर तुम्हारे द्वारा फेंके जाने वाले प्रहार तथा कष्ट, पीड़ा, राक्षस और अस्त्र-शख (हथियार) हमारे पास से पुनः पुनः वापस चले जाएँ। तुम अपने मित्र का ही भक्षण करो। प्रेरित करने बालों का ही भक्षण करो, अपने ही आमिष का भक्षण करो।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.2)
शेवृधक :: यातु-राक्षस; destroying sorcerers or witchcraft, those who torture, demons, evil being or a creature (like a snake-crawling creature) involved in sorcery.
आमिष :: प्रलोभन, लालूच, आकर्षक गोश्त, the bait, lure, decoy.
Hey striking demons or looters (granting comforts-pleasure to their servants or dependents)! Weapon-missiles launched by you over us should strike back over you again and again. Eat your own friends, relatives, companions, hairs your own flesh-meat, bate.
म्रोकानुम्रोक पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे चोर और चोर के अनुचर (साथी) लुटेरों! हमारी ओर भेजे जाने वाले तुम्हारी यातनाएँ, राक्षस एवं अस्त्र-शस्त्र हमारे निकट से बारम्बार वापस लौट जाएँ। तुम्हें जिसने हमारी तरफ प्रेरित किया है अथवा जो तुम्हारे मित्र हैं, तुम उन्हीं को खाओ, स्वयं अपने गोश्त का भक्षण करो।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.3)
Hey thief or his follower-servant, looters! Tortures, weapons, missiles launched over us by you should strike back upon you. Eat those who motivated you against us, your friends or your own flesh-meat.
सर्पानुसर्प पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे साँप और साँप के साथी लुटेरों! तुम्हारे द्वारा प्रेरित की हुई यातनाएँ (कष्ट, पीड़ा) राक्षस और अख-शस्त्र हमारे समीप से बारम्बार वापस चले जाएँ एवं आपके चोर आदि अनुचर (साथी) भी वापस लौट जाएँ। आपको जिस मनुष्य ने हमारी ओर प्रेरित किया है अथवा आप अपने दल-बल सहित हमारे जिस शत्रु के निकट रहते हैं, आप उसके ही आमिष का भक्षण करें।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.4)
Hey snake or his companion looters! Let the pains-tortures, demons, missiles-weapons launched over us and your companions who motivated you against us should return, strike back over you. Let them eat the flesh-meat of our enemy with whom you are associated.
जूर्णि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे जूर्णि (शरीर को निर्बल बनाने वाली) राक्षसी एवं उनकी सहेली लुटेरियों! तुम्हारे द्वारा प्रेरित की हुई यातनाएँ (कष्ट, पीड़ा) राक्षस और अस्त्र-शस्त्र हमारे निकट से बार-बार वापस लौट जाएँ। तुम्हें जिस मनुष्य ने हमारी ओर प्रेरित किया है अथवा जो तुम्हारे अनुचर है, तुम उसके ही गोश्त को खाओ, स्वयं अपने आमिष को खाओ।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.5)
अनुचर :: सेवक, आश्रित, अनुरक्षिक; retainer, squire, followers.
Hey Joorni-demoness making the body weak & fragile and her companion looters! Tortures, pains, weapons, missies launched by you over us should strike back over you. Eat the flesh-meat of those, person-humans who motivated you against us or your servants, retainers, followers or else eat your flesh-meat.
उपब्दे पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे उपाशब्द (कर्कश शब्द) करने वाली लुटेरी राक्षसियों! हमारी ओर प्रेरित की हुई तुम्हारी यातनाएँ, राक्षस एवं अस्त्र-शस्त्र हमारे समीप से बारम्बार वापस लौट जाएँ। तुम्हें जिस मनुष्य ने हमारे निकट प्रेरित किया है या जो तुम्हारे निकट हैं, तुम उन्हीं का भक्षण करो, स्वयं अपने अमिष को खाओ।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.1)
कर्कश :: कठोर, निर्दय।, कमीला नामक पेड़, ईख; hoarse, husky.
Hey looter women-demoness making hoarse-husky sound! Your tortures, pains, demons, weapons, missiles launched over us by you; should return back and strike at you. Eat the person who motivate you against us or is close-near to you or else eat your own flesh-meat.(12.04.2026)
अर्जुनि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे अर्जुनि नाम की लुटेरी राक्षसियों! तुम्हारे द्वारा प्रेरित की हुई यातनाएँ, राक्षस और अस्त्र-शस्त्र हमारे समीप से चले जाएँ। तुम्हें जिस मनुष्य ने हमारी ओर प्रेरित किया है या जो तुम्हारे मित्र हैं, तुम उन्हीं को खाओ, स्वयं अपने आभिष को खाओ।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.7)
लुटेरी :: ऐसी महिला जो हिंसा या धमकी का उपयोग करके दूसरों से संपत्ति या पैसे चुराती हैं; female robber-bandit, looter, plunderer.
Hey looters-bandits demoness called Arjuni! Torture, pains, demons, weapons, missiles directed to us should return-strike back upon you. Eat that man who motivated you to attack us and eat your own flesh-meat.
भरूजि पुनर्वो यन्तु यातवः पुनर्हेतिः किमीदिनीः।
यस्य स्थ तमत्त यो वः प्राहैत् तमत्त स्वा मांसान्यत्त॥
हे भरूजी (नीच प्रकृति के स्वभाव वाली) लुटेरी राक्षसियों! हमारी ओर भेजी हुई तुम्हारी यातनाएँ (कष्ट, पीड़ा, राक्षस एवं अस्त्र-शस्त्र) हमारे समीप से बार-बार वापस लौट जाएँ। तुम्हें जिस मनुष्य ने हमारे निकट प्रेरित किया है अथवा जो तुम्हारे मित्र है, तुम उन्हीं दुष्ट प्रकृति वालों का भक्षण करो, स्वयं अपने गोश्त का भक्षण करो।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 2.24.8)
Hey Bharu Ji (evil-natured demoness-Ogresses) bandits demoness! Tortures, pain, trouble, weapons, missiles, demons launched at us return back to you. Eat the meat-flesh of the wicked man who motivated you or eat your own meat.
अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त (2.25) :: ऋषि :- चातन; देवता :- वनस्पति पृश्निपर्णी; छन्द :-अनुष्टुप्, 4 भूरिक् अनुष्टुप्।
शं नो देवी पृश्निपर्ण्यशं निर्ऋत्या अकः।
उग्रा हि कण्वजम्भनी तामभक्षि सहस्वतीम्॥
यह चमकने (दमकने) वाली पृश्निपर्णी औषधि हमें सुख प्रदान करे तथा हमारे व्याधियों का शमन करे। यह भंयकर व्याधियों को पूर्णतयता समाप्त करने वाली है अतः हम उस बलशाली औषधि को खाते हैं।(अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त 2.25.1)
Let this shining-lustrous medicine named Prashniparni grant us relief from ailments along with comfort. It destroys the dangerous diseases completely, hence we eat this powerful medicine.
सहमानेयं प्रथमा पृश्निपर्ण्यजायत। तयाहं दुर्णाम्नां श्रोि वृश्चामि शकुनेरिव॥
व्याधियों पर विजय प्राप्त करने वाली औषधियों में यह पृश्निपर्णी औषधि सर्वप्रथम जन्मी है। इसके द्वारा खराब नामों वाले व्याधियों के मस्तक को हम उसी प्रकार कुचलते (रौंदते) हैं, जैसे शकुनि (दुष्ट असुर) का मस्तक रौंदते हैं।(अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त 2.25.2)
Prashniparni attain victory over ailments-diseases appeared first. We destroy the ailments-diseases which have bad names; like the head of Shakuni-the wicked demon.
अरायमसृक्यावानं यश्च स्फातिं जिहीर्षति।
गर्भादं कण्वं नाशय पृश्निपणि सहस्व च॥
हे पृश्निपर्णि औषधि! आप शरीर के विकास को रोकने वाली व्याधियों का विनाश करें। हे पृश्निपर्णि औषधि! आप रुधिर का पान करने वाले एवं गर्भ को खाने वाले व्याधिरूप शत्रुओं का विनाश करें।(अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त 2.25.3)
Hey medicine called Prashniparni! Destroy the diseases which block the growth of the body. Destroy the enemies in the form of diseases which suck blood or eat the foetus.
गिरिमेनाँ आ वेशय कण्वाञ्जीवितयोपनान्। तांस्त्वं देवि पृश्निपर्ण्यग्निरिवानुदहन्निहि॥
हे देवी पृश्निपर्णि! जीवनी शक्ति का विनाश करने वाले दोषों एवं व्याधियों को आप पहाड़ पर ले जाएँ तथा उनको दावाग्नि के सदृश जला दें।(अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त 2.25.4)
Hey Devi Prashniparni! Carry the defects and diseases which destroys the strength of the body to the mountain and burn it like Davagni-Davanal.
पराच एनान् प्र णुद कण्वाञ्जीवितयोपनान्।
तमांसि यत्र गच्छन्ति तत् क्रव्यादो अजीगमम्॥
पृश्निपर्णि! जीवनी शक्ति का विनाश करने वाली व्याधियों को आप उल्टा मुँह करके ढकेल दें। सूर्य के उदित होने पर भी जिस जगह पर अंधेरा छाया रहता है, उस जगह पर शरीर की धातुओं का भक्षण करने वाले कुटिल व्याधियों को हम भेजते हैं।(अथर्ववेद, पृश्निपर्णी सूक्त 2.25.5)
कुटिल व्याधी :: complex diseases, chronic diseases, complicated ailments, difficult-to-treat diseases.
Hey Prashniparni! Push the diseases which destroy the life sustaining power, lowering their head in the down ward direction. Complicated ailments are sent-directed to those places which are dark-without Sun light.
पृश्निपर्णी एक बहुवर्षीय वनस्पति है, जिसके पुष्प अत्यंत आकर्षक होते हैं। इसे आयुर्वेद में भी अत्यधिक महत्त्वपूर्ण माना गया है तथा इसका उल्लेख अनेक प्राचीन आयुर्वेदिक ग्रंथों (सुश्रुत और चरक संहिता) में मिलता है। दशमूल के लघुमूल औषधियों में यह शामिल है।
अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त (2.26) :: ऋषि :- सविता; देवता :- पशु समूह; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 उपरिष्टात् विराट् बृहती, 4 भुरिक् अनुष्टुप्, 5 अनुष्टुप्।
एह यन्तु पशवो ये परेयुर्वायुर्येषां सहचारं जुजोष।
त्वष्टा येषां रूपधेयानि वेदास्मिन् तान् गोष्ठे सविता नि यच्छतु॥
जो पशु इस जगह से भटक कर चले गए हैं, वे फिर से इस पशुओं के बाड़े में चले आएँ। जिन पशुओं की रक्षा हेतु वायुदेव सहायता करते हैं तथा जिनके नाम स्वरूप से त्वष्टा देव परिचित है, हे सविता देवता! आप उन पशुओं को गोष्ठ (पशु आवास) में विद्यमान् करें।(अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त 2.26.1)
The animals which have strayed-moved away, should come back to the shed. The animals which are helped by Vayu Dev, who's form is familiar to Twasta Dev, hey Savita Dev! Establish those-such animals in the shed.
इमं गोष्ठं पशवः सं स्रवन्तु बृहस्पतिरा नयतु प्रजानन्।
सिनीवाली नयत्वाग्रमेषामाजग्मुषो अनुमते नि यच्छ॥
गाय आदि पशु हमारे पशुओं के बाड़े में आ जाएँ। बृहस्पति देवता उन्हें लाने की विधि से परिचित है, इसलिए वे उनको ले आएँ। सिनीवाली इन पशुओं को सामने की जगह में ले आएँ। हे अनुमते! आप आने वाले पशुओं को नियम (अनुशासन) में रखें।(अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त 2.26.2)
Let cows and other animal come to our shed. Brahaspati Dev is aware of the technique of brining them back, hence he should bring them back. Let Sinivali bring these animals in the front place. Hey Anumate! Keep your animals disciplined.
सं सं स्रवन्तु पशवः समश्वाः समु पूरुषाः।
सं धान्यस्य या स्फातिः संस्त्राव्येण हविषा जुहोमि॥
गाय आदि पशु, घोड़े एवं मानव भी एक जुट होकर चलें। हमारे यहाँ धान्य आदि की बढ़ोत्तरी भी भली-भाँति हो। हम उसको पाने हेतु घी की हवि समर्पित करते हैं।(अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त 2.26.3)
Let cows, other animals, horses and the humans march together. Food grains should increase in quantum at our place. We make offerings of Ghee to obtain them.
सं सिञ्चामि गवां क्षीरं समाज्येन बलं रसम्।
संसिक्ता अस्माकं वीरा ध्रुवा गावो मयि गोपतौ॥
हम गौओं के दुध को सिंचित करते हैं और शक्ति बढ़ाने वाले रस को घी के साथ मिश्रित (मिलाना) करते हैं। हमारे पराक्रमी पुत्र घी आदि से सिंचित हों एवं मुझ गोपित के निकट गौएँ स्थिर (अडिग) रहें।(अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त 2.26.4)
We nurse the cow's milk and mix strength boosting Ghee. Let our mighty sons be grown up with Ghee and the cows should stay with me the Gopit.
Ghee is an essential ingredient of Satvik pure vegetarian Indian food.
Ingredients are the fundamental components-substances, foods or additives, that make up a mixture, dish or product.
आ हरामि गवां क्षीरमाहार्ष धान्यं 1 रसम्।
आहृता अस्माकं वीरा आ पत्नीरिदमस्तकम्॥
हम अपने गृह में गाय का दूध, धान्य एवं रस लाते हैं। हम अपने वीरों तथा भार्या (पत्नियों) को भी गृह में लाते हैं।(अथर्ववेद, पशुसंवर्धन सूक्त 2.26.5)
We bring cow's milk, food grains and juices-saps in our home. We bring our brave person and wives to home.(13.04.2026)
अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त (2.27) :: ऋषि :- कपिञ्जल; देवता :- 1-5 ओषधि, 6 रुद्र, 7 इन्द्र; छन्द :- अनुष्टुप्।
नेच्छत्रुः प्राशं जयाति सहमानाभिभूरसि। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
हे औषधे! आपका सेवन करने वाले हम मानवों को, आपका विरोध करने वाले शत्रु कभी पराजित न कर सके, क्योंकि आप शत्रुओं से टक्कर लेकर उन्हें अपने वश में कर लेती है। आप हमारे द्वारा प्रश्न करने पर प्रतिपक्षियों को परास्त करें अर्थात् वाद-विवाद में हम वादी के प्रश्न करने पर आप प्रतिवादी को पराभूत करें। हे औषधे! आप प्रतिवादियों (विरोध करने वालों) के गले को सुखा दें अर्थात् उन्हें बोलने में असमर्थ करें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.1)
Hey medicine! We, your users humans, should not be defeated by the enemies who oppose you. You hit-collide with them and take them under your control. Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry so that they are unable to speak.
सुपर्णस्त्वान्वविन्दत् सूकरस्त्वाखनन्नसा। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
हे औषधे! गरूड़ ने आपको विष का विनाश करने के उद्देश्य से प्राप्त किया हैं एवं सूअर ने अपनी नाक से आपको खोदा है। आप हमारे द्वारा प्रश्न करने पर प्रतिपक्षियों को हरा दें। हे औषधे! आप विरोध करने वालों के गले को सुखाकर उन्हें बोलने में अशक्त बना दें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.2)
Hey medicine! Garud Ji obtained you for destroying poison and the hog-pig digged you with his nose. Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry, so that they are unable to speak.
इन्द्रो ह चक्रे त्वा बाहावसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
हे औषधे! राक्षसों से अपनी रक्षा करने के उद्देश्य से वज्रधारी इन्द्रदेव ने आपको अपनी बाजू पर विराजमान किया था। वाद-विवाद में हम वादी के प्रश्न करने पर आप प्रतिवादी को पराभूत कर दें। हे औषधे! आप विरोध करने वाले के गले को सुखाकर उन्हें बोलने में अशक्त बना दें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.3)
Hey medicine! To protect himself from the demons Vajr wielding Devraj Indr tied you over his arm. Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry so that they are unable to speak.
पाटामिन्द्रो व्याश्नादसुरेभ्य स्तरीतवे। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
हे पाठा औषधे! असुरों से अपनी रक्षा करने के उद्देश्य से वज्रधारी इन्द्र देवता ने आपका भक्षण (सेवन) किया था। आप हमारे द्वारा प्रश्न करने पर प्रतिपक्षियों को परास्त करें अर्थात् आप हम सेवन करने वाले को उद्देश्य में रखकर प्रतिवादी को असफल करें। हे औषधे! आप विरोध करने वाले के गले को सुखाकर उन्हें बोलने में अशक्त कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.4)
पाठा :: (वैज्ञानिक नाम Cissampelos pareira) एक प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जिसका उपयोग पेट दर्द, दस्त, पेचिश और त्वचा के रोगों के उपचार में किया जाता है। यह सूजन रोधी, ज्वर नाशक (बुखार कम करने वाली) और मूत्र वर्धक गुणों के लिए जानी जाती है, जो कफ और वात दोष को संतुलित करती है।
Hey medicine called Patha! Devraj Indr ate you for his protection from the demons. Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry so that they are unable to speak.
तयाहं शत्रून्त्साक्ष इन्द्रः सालावृकाँ इव। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
जिस तरह वज्रधारी इन्द्र देवता ने जंगली कुत्तों को चुप कर दिया था अर्थात् उन्हें बोलने में असमर्थ कर दिया था वैसे ही हे औषधे! आपका सेवन करके हम विरोध करने वाले शत्रुओं को चुप करते हैं। वाद विवाद में हम वादी के प्रश्न करने पर आप प्रतिवादियों के गले को सुखा करके उन्हें बोलने में अशक्त कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.5)
The way Devraj Indr silenced the wild dogs similarly, hey medicine! We silence those who oppose us. Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry so that they are unable to speak.
रुद्र जलाषभेषज नीलशिखण्ड कर्मकृत्। प्राशं प्रतिप्राशो जह्यरसान् कृण्वोषधे॥
हे रुद्र! आप जल द्वारा चिकित्सा करने वाले एवं नीले रंग की शिखा (चोटी) वाले हैं। आप सृष्टि आदि (सृष्टि, स्थिति, संहार, प्रलय एवं अनुग्रह) पंच कृत्यों को पूरा करने वाले हैं। आप हमारे द्वारा खाए जाने वाली इस औषधि को प्रतिपक्षियों को पराजित करने में समर्थ करें। हे औषधे! वाद-विवाद में हम वादी के प्रश्न करने आप प्रतिवादी को पराजित करें और उनके गले को सुखा कर उन्हें बोलने में अशक्त कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.6)
अनुग्रह :: दया, सुघड़ता, इनायत, सुंदर ढंग, श्री, पक्षपात, अनुमति, अति कृपा, पत्र, इनायत, कृपा, अनुग्रह, दया; grace, favour, graciousness.
Hey Rudr! You treat the ailment with water and has blue coloured hair lock. You perform the five endeavours viz creation-evolution, position-maintenance, destruction, vast annihilation and obligation Defeat our competitors during debate, on being questioned by us. Make the throats of the defendants dry so that they are unable to speak.
तस्य प्राशं त्वं जहि यो न इन्द्राभिदासति। अधि नो ब्रूहि शक्तिभिः प्राशि मामुत्तरं कृधि॥
हे इन्द्र देवता! जो प्रतिवादी अपनी युक्तियों (प्रयासों) के द्वारा हमें कमजोर (निर्बल) करने की इच्छा करते हैं, उनके प्रश्नों को आप पराजित करें तथा अपनी शक्ति के द्वारा हमें सर्वश्रेष्ठ बनाएँ अर्थात् आपको कृपा दृष्टि तथा अपनी शक्ति द्वारा हम वाद-विवाद करने में प्रवीण हों।(अथर्ववेद, शत्रु पराजय सूक्त 2.27.7)
युक्ति :: strategies, tactics, methods, devices.
Hey Indr Dev! Defeat our defendants-competitors who wish to make us weak with their efforts, strategies, tactics. Make their question null & void and make us win with your power. We should be expert in debate.
अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त (2.28) :: ऋषि :- शम्भु; देवता :- 1 जरिमा, आयु, 2 मित्रा-वरुण, 3 जरिमा, 4-5 द्यावा-पृथिवी, आयु; छन्द :- 1 जगती, 2-4 त्रिष्टुप्, 5 भुरिक् त्रिष्टुप्।
तुभ्यमेव जरिमन् वर्धतामयं मेममन्ये मृत्यवो हिंसिषुः शतं ये।
मातेव पुत्र प्रमना उपस्थे मित्र एनं मित्रियात् पात्वंहसः॥
हे जरिमा आयु (वृद्धावस्थे)! आपके हेतु ही यह बालक वृद्धि को प्राप्त हो तथा जो मृत्यु के समान कष्टदायी सैकड़ों व्याधियाँ है, वे इसको पीड़ित न करें। प्रसन्न चित्त वाले हे देवता! जैसे माता अपने पुत्र को गोद में लेती है, वैसे ही आप इस बालक को मित्र द्रोह जैसे कुटिल कृत्य से मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.28.1)
कुटिल कृत्य :: टेढ़ा, छली, चालबाज; sinister deed, cunning act, dishonest action. devious act, crooked act, devious deed, cunning action, something dishonest, cynical, tricky or manipulative, wicked, nefarious act, shrewd, crafty move, Machiavellian plot or sly manoeuvre.
Hey old age! This child is growing to attain you, he should not be tortured with hundreds of diseases which are as painful as death. Hey demigods-deities remaining happy! The way mother hold her child in the lap, similarly make the child free from deception by friends and other sinister deeds.
मित्र एनं वरुणो वा रिशादा जरामृत्युं कुणुतां संविदानौ।
तदग्निहर्होता वयुनानि विद्वान् विश्वा देवानां जनिमा विवक्ति॥
मित्र और शत्रु संहारक वरुण देव दोनों मिलकर इस बालक को जरिमा आयु (वृद्धावस्था) तक पहुँचकर मृत्यु प्राप्त करने वाला बनाएँ अर्थात् दीर्घायु प्रदान करें। दान करने वाले दाता एवं सभी कर्मों को विधिवत् जानने वाले अग्नि देवता बालक के लिए दीर्घ आयु की याचना करें।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.28.2)
Let Mitr and enemy destroyer Varun Dev make the child long lived free from old age and free from death. The donors and Agni Dev aware of all endeavours methodically, should pray for the long life of the child.
त्वमीशिषे पशूनां पार्थिवानां ये जाता उत वा ये जनित्राः।
मेमं प्राणो हासीन्मो अपानो मेमं मित्रा वधिषुर्मो अमित्राः॥
हे अग्नि देवता! भूमि पर जन्में हुए एवं जन्म लेने वाले सम्पूर्ण प्राणियों के आप अधिपति हैं। आपकी कृपा से इस बालक का प्राण व अपान परित्याग न करें। इसको न सखा मारे और न ही रिपु (शत्रु)।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.28.3)
Hey Agni Dev! You are the Lord of those who took birth over the earth and all living beings. By virtue of your mercy the Air Vital and Apan (foul air) should not reject this child. Neither his companions nor his enemies should kill him.
द्यौष्ट्वा पिता पृथिवी माता जरामृत्युं कृणुतां संविदाने।
यथा जीवा अदितेरुपस्थे प्राणापानाभ्यां गुपितः शतं हिमाः॥
हे बालक! तुम पृथ्वी की गोद में प्राण तथा अपान से सुरक्षित होकर सौओं वर्षों तक जीवित रहो। पिता तुल्य द्युलोक (स्वर्गलोक) एवं माता तुल्य धरती दोनों एकजुट होकर आपको जरिमा आयु (वृद्धावस्था) के पश्चात् मरने वाला बनाएँ।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.28.4)
Hey child! Survive for hundred years protected by Pran-Air Vital and Apan. Heavens alike father and earth like mother together, make you attain long life free from old age.
इममग्न आयुषे वर्चसे नय प्रियं रेतो वरुण मित्रराजन्।
मातेवास्मा अदिते शर्म यच्छ विश्वे देवा जरदष्टिर्यथासत्॥
हे अग्नि देवता! आप इस बालक को लम्बी आयु (दीर्घआयु) प्रदान करें। हे सखा वरुण! आप इस बालक को संतान को जन्म देने योग्य बनाएँ। हे अदिति देवि! आप इस बालक को माता सदृश प्रसन्नता प्रदान करें। हे सम्पूर्ण जगत् के देवता! आप सभी इस बालक को सर्वगुण सम्पन्न बनाएँ तथा शतायु प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायु प्राप्ति सूक्त 2.28.5)
सर्वगुण संपन्न :: ऐसा व्यक्ति जिसमें सफलता और उत्कृष्टता के लिए आवश्यक सभी अच्छे गुण मौजूद हों; endowed with all virtues, perfect, accomplished.
Hey Agni Dev! Grant long life to the child. Hey companion Varun! Make this child capable of giving birth to progeny. Hey Aditi Devi! Grant happiness to the child like mother. Hey deity of the whole universe! Make this child endowed with all virtues, perfect, accomplished; attaining an age of hundred years.(14.04.2026)
अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त (2.29) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 वैश्वदेवी (अग्नि, सूर्य, बृहस्पति), 2 आयु, जातवेदस्, प्रजा, त्वष्टा, सविता, धन, शतायु, 3 इन्द्र, सौपजा, 4-5 द्यावा-पृथिवी, विश्वेदेवा, मरुद्गण, उपपोदेव, 6 अश्विनी कुमार, 7 इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, 1 अनुष्टुप्, 4 पराबृहती निवृत् प्रस्तारपंक्ति।
पार्थिवस्य रसे देवा भगस्य तन्वो 3 बले।
आयुष्यमस्मा अग्निः सूर्यो वर्च आ धाद् बृहस्पतिः॥
पार्थिव रस (धरती से जन्मे या पार्थिव शरीर से जन्मे पोषक रसों) का सेवन करने वाले मनुष्य को सम्पूर्ण देवता 'भग' के सदृश शक्तिशाली बनाएँ। अग्नि देवता इसको शतायु प्रदान करें तथा आदित्य इसे तेज प्रदान करें और बृहस्पति देवता इसे वेदाध्ययन जन्य कान्ति (ब्रह्म वर्चस) प्रदान करें अर्थात् वेदों के अध्ययन से उत्पन्न होने वाली चमक प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.1)
मनुष्य की परमायु :: सात युग :- 400 वर्ष, त्रेता युग :- 300 वर्ष, द्वापर युग :- 200 वर्ष, कलि युग :- 100 वर्ष।
Ultimate Human's Age :- SAT YUG = 400 years, TRETA YUG = 300 Years, DWAPER YUG = 200 Years, KALI YUG = 100 YEARS. PARAM AYU = 105-120 Years in Kali Yug.
ब्रह्म वर्चस :: ब्रह्म तेज, आध्यात्मिक शक्ति या ब्राह्मण की वह आंतरिक पवित्रता जो तपस्या और स्वाध्याय (स्व-अध्ययन) द्वारा प्राप्त होती है। यह वह आत्म बल है, जो व्यक्ति में दिव्यता, तेज और ओज को बढ़ाता है; spiritual radiance (आध्यात्मिक तेज), divine brilliance, (दिव्य प्रतिभा), sublime energy, divine energy/power, aura of wisdom, inner purity.
Saps-juices born out of the earth should make humans as strong as demigods Bhag. Let Agni Dev grant him longevity of 100 years and Adity Dev should grant him aura-radiance. Let Brahaspati dev grant him Brahm Varchas-spiritual radiance/aura.
आयुरस्मै बेहि जातवेदः प्रजां त्वष्टरधिनिधेह्यस्मै।
रायस्पोषं सवितरा सुवास्मै शतं जीवाति शरदस्तवायम्॥
हे जात वेदा अग्निदे वता! आप इसे सौ वर्ष की आयु प्रदान करें। हे त्वष्टादेवता! आप इसे पुत्र-पौत्र आदि प्रदान करें। हे सविता देवता! आप इसे धन-वैभव तथा पोषण प्रदान करें। आपकी कृपा प्राप्त करके यह व्यक्ति शतायु प्राप्त करे।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.2)
Hey Jat Veda Agni Dev! Grant him a life of hundred years. Hey Twasta Dev grant him sons & grand sons. Hey Savita Dev! Grant him wealth, grandeur-prosperity and nourishment. By virtue of your mercy-favour let this man attain an age of 100 years.
आशीर्ण ऊर्जमुत सौप्रजास्त्वं दक्षं धत्तं द्रविणं सचेतसौ।
जयं क्षेत्राणि सहसायमिन्द्र कृण्वानो अन्यानधरान्त्सपत्नान्॥
हे द्यावा पृथिवी! आप हमें आशीष प्रदान करें। आप हमें अति उत्तम सन्तान, पराक्रम, निपुणता एवं धन-वैभव प्रदान करें। हे इन्द्र देवता! आपकी अनुकम्पा से यह मनुष्य अपने पराक्रम के द्वारा शत्रुओं को परास्त करे तथा उनके रहने के स्थानों को अपने अधिकार में ले ले।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.3)
Hey heavens & earth! Grant us blessings. Grant us excellent progeny, valour, perfection and grandeur-prosperity. Hey Devraj Indr! By virtue of your blessings, let this man defeat his enemies and occupy their place of residence.
इन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टो मरुद्भिरुग्रः प्रहितो न आगन्।
एष वां द्यावापृथिवी उपस्थे मा क्षुधन्मा तृषत्॥
वज्रधारी इन्द्र देव से आयु को ग्रहण कर, वरुण देव द्वारा शासित होकर एवं मरुतों द्वारा प्रेरणा प्राप्त करके यह मनुष्य हमारे समीप आया है। हे द्यावा पृथिवी! आपकी गोद में निवास करते हुए इस मनुष्य को क्षुधा (भूख) व तृषा (प्यास) के कारण कष्ट न हो।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.4)
This man has come to us on being inspired by Marud Gan, ruled by Varun Dev and attaining longevity from Vajr wielding Devraj Indr. Hey heavens & earth! Occupying your lap, this man should not face trouble due to hunger & thirst.
ऊर्जमस्मा ऊर्जस्वती धत्तं पयो अस्मै पयस्वती धत्तम्।
ऊर्जमस्मै द्यावापृथिवी अधातां विश्वे देवा मरुत ऊर्जमापः॥
हे शक्तिशाली द्यावा-पृथिवी! आप इस मनुष्य को अनाज तथा जल प्रदान करें। हे द्यावा-पृथिवी! आपने इस मनुष्य को अन्न-बल से सम्पन्न बनाया है तथा जगत् के देवता, मरुद्देवता और जल देवता ने भी इसको बल प्रदान किया है।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.5)
Hey mighty-powerful heavens & earth! Grant water and food grains to this man. You have made this man possessor of food grains and strength. Lord of the earth, Marud Gan and deity of water too grant him strength.
शिवाभिष्टे हृदयं तर्पयाम्यनमीवो मोदिषीष्ठाः सुवर्चाः।
सवासिनौ पिबतां मन्थमेतमश्विनो रूपं परिधाय मायाम्॥
हे तृषार्त (प्यासा) मनुष्य! हम आपके शुष्क (सूखे) हृदय को मंगलकारी जल द्वारा संतुष्ट करते है। आप प्यास रहित एवं अति उत्तम तेज से सम्पत्र होकर प्रसन्न हों। एक पोशाक धारण करने वाल ये व्याधि ग्रस्त मनुष्य, अश्विनी कुमारों की माया को स्वीकार करके इस रस का सेवन करे।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.6)
Hey thirsty man! We satiate your dried hearth (throat) with auspicious water. You should become thirstless and has excellent aura-radiance. Let this man suffering from disease, wearing single cloth, accept the illusion, magic or delusion cast by Varun Dev and rink this sap-juice.
इन्द्र एतां ससृजे विद्धो अग्र ऊर्जा स्वधामजरां सा त एषा।
तया त्वं जीव शरदः सुवर्चा मा त आ सुस्रोद् भिषजस्ते अक्रन्॥
वजधारी इन्द्र देवता ने इस रस को प्यास (तुषा) की निवृत्ति (समाप्ति) के उद्देश्य से उत्पन्न किया था। है रोग ग्रस्त मनुष्य! जो रस आपको दिया है, उसके द्वारा आप सामर्थ्य-तेज से युक्त होकर शतायु तक जीवित रहें। यह आपके शरीर से दूर न हो। आपके हेतु चिकित्सकों (वैद्यों) ने अति उत्तम औषधि का निर्माण किया है (बनाया है)।(अथर्ववेद, दीर्घायुष्य सूक्त 2.29.7)
Vajr wielding Devraj created this sap for satiation of thirst. Hey diseased patient! You should attain the age of hundred years by drinking the juice given-administered to you. It should not be away from your body. Your doctors-Vaedy have prepared excellent medicine for you.
अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त (2.30) :: ऋषि :- प्रजापति; देवता :- 1 मन, 2 अश्विनीकुमार, 3-4ओषधि, 5 दम्पती; छन्द :- अनुष्टुप, 1 पध्यापंक्ति, 3 भुरिक् अनुष्टुप्।
यथेदं भूम्या अधि तृणं वातो मथायति।
एवा मथ्नामि ते मनो यथा मां कामिन्यसो यथा मन्नापगा असः॥
हे नारी (स्त्री)! जिस तरह पृथ्वी पर स्थित तृण (तिनके) का वायु चक्कर कटाता है अर्थात् वायु के फेर में पड़ा हुआ तिनका लगातार चक्कर काटता है, वैसे ही हम आपके हृदय को मथते (झकझोरते, हिलाते) है। जिससे आप हमारी कामना करने वाली हों तथा हमें छोड़कर कहीं दूसरे स्थान घर न जा पाएँ।(अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त 2.30.1)
Hey woman! The way a straw present over the earth move through the air, similarly we agitate your hearth so that your wishes-desires are and you should not move away from your house.
सं चेन्नयाथो अश्विना कामिना सं च वक्षथः।
सं वां भगासो अग्मत सं चित्तानि समु व्रता॥
हे अश्विनी कुमारों! हम जिस चीज की आकांक्षा करते हैं, आप उसको हमारे निकट पहुँचाए। आप दोनों की किस्मत मन और व्रत हमसे मिल जाएँ।(अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त 2.30.2)
Hey Ashwani Kumars! Deliver us the desired commodities. Let your fortune and and fast-determination, resolves join us.
यत् सुपर्णा विवक्षवो अनमीवा विवक्षवः।
तत्र मे गच्छताद्धवं शल्य इव कुल्मलं यथा॥
आकर्षण पक्षी की प्रभावशाली आवाज तथा रोग रहित व्यक्ति की प्रभावशाली बोली के सदृश हमारी पुकार बाण के समान अपने लक्ष्य पर पहुँचे।(अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त 2.30.3)
Let the chirping of impressive bird and the voice of impressive person, free from ailments reach the target like arrow & our call.
यदन्तरं तद् बाह्यं यद् बाह्यं तदन्तरम्। कन्यानां विश्वरूपाणां मनो गृभायौषधे॥
जो भीतर तथा बाह्य से एक समान विचार वाली हैं, ऐसे दोषों से रहित अंगों वाली कन्याओं के निर्मल चित्त को, हे औषधे! आप स्वीकार करें।(अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त 2.30.4)
Hey medicine, accept the unclouded consciousness of the girl, free from physical defects, having inner & outer thoughts alike.
एयमगन् पतिकामा जनिकामोऽ हमागमम्।
अश्वः कनिक्रदद् यथा भगेनाहं सहागमम्॥
यह नारी पति की इच्छा करती हुई मेरे निकट (समीप) आई है तथा मैं उस नारी की इच्छा करते हुए उसके निकट पहुँचा हूँ। हिनहिनाते हुए घोड़ों के सदृश मैं ऐश्वर्य (धन-वैभव) सहित उसके निकट आया हूँ।(अथर्ववेद, कामिनीमनोऽभिमुखीकरण सूक्त 2.30.5)
That woman has come to me with the desire of a husband and I too approach her with the desire of a wife. I have reached her like the neighing horse, along with grandeur and prosperity.(15.04.2026)
अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त (2.31) :: ऋषि :- काण्य; देवता :- मही अथवा चन्द्रमा; छन्द :- 1 अनुष्ट्रप, 2, 4 उपरिष्टात् विरा बृहती 3,4 आत्रिए।
इन्द्रस्य या मही दृषत् क्रिमेर्विश्वस्य तर्हणी। तया पिनष्मि सं क्रिमीन् दृषदा खल्वों इव॥
इन्द्र देवता की जो विशाल (विस्तृत) शिला है, वह सभी कीटाणुओं का विनाश करने वाली है, उससे हम कीटाणुओं को उसी तरह मसलते (पीसते) हैं, जैसे पाषाण से चना पीसा जाता है।(अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त 2.31.1)
Wide-broad rock of Indr Dev destroy all insects-germs (bacteria, microbes) when rubbed over it, like the gram is grinded.
दृष्टमदृष्टमतृहमथो कुरूरुमतृहम्।
अल्गण्डून्त्सर्वाञ्छलुनान् क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि॥
आँखों को दिखने वाले और न दिखने वाले कीटों का हम विनाश करते हैं। धरती पर विचरण (चलने) करने वाले, बिस्तर (बिछौना) आदि में रहने वाले और तीव्रगति से इधर-उधर विचरण करने वाले सभी कीटाणुओं को हम 'वाचा' (वाणी-मन्त्र शक्ति या वच से बनी औषधि) के द्वारा नष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त 2.31.2)
वचा :: Acorus calamus): एक आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी, जिसे अंग्रेजी में Sweet Flag या Calamus कहा जाता है।
We destroy the visible & invisible insects-germs. We destroy the insects creeping over the earth & bed, moving with high speed here & there with Vacha (Mantr Shakti and the medicine made out of Vach).
अल्गण्डून् हन्मि महता वधेन दूना अदूना अरसा अभूवन्।
शिष्टानशिष्टान् नि तिरामि वाचा यथा क्रिमीणां नकिरुच्छिषातै॥
अनेक स्थलों में निवास करने वाले कीटों को हम बृहत् साधन रूप मंत्र के द्वारा नष्ट करते हैं। चलने वाले एवं न चलने वाले सभी कीटाणु सूखकर नष्ट हो गये हैं। बचे हुए एवं न बचे हुए कीटों को हम 'वाचा' के द्वारा नष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त 2.31.3)
We destroy the insects over several places with Brahat Mantr as a means. Crawling and fixed insects-germs destroy just by drying. Remaining insects are killed with Vacha.
अन्वान्त्र्यं शीर्षण्य 1 मथो पार्ष्टेयं क्रिमीन्।
अवस्कवं व्यध्वरं क्रिमीन् वचसा जम्भयामसि॥
आँतों में मस्तक में एवं पसलियों में निवास करने वाले कीटों को हम नष्ट करते हैं। रेंगकर विचरण करने वाले एवं पथ निर्मित करके चलने वाले कीटों को भी हम 'वाचा' (वच से निर्मित औषधि) द्वारा नष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त 2.31.4)
वाचा :: (वच/Sweet Flag) एक प्रमुख आयुर्वेदिक जड़ी-बूटी है, जिसका उपयोग मुख्य रूप से याददाश्त बढ़ाने, वाणी स्पष्ट करने, पाचन सुधारने, खांसी-अस्थमा के इलाज और तंत्रिका तंत्र को मजबूत करने के लिए किया जाता है। यह मस्तिष्क शक्ति में सुधार करती है और गैस, पेट फूलना, तथा बवासीर में राहत देती है।
We vanish he insects-germs present in the head and ribs. We use Vacha to kill germs which either crawl or move over the road with Vacha.
ये क्रिमयः पर्वतेषु वनेष्वोषधीषु पशुष्वप्स्व 1 न्तः।
ये अस्माकं तन्वमाविविशुः सर्वं तद्धन्मि जनिम क्रिमीणाम्॥
जगलों पर्वतों, औषधियों एवं पशुओं में निवास करने वाले कीटों तथा हमारे शरीर में घुसने वाले सभी कीटाणुओं की सम्पूर्ण उत्पत्ति का हम विनाश करते हैं।(अथर्ववेद, कृमिजम्भन सूक्त 2.31.5)
We destroy the entire insects-germs living in the forest, mountains, animals or the ones which enter our body.
अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त (2.32) :: ऋषि :- काण्व; देवता :- आदित्यगण; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 त्रिपात् भुरिक् गायत्री, 6 चतुष्पाद् निवृत् उष्णिक्।
उद्यन्नादित्यः क्रिमीन् हन्तु निम्रोचन हन्तु रश्मिभिः। ये अन्तः क्रिमयो गवि॥
निकलते हुए एवं डुबते हुए सूर्य देवता अपनी रश्मियों के द्वारा, जो कीट धरती पर निवास करते हैं, उन सभी कीटों का विनाश करें।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.1)
Let the rising or setting Sun destroying all insects-germs with his rays over the earth.
विश्वरूपं चतुरक्षं किपिं सारङ्गमर्जुनम्। शृणाम्यस्य पृष्टीरपि वृश्चामि यच्छिरः॥अनेकानेक स्वरूप वाले चार आँखों वाले, रेंगकर विचरण करने वाले एवं श्वेत वर्ण वाले कीटों की हड्डियों एवं मस्तक को हम कूटते हैं अर्थात् विनष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.2)
We destroy the various form of insects having four eyes and the ones which crawl by crushing their bones and the head.
अत्रिवद् वः क्रिमयो हन्मि कण्ववज्जमदग्निवत्।
अगस्त्यस्य ब्रह्मणा सं पिनष्म्यहं किमीन्॥
हे कीटाणुओं! हम अत्रि, कण्व तथा जमदग्नि ऋषि के तरह मंत्र की शक्ति द्वारा तुम्हारा विनाश करते हैं और अगस्त्य ऋषि की मंत्र की शक्ति द्वारा तुम्हें पीस डालते हैं।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.3)
Hey insects-germs (virus, bacteria, microbes, fungus, algae etc)! We destroy you with the Mantr Shakti of Atri Rishi, Kavy rishi and Jamdagni Rishi and grind you with the Mantr Shakti of August Rishi.
हतो राजा क्रिमीणामुतैषां स्थपतिर्हतः। हतो हतमाता क्रिमिर्हतभ्राता हतस्वसा॥
हमारे द्वारा औषधि का उपयोग (प्रयोग) करने पर कीटों का राजा एवं उसका मंत्री नष्ट हो गया। वह अपने माता-पिता, भाई-बहिन के साथ स्वयं भी नष्ट हो गया।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.4)
The king of insect was destroy by using the medicine (insecticide) by us along with his minister. He was destroyed along with his sisters and brothers.
हतासो अस्य वेशसो हतासः परिवेशसः।
अथो ये क्षुल्लका इव सर्वे ते क्रिमयो हताः॥
इन कीटों के निवास स्थान एवं समीप के गृह नष्ट हो गये तथा बीज के रूप में स्थित दुर्लक्षित (कठिनाई से दिखाई पड़ने वाले) सूक्ष्म कीट भी विनष्ट हो गये।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.5)
The hide outs of these insects and their neighbouring sites and the ones in the form of eggs too were destroyed, along with small insects.
प्र ते शृणामि शृङ्गे याभ्यां वितुदायसि। भिनद्मि ते कुषुम्भं यस्ते विषधानः॥
हे कृमियों! हम तुम्हारे उन सीगों को तोड़ते हैं, जिनसे तुम कष्ट पहुँचाते हो। हम तुम्हारे कुषुम्भ (विषग्रन्थि) को तोड़ते हैं, जिसमें तुम्हारा जहर से भरा रहता है।(अथर्ववेद, कृमिनाशन सूक्त 2.32.6)
कृमि :: कीड़े, छोटे, रेंगने वाले, परजीवी, नरम शरीर वाले और बिना रीढ़ की हड्डी (अकशेरुकी); worms, flatworms, roundworms nematodes, parasitic worms, segmented worms, annelids.
Hey insects! We break your horns with which you cause pain. We destroy your poison gland which is full of poison.
अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त (2.33) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता :- यक्षविबर्हण (पृथक्करण) चन्द्रमा, आयुष्य; छन्द :- अनुष्टुप्, 3 ककुम्मती अनुष्टुप्, चतुष्पाद् भुरिक् उष्णिक्, 5 उपरिष्टात् बृहती, 6 उष्णिक् गर्भानिवृत् अनुष्टुप्, 7 पथ्यापंक्ति।
अक्षीभ्यां ते नासिकाभ्यां कर्णाभ्यां छुबुकादधि।
यक्ष्मं शीर्षण्यं मस्तिष्काज्जिह्वाया वि वृहामि ते॥
हे रोग से ग्रस्त मनुष्य! आपके दोनों आँखों, दोनों कर्णों, दोनों नासिका रन्ध्रों, ठोढ़ी, मस्तक, दिमाग तथा जीभ से हम यक्ष्मारोग (क्षयरोग) को दूर करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.1)
Hey patient, man suffering from diseases! We treat-cure your eyes, ears, nostrils, chin, forehead, mind, tongue and Tuberculosis (TB).
ग्रीवाभ्यस्त उष्णिहाभ्यः कीकसाभ्यो अनूक्यात्।
यक्ष्मं दोषण्य 1 मंसाभ्यां बाहुभ्यां वि वृहामि ते॥
हे रोगिन्! आपकी गर्दन की नाड़ियों, ऊपर की स्नायुओं, अस्थियों के संधि भागों, कन्धों, भुजाओं तथा अन्तर्भाग से हम क्षयरोग (यक्ष्मारोग) का नाश करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.2)
Hey patient! We destroy the ailment pertaining to nerves of neck, Ligaments-Tendons, ribs, internal organs and Tuberculosis (TB).
हृदयात् ते परि क्लोम्नो हलीक्ष्णात् पार्श्वभ्याम्।
यक्ष्मं मतस्नाभ्यां प्लीह्नो यक्नस्ते वि वृहामसि॥
हे रोगिन्! हम आपके हृदय, फेफड़ों, पित्ताशय, दोनों पसलियों, गुर्दों, तिल्ली एवं जिगर से यक्ष्मारोग (क्षयरोग) को समाप्त करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.3)
आन्त्रेभ्यस्ते गुदाभ्यो वनिष्ठोरुदरादधि। यक्ष्मं कुक्षिभ्यां प्लाशेर्नाभ्या वि वृहामि ते॥
आपकी आँतों, गुदा, नाड़ियों, हृदय की जगह, मूत्राशय, यकृत तथा अन्य पाचन तंत्र के अंगों से हम यक्ष्मा नामक व्याधि का विनाश करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.4)
We treat-cure the Tuberculosis-TB or Consumption of intestine, anus, nerves, heart, urinary bladder, liver and digestive organs.
ऊरुभ्यां ते अष्ठीवद्भ्यां पार्षिणभ्यां प्रपदाभ्याम्।
यक्ष्मं भसद्यं 1 श्रोणिभ्यां भासदं भंससो वि वृहामि ते॥
हे व्याधि ग्रस्त मनुष्य! आपकी दोनों जंघाओं, जानुओं, एड़ियों, पंजों, नितम्ब भागों, कटि भागों तथा गुदा हार से हम यक्ष्मानामक रोग को नष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.5)
Hey man sufferings from diseases! We treat-cure the Tuberculosis-TB or Consumption of your both Thighs, Knees, heels, feet, hips, waist-lower back and anus.
अस्थिभ्यस्ते मज्जभ्यः स्नावभ्यो धमनिभ्यः।
यक्ष्मं पाणिभ्यामङ्गुलिभ्यो नखेभ्यो वि वृहामि ते॥
हम अस्थि, मज्जा, स्नायुओं, धमनियों, पुट्ठों, हस्तों, अंगुलियों एवं नाखूनों से यक्ष्मा नामक व्याधि का विनाश करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.6)
We treat-cure the Tuberculosis of Bone Marrow, Ligaments-Tendons, arteries & veins, Rump, Hip, Haunch, fingers and nails.
अङ्गेअङ्गे लोम्निलोम्नि यस्ते पर्वणिपर्वणि।
यक्ष्मं त्वचस्यं ते वयं कश्यपस्य वीबर्हेण विष्वञ्चं वि वृहामसि॥
हे रोगग्रस्त मनुष्य! आपके सम्पूर्ण अंग, सम्पूर्ण लोम (रोमकूपों) तथा आपके शरीर के सम्पूर्ण संधि भाग में, जहाँ किसी भी जगह यक्ष्मा नामक व्याधि रहती है, वहाँ से हम इस व्याधि का निवारण करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मविबर्हण सूक्त 2.33.7)
Hey human suffering from ailments! We treat-cure the Tuberculosis-TB or Consumption of your whole body, Hair Follicles- Pores of the skin, joints.
अथर्ववेद, पशुगण सूक्त (2.34) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 पशुपति, 2 देवगण, 3 अग्नि, विश्वकर्मा, 4 वायु, प्रजापति, 5 आशीर्वचन; छन्द :- त्रिष्टुप्।
य ईशे पशुपतिः पशूनां चतुष्पदामुत यो द्विपदाम्।
निष्क्रीतः स यज्ञियं भागमेतु रायस्पोषा यजमानं सचन्ताम्॥
जो पशुओं के स्वामी हैं (शिव), दोनों पदों मानवों एवं चार पदों वाले पशुओं के अधिपति हैं, यजमान (यज्ञ करने वाले) वे समस्त स्वरूपों को धारण किये हुए यज्ञीय भाग को प्राप्त करें तथा मुझ को धन-वैभव एवं पुष्टि (पोषण) प्रदान करें।(अथर्ववेद, पशुगण सूक्त 2.34.1)
Let the Lord of animals viz two legged, four legged, performers of Yagy Bhagwan Shiv, should receive the share of the Yagy and grant me wealth, grandeur, prosperity and nourishment.
प्रमुञ्चन्तो भुवनस्य रेतो गातुं धत्त यजमानाय देवाः।
उपाकृतं शशमानं यदस्थात् प्रियं देवानामप्येतु पाथः॥
हे देवताओं! आप इस यजमान को जगत् का रेतस् (उत्पादक रस) दे करके इसे उचित पथ पर चलाएँ और देवताओं का प्रिय एवं सुसंस्कृत सोम रूप अन्न हमें प्रदान करें।(अथर्ववेद, पशुगण सूक्त 2.34.2)
Hey demigods-deities! Grant the power to impregnate, sperms to this Yajman moving him over the right path-direction and grant us the favourite food of demigods Som to us as a food grain.
ये बध्यमानमनु दीध्याना अन्वैक्षन्त मनसा चक्षुषा च।
अग्निष्टानये प्र मुमोक्तु देवो विश्वकर्मा प्रजया संरराणः॥
जो आलोकमान जीव इस बद्ध जीव को चित्त एवं आँखों द्वारा देखते हैं, उन्हें वे विश्वकर्मा देव सर्वप्रथम मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, पशुगण सूक्त 2.34.3)
बद्ध जीव :: वह आत्मा या प्राणी जो माया, सांसारिक इच्छाओं, कर्मफल और जन्म-मृत्यु के चक्र में फंसा हुआ है, बंधी हुई आत्मा; Conditioned Soul.
Those aurous-radiant organism (divine beings) who see the bonded-tied souls with their eyes should be granted renunciation first by Vishwkarma.
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपा विरूपाः सन्तो बहुधैकरूपाः।
वायुष्टानये प्र मुमोक्तु देवः प्रजापतिः प्रजया संरराणः॥
गाँव के जो विविध स्वरूप, वर्ण वाले पशु भित्र स्वरूप होने पर भी एक समान दिखाई पड़ते है, उनको भी प्रजा सहित रहने वाले प्रजा का पालन करने वाले प्राण देवता सर्वप्रथम मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, पशुगण सूक्त 2.34.4)
Let the nurturer of various animals of village, though different yet look alike, be released first by the Pran Dev.
प्रजानन्तः प्रति गृह्णन्तु पूर्वे प्राणमङ्गेभ्यः पर्याचरन्तम्।
दिवं गच्छ प्रति तिष्ठा शरीरैः स्वर्ग याहि पथिभिर्देवयानैः॥
विशेषज्ञ विद्वान् चहुँ दिशाओं में भ्रमण करने वाले प्राण को सम्पूर्ण अंगों से एकत्र करके स्वस्थ जीवन व्यतीत करते हैं, तत्पश्चात् देवगणों के जाने वाले मार्ग से द्युलोक को जाते हैं एवं आलोकमान (प्रकाशित) जगहों पर विद्यमान् होते हैं।(अथर्ववेद, पशुगण सूक्त 2.34.5)
The specialist scholars who collect the Air vital-Pran roaming in all directions survive a healthy life. Thereafter, they follow the route of the demigods to heavens and stabilize at radiant-aurous places.
अथर्ववेद, विश्वकर्मा (2.35) :: ऋषि :- अङ्गिरा; देवता :- विश्वकर्मा; छन्द :- त्रिष्टुप्, 1 बृहतीगर्भा त्रिष्टुप्, 4-5 भुरिक् त्रिष्टुप्।
ये भक्षयन्तो न वसून्यानृधुर्यानग्नयो अन्वतप्यन्त धिष्ण्याः।
या तेषामवया दुरिष्टिः स्विष्टिं नस्तां कृणवद् विश्वकर्मा॥
यज्ञ को करने में धन का व्यय न करके, भक्षण के कार्य में धन का व्यय करने के परिणाम स्वरूप ही हम समृद्ध नहीं हुए। इस प्रकार हम यज्ञ न करने वाले एवं दुर्यज्ञ करने वाले हैं। इसलिए हमारी श्रेष्ठ यज्ञ करने की इच्छा की विश्वकर्मा देवता पूर्ति करें।(अथर्ववेद, विश्वकर्मा 2.35.1)
We have not become prosperous by spending the money in eating and not performing Yagy. In this way we become non performers of Yagy and makers of Duryagy. Let Vishwkarma Dev compensate our desire-wish to accomplish excellent Yagy.
यज्ञपतिमृषय एनसाहुर्निर्भक्तं प्रजा अनुतप्यमानम्।
मथव्यान्त्स्तोकानप यान् रराध सं नष्टेभिः सृजतु विश्वकर्मा॥
प्रजा के बारे में अनुताप करने वाले यज्ञपति को ऋषि जन कुकृत्यों (पाप) से अलग बताते हैं। जिन विश्वकर्मा ने सोमरस की बूँदों को आत्मसात् किया है, वे विश्वकर्मा उन बूँदों के द्वारा हमारे हवन (यज्ञ) को पूर्ण करें।(अथर्ववेद, विश्वकर्मा 2.35.2)
अनुताप :: पश्चाताप, सन्ताप; heatstroke, contrition, remorse, repentance.
Rishi Gan describe the Yagy Pati who perform repentance for the sake of populace-subjects as different from wicked deeds-sins. Vishwkarma who has assimilated Somras should accomplish our Yagy with tits drops.
अदान्यान्त्सोमपान् मन्यमानो यज्ञस्य विद्वान्त्समये न धीरः।
यदेनश्चकृवान् बद्ध एष तं विश्वकर्मन् प्र मुञ्चा स्वस्तये॥
जो मनुष्य दान रहित होकर अर्थात् दान न करके मनचाहे तरीके से सोमरस का सेवन करता है, वह न तो यज्ञ ज्ञाता होता है तथा न ही धैर्यवान् (धीरज धारण करने वाले) होता है। ऐसा मानव बद्ध होकर कुकृत्य करता है। हे विश्वकर्मा देवता! आप उसे उद्धार करने के उद्देश्य से कुकृत्यों (पापों) के बन्धनों से मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, विश्वकर्मा 2.35.3)
The person who do not donate, drink Somras as per his whims is neither aware of the Yagy nor patient. Such person is tied in reincarnations and perform wicked deeds. Hey Vishwkarma Dev! You untie him from the bonds for his release.
घोरा ऋषयो नमो अस्त्वेभ्यश्चक्षुर्यदेषां मनसश्च सत्यम्।
बृहस्पतये महिष द्युमन्नमो विश्वकर्मन् नमस्ते पाह्य 1 स्मान्॥
ऋषिजन बहुत ही तेज से युक्त होते हैं, क्योकि उनके आँखों एवं चित्तों में सत्य प्रकाशित होता है, ऐसे ऋषियों को हम नमस्कार करते हैं और देवगणों के पालनकर्ता बृहस्पतिदेव को भी नमस्कार करते हैं। हे महान् विश्वकर्मा देव! हम आपको नमस्कार करते हैं, आप हमारी रक्षा करें।(अथर्ववेद, विश्वकर्मा 2.35.4)
Rishi Gan possess high degree of radiance-aura, since their eyes and mood reflect truth. We salute such Rishi Gan and the Mentor of demigods-Dev Guru Brahaspati. Hey great Vishwkarma Dev! We salute you. You should protect us.(17.04.2026)
यज्ञस्य चक्षुः प्रभृतिर्मुखं च वाचा श्रोत्रेण मनसा जुहोमि।
इमं यज्ञं विततं विश्वकर्मणा देवा यन्तु सुमनस्यमानाः॥
जो अग्नि देव यज्ञ के नेत्र स्वरूप पोषण कर्ता तथा मुख के समान है अर्थात् अग्नि देव यज्ञ के नेत्र के समान है, यज्ञ के पालनकर्ता है एवं यज्ञ के मुँह के समान हैं कहने का तात्पर्य है कि सभी प्रकार के यज्ञ अग्नि द्वारा ही पूर्ण होते हैं। अतः उन अग्नि देवता के प्रति हम चित्त, स्रोत (कान) एवं वाणी के साथ आहुति अर्पित करते हैं। विश्वकर्मा देव के द्वारा किये गये इस हवन के हेतु उत्तम चित्त वाले देवता निमंत्रण स्वीकार करें (पधारें)।(अथर्ववेद, विश्वकर्मा 2.35.5)
Agni Dev is like the eyes and mouth of the Yagy. He accomplishes the Yagy. We make oblations to him by means of psyche-mood, ears i.e., devotion. Demigods-deities having best psyche should accept the invitation-invocation by Vishwkarma Dev.
अथर्ववेद, पतिवेदन (2.35) :: ऋषि :- पतिवेदन; देवता :- 1 अग्नि, 2 सोम, अर्थमा, धाता, 3 अग्नीषोम, 4 इन्द्र, 5 सूर्य, 6 धनपति, 7 हिरण्य, भग, 8 ओषधि: छन्द :- अनुष्टुप्, 1 भुरिक् अनुष्टुप्, 3-4 त्रिष्टुप्, 8 निवृत् पुर उष्णिक्।
आ नो अग्ने सुमतिं संभलो गमेदिमां कुमारीं सह नो भगेन।
जुष्टा वरेषु समनेषु वल्गुरोषं पत्या सौभगमस्त्वस्यै॥
हे अग्नि देव! हमारी इस बुद्धिमती कुमारी कन्या को ऐश्वर्य (धन-वैभव) सहित सभी गुणों से युक्त वर प्राप्त हो। हमारी कन्या बड़ों के मध्य में प्रिय एवं समान विचार वालों में मनोरम हो। इस कन्या को पति के संग निवास करने का सौभाग्य प्राप्त हो।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.1)
Hey Agni Dev! Grant-provide groom to our intelligent daughter, who has grandeur, prosperity and all virtuous qualities. Our daughter should be adored by the elders, has similar thought-ideas and excellent mind set. Let her have the opportunity-good luck of living with her husband.
सोमजुष्टं ब्रह्मजुष्टमर्यम्णा संभृतं भगम्। धातुर्देवस्य सत्येन कृणोमि पतिवेदनम्॥
सोम देवता तथा गन्धर्व देवता द्वारा सेवित और अर्यमा नामक अग्नि द्वारा ग्रहण की हुई कन्या रूपी धन को हम सत्य वाणी से पति द्वारा प्राप्त करने के योग्य निर्मित करते हैं।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.2)
We grow the girl accepted by Som Dev, Gandarbh and Aryma named Agni in the form of wealth constituting of truthful voice to be attained-availed by the husband.
इयमग्ने नारी पतिं विदेष्ट सोमो हि राजा सुभगां कृणोति।
सुवाना पुत्रान् महिषी भवाति गत्वा पतिं सुभगा वि राजतु॥
हे अग्नि देवता! यह कन्या अपने पति को प्राप्त करे तथा राजा सोम इसे सौभाग्यवती (सुहागिन) बनाएँ। यह कन्या अपने पति को प्राप्त करके सुशोभित हो तथा पराक्रमी पुत्रों को जन्म देती हुई गृह की रानी बने।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.3)
Hey Agni Dev! Let this girl attain her spouse-husband and king Som grant her good luck. She should give birth to mighty sons and become the queen of her family.
यथाखरो मघवंश्चारुरेष प्रियो मृगाणां सुषदा बभूव।
एवा भगस्य जुष्टेयमस्तु नारी सम्प्रिया पत्याविराधयन्ती॥
हे इन्द्र देवता! जैसे गुफा की जगह हिरणों हेतु प्रिय व आसीन (बैठने) योग्य होती है, वैसे ही यह नारी अपने पति से प्रतिवाद (विरोध) न करती हुई एवं सम्पूर्ण भोग करने योग्य वस्तुओं का भक्षण करती हुई अपने पति हेतु प्रीति से संपन्न हो अर्थात् पति के साथ प्रसन्नतापूर्वक निवास करे।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.4)
Hey Devraj Indr! The way a cave is the comfortable, loved place for sitting for the deer, similarly this woman should enjoy all sorts of amenities-comforts without argument with her husband, consuming all sorts of eatables happily.
भगस्य नावमा रोह पूर्णामनुपदस्वतीम्। तयोपप्रतारय यो वरः प्रतिकाम्यः॥
हे कन्ये! आप मनोवांछित एवं अविनाशी ऐश्वर्य (अक्षय धन-वैभव) से परिपूर्ण होकर नाव पर सवार होकर, उसके द्वारा अपने इच्छित पति के समीप पहुँचे।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.5)
Hey girl! Have all sorts of desired imperishable grandeur, prosperity, ride the boat and reach the husband of your choice.
आ क्रन्दय धनपते वरमामनसं कृणु। सर्वं प्रदक्षिणं कृणु यो वरः प्रतिकाम्यः॥
हे धन प्रदान करने वाले वरुण देवता! आप इस वर के द्वारा उद्घोष कराएँ कि यह कन्या हमारी भार्या (पत्नी) हो। आप इस वर को कन्या के समक्ष आमंत्रित करके उसके चित्त को कन्या की ओर प्रेरित करें एवं उसे अनुरूप आचरण वाला बनाएँ।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.6)
Hey deity Varun Dev awarding wealth! Make this groom announce that he is accepting the girl as his wife. Invite the groom in front of the girl and let his psyche inspired to her, making him one, who behave as per her desire.
इदं हिरण्यं गुल्गुल्वयमौक्षो अथो भगः। एते पतिभ्यस्त्वामदुः प्रतिकामाय वेत्तवे॥
हे कन्ये! ये स्वर्णिम आभूषण (सोने के सदृश वस्त्र), गूगल की धूप एवं लेपन करने वाले औक्ष (उपलेपन द्रव्य) को अंलकार के अधिपति भग देव आपकी पति इच्छा की पूर्ति एवं आपके लाभ हेतु आपको प्रदान करते हैं।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.7)
Hey girl-virgin! Lord of golden jewellery, Google Dhoop, pastes and the fluids used for pasting the skin for your benefit.
आ ते नयतु सविता नयतु पतिर्यः प्रतिकाम्यः। त्वमस्यै धेह्योषधे॥
हे औषधे! आप इस कन्या को पति प्रदान करें। हे कन्ये! सविता देवता इस वर को आपके निकट लाएँ। आपका मनोवांछित पति आपके साथ विवाह करके आपको अपने गृह में ले जाएँ, जहाँ आप सुखपूर्वक निवास करें।(अथर्ववेद, पतिवेदन 2.36.8)
Hey medicine! Grant suitable spouse to this girl. Hey girl-virgin! Let Savita Dev bring you close the groom. Let your desired husband marry you and take you to his house to live there comfortably.(18.04.2026)
अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त (3.1) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- सेनामोहन (1 अग्नि, 2 मरुद्गण, 3-6 इन्द्र); छन्द :- 1-4 त्रिष्टुप्, 2 विरागर्भाभुरित्रिष्टुप्, 3, 6 अनुष्टुप्, 5 विराट् पुरउष्णिक्।
अग्निर्नः शत्रून् प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहन्नभिशस्तिमरातिम्।
स सेनां मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवेदाः॥
हे ज्ञान से परिपूर्ण अग्नि देवता! आप विनाश करने हेतु उद्यत शत्रु के मन को भ्रमित करके, उनके हस्तों को शस्त्र के बिना कर दें। वे शत्रुओं के अंगों को प्रज्वलित करते हुए आगे बढ़े।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.1)
Hey Agni Dev! Make the hands of the enemy bent upon of destruction without arms-weapons. Burn the body organs of the enemy and proceed further-march ahead.
यूयमुग्रा मरुत ईदृशे स्थाभि प्रेत मृणत सहध्वम्।
अमीमृणन् वसवो नाथिता इमे अग्निर्ह्येषां दूतः प्रत्येतु विद्वान्॥
हे मरुतो! युद्ध में हमारी मदद करने के उद्देश्य से आप उग्र रूप में हमारे निकट विद्यमान् रहें। आप अग्रगामी हों और आक्रमणकारी शत्रुओं पर विजय प्राप्त करें। ये वसुगण भी शत्रुओं के संहारक हैं, इनका संदेश ले जाने वाले अग्नि देवता भी शत्रुओं की तरफ ही आगे बढ़ें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.2)
Hey Marud Gan! Remain near-close to us for our help in the war, with your furious form. You should march ahead and attain victory over the invaders-attackers. Vasu Gan are also the destroyers of the enemies. Their messenger Agni Dev should march towards the enemies.
अमित्रसेनां मघवन्नस्माञ्छत्रूयतीमभि। युवं तानिन्द्रं वृत्रहन्नग्निश्च दहतं प्रति॥
हे धन-वैभव से युक्त इन्द्र देवता! आप वृत्र नामक राक्षस के विनाशक हैं। आप और अग्नि देवता दोनों संयुक्त होकर हम से विद्वेश (शत्रुता) करने वाली शत्रुओं की सेनाओं को हरा करके उन्हें जलाकर राख कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.3)
Hey possessor of grandeur and prosperity, Devraj Indr! You are the destroyer of Vratr Sur. You along with Agni Dev jointly run away the envious enemy armies and burn them off.
प्रसूत इन्द्र प्रवता हरिभ्यां प्र ते वज्रः प्रमृणन्नेतु शत्रून्।
जहि प्रतीचो अनूचः पराचो विष्वक् सत्यं कृणुहि चित्तमेषाम्॥
हे वज्रधारी इन्द्र देवता! हरि नामक घोड़ों से गतिमान (चलने वाला) आपका रथ (वाहन) ढालुआँ रास्ते से तीव्रगति से शत्रु सेना की तरफ अग्रगामी हो। आप अपने भंयकर वज्र द्वारा शत्रुओं पर वार करें। आप सामने से अग्रगामी होते हुए एवं मुँह मोड़कर गमन करते हुए समस्त शत्रुओं पर प्रहार (वार) करें। संग्राम में लगे हुए शत्रुओं के मन को आप व्याकुल कर दें तथा शत्रु को परास्त करने के अलावा कुछ न विचार करें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.4)
Hey Devraj Indr wielding Vajr! Let your charoite deploying the horses named Hari move over the inclined paths with high speed. Strike your furious Vajr over the enemies. Come ahead and strike the enemies who turn off their heads. Perturb the minds of the enemies and do not think any thing other than defeating the enemies.
इन्द्र सेनां मोहयामित्राणाम्। अग्नेर्वातस्य ध्राज्या तान् विषूचो वि नाशय॥
हे इन्द्र देवता! आप शत्रुओं की सेनाओं को भ्रमित कर दें। तत्पश्चात् अग्नि तथा वायु के प्रचण्ड वेग से उन शत्रुओं की सेनाओं को चारों तरफ से भगाकर नष्ट कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.5)
प्रचण्ड वेग :: अत्यधिक तीव्र, तेज़ी, उग्र या बहुत तेज़ गति; furious-tremendous speed, violent speed, raging pace.
Hey Indr Dev! Confuse the enemy armies. Thereafter, make the enemy run away in four directions with furious-tremendous speed like Agni-fire & Vayu-air and destroy them.
इन्द्रः सेनां मोहयतु मरुतो घ्नन्त्वोजसा। चक्षूष्यग्निरा दत्तां पुनरेतु पराजिता॥
हे इन्द्र देवता! आप शत्रु की सेना को अपने वश में कर लें तथा मरुद्गण बलपूर्वक उनका संहार करें। अग्नि देवता उनकी आँखों को देखने की शक्ति का हरण कर लें। इस तरह हार करके शत्रुओं की सेना वापस चली जाए।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.1.6)
Hey Indr Dev! Control the enemy army and Marud Gan should destroy it with might & power. Let Agni Dev destroy the power of their eyes to see. In this way the enemy army should return after facing defeat.
अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त (3.2) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- सेनामोहन 1-2 अग्नि, 3-4 इन्द्र, 5 द्यौ, 6 मरुद्गण; छन्द :- त्रिष्टुप, 2-4 अनुष्टुप्।
अग्निनों दूतः प्रत्येतु विद्वान् प्रतिदहन्नभिशस्तिमरातिम्।
स चित्तानि मोहयतु परेषां निर्हस्तांश्च कृणवज्जातवेदाः॥
देवदूत के समान अग्रणी वीर एवं ज्ञानी अग्नि देव हमारे शत्रुओं को भस्म करते हुए उनकी तरफ अग्रगामी हों। वे शत्रुओं के मन को भ्रमित (शंकित) कर दें और हस्तों को शस्त्र रहित कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.1)
Enlightened Agni Dev who is a forward moving warrior like demigods, should burn our enemies, moving towards them. He should confuse the minds of the enemies and make their hands without arms-ammunition.
अयमग्निरमूमुहद् यानि चित्तानि वो हृदि। वि वो धमत्वोकसः प्र वो धमतु सर्वतः॥
हे शत्रुओं! तुम्हारे हृदय में जो विचार समूह (भंडार) विद्यमान् है, उनको अग्नि देव अपने वश में कर लें एवं तुम्हें तुम्हारे रहने की जगहों से दूर कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.2)
Hey enemies! Let Agni Dev over power the thoughts-ideas in your minds and move you away from your residence.
इन्द्र चित्तानि मोहयन्नर्वाङाकूत्या चर। अग्नेर्वातस्य ध्राज्या तान् विषूचो वि नाशय॥
हे देवराज इन्द्र! आप शत्रुओं के चित्त को वशीभूत करके शुभ संकल्पों सहित हमारे निकट आगमन करें। तत्पश्चात् अग्नि देव और वायु देव के प्रचण्ड वेग से इन शत्रुओं की सेनाओं को चारों तरफ से नष्ट कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.3)
Hey Devraj Indr! Control the psyche-minds of the enemies and move to us with virtuous resolve. Thereafter, Agni Dev and Vayu Dev should surround the enemy armies from all directions and destroy them.
व्याकूतय एषामिताथो चित्तानि मुह्यत। अथो यदद्यैषां हृदि तदेषां परि निर्जहि॥
हे विरुद्ध संकल्पों! आप शत्रुओं के चित्त में जाएँ। हे शत्रुओं के चित्त! आप सम्मोहित हों। हे देवराज इन्द्र! संग्राम के लिए उद्यत (उत्सुक) शत्रुओं के संकल्पों को आप पूरी तरह से नष्ट कर दें।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.4)
Hey opposite resolves! Move to the minds-psyche of the enemies. Hey psyche of the enemy! You should be hypnotized-enchanted. Hey Devraj Indr! Destroy the enemy enemies bent upon war in addition to their resolve in favour of war.
अमीषां चित्तानि प्रतिमोहयन्ती गृहाणाङ्गान्यप्वे परेहि।
अभि प्रेहि निर्दह हृत्सु शोकैर्ग्राह्यामित्रांस्तमसा विध्य शत्रून्॥
हे अप्वे अर्थात् पाप देवी! तुम शत्रुओं को वशीभूत करते हुए उनके शरीर में व्याप्त हो जाओ। हे अप्वे! तुम अग्रगामी हो अर्थात् आगे बढ़ो तथा उनके हदयों को शोकाकुल (शोक से व्याकुल, पीड़ित) कर दो, उन्हें जकड़कर कष्ट देते हुए समाप्त कर डालो।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.5)
Hey Apve-deity of sin! Take control the enemies and enter their bodies. Move forward, perturb their hearts with sorrow-pain, by clutching them over, destroy them.
असौ या सेना मरुतः परेषामस्मानैत्यभ्योजसा स्पर्धमाना।
तां विध्यत तमसापव्रतेन यथैषामन्यो अन्यं न जानात्॥
हे मरुतों! जो शत्रु सेनाएँ सामर्थ्य के मद में (ताकत के नशे में) स्पर्धापूर्वक हमारी तरफ आ रह हैं, उन सेनाओं को आप अपने कर्महीन अर्थात् कार्य से विरक्त करने वाले अंधकार से अपने वश कर लें, जिससे इनमें से कोई भी शत्रु एक-दूसरे को पहचान न सके।(अथर्ववेद, शत्रु सेना सम्मोहन सूक्त 3.2.6)
Hey Marud Gan! The enemy armies under the influence of intoxication, moving towards us should be competitively made unable to act under the influence of-shroud of darkness, so that none of the enemies are able to recognise each other.(19.04.2026)
अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त (3.3) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- 1 अग्नि, 2.6 इन्द्रय, 3 वरुण, सोम, इन्द्र, 4 श्येन, अश्विनी कुमार, 5 इन्द्राग्नी, विश्वेदेवा; छन्द :- त्रिष्टुप्, 3 चतुष्पदा भुरिक् पंक्ति, 5-6 अनुष्टुप्।
अचिक्रदत् स्वपा इह भुवदग्ने व्यचस्व रोदसी उरूची।
युञ्जन्तु त्वा मरुतो विश्ववेदस आमुं नय नमसा रातहव्यम्॥
हे अग्नि देवता! यह जीव अथवा पद की इच्छा करने वाला व्यक्ति स्वयं का पालनकर्त्ता है, ऐसी घोषणा की गई है अर्थात् अपने राज्य से पतित (निकला) हुआ यह पदच्युत (पद से हटाया) राजा फिर से अपना पद (राज्य) प्राप्त करने हेतु आपका अवाहन करता है। यह आपकी कृपा से सम्पन्न हो। आप समस्त द्यावापृथिवी (आकाश और पृथ्वी) में समाये हुए हो। मरुद्गण तथा विश्वेदेवा आपके साथ संयुक्त हो। आप विनम्रतापूर्वक हविदाता (हवन करने वाले राजा) को यहाँ लाएँ, और विद्यमान् करें अर्थात् राज्य में स्थित करें।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.1)
Hey Agni Dev! The king removed from the throne invoke your for reinstatement. Let him be blessed by you. You pervade the entire heavens & earth. Let Marud Gan and Vishw Dev join you. Bring the king who make oblation politely-willingly.
दूरे चित् सन्तमरुषास इन्द्रमा च्यावयन्तु सख्याय विप्रम्।
यद् गायत्रीं बृहतीमर्कमस्मै सौत्रामण्या दधृषन्त देवाः॥
हे तेजस्विन्! आप इस तेज से युक्त मनुष्य की मित्रता हेतु परम मित्र, परम ज्ञानी देवराज इन्द्र को यहाँ लाएँ। सम्पूर्ण देवगणों ने गायत्री छन्द, बृहती छन्द और सौत्रामणी हवन के माध्यम से देवराज इन्द्र को धारण किया है।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.2)
सौत्रामणी यज्ञ-हवन :: अनुष्ठान जो मुख्य रूप से इंद्रदेव को समर्पित है, जिसका उद्देश्य बिखरी हुई शक्तियों को एकत्र करना, खोया हुआ राज्य-ऐश्वर्य पुनः प्राप्त करना और आत्मरक्षा या शुद्धि है।Please refer to सौत्रमणि यज्ञ santoshsuvichar.blogspot.com
Hey Tejaswin! Invoke Devraj Indr the ultimate enlightened for friendship with person having Tej-aura, radiance. All demigods-deities have supported Devraj Indr with Gayatri Chhand, Brahati Chhand and Soutramani Hawan.
अद्भ्यस्त्वा राजा वरुणो ह्वयतु सोमस्त्वा ह्वयतु पर्वतेभ्यः।
इन्द्रस्त्वा ह्वयतु विड्द्भ्य आभ्यः श्येनो भूत्वा विश आ पतेमाः॥
हे तेजस्विन्! वरुण देव जल के लिए, सोमदेव पहाड़ों के लिए एवं देवराज इन्द्र प्रजाओं के लिए आपको आमंत्रित करते हैं। आप श्येन पक्षी की चाल से इन विशेष जगहों पर पधारें।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.3)
Hey Tejaswin-aurous! Varun Dev for water, Som Dev for mountains and Devraj Indr is invoked for the subjects-populace. Move to these place with the speed of Shyen-falcon.
श्येनो हव्यं नयत्वा परस्मादन्यक्षेत्रे अपरुद्धं चरन्तम्।
अश्विना पन्थां कृणुतां सुगं त इमं सजाता अभिसंविशध्वम्॥
द्युलोक (स्वर्ग) में रहने वाले देवता, अन्य क्षेत्रों में विचरण करने वाले हव्य (बुलाने योग्य) को श्येन पक्षी के सदृश तीव्रगति से अपने देश में ले आएँ। हे तेजस्विन्! आपके रास्ते को दोनों अश्विनी कुमार सुख से आने के लायक बनाएँ। सजातीय मनुष्य इसे उपयुक्त जगहों में प्रविष्ट कराएँ अर्थात् पुनः राज्य को प्राप्त किए इस राजा की सेवा में लगें।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.4)
Let Shyen-falcon bring oblations available in other countries-place to Demigods-deities in the heavens, with high speed. Hey Tejaswin! Let Ashwani Kumars make your route comfortable. Let humans of the same race-caste establish him at the suitable place i.e., appoint him in the service of king who has regained his kingdom.
ह्वयन्तु त्वा प्रतिजनाः प्रति मित्रा अवृषत। इन्द्राग्नी विश्वे देवास्ते विशि क्षेममदीधरन्॥
हे तेजस्विन्! आपके अनुकूल चलने वाले भी आपको आमंत्रित करें। मित्रजन आपको संवर्द्धित करें। देवराज इन्द्र, अग्निदेव तथा विश्वेदेवा आपके भीतर क्षेम अर्थात् प्रजा का पालन-पोषण करने की योग्यता धारण कराएँ।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.5)
Hey Tejaswin! Invite those who are favour you. Let friends enrich-grow you. Let Devraj Indr, Agni Dev & Vishwe Dev grant you the power to nurture-support the subjects-populace.
यस्ते हवं विवदत् सजातो यश्च निष्ट्यः। अपाञ्चमिन्द्र तं कृत्वाथेममिहाव गमय॥
हे देवराज इन्द्र! सभी विजातीय तथा सजातीय लोग आपके आह्वानीय पक्ष की समीक्षा करें अर्थात् सभी दूसरी जाति के और अपनी जाति के लोग आपके आह्वान से सहमत हो। उस अवांछनीय को बहिष्कृत करके, इस वांछनीय को यहाँ ले आएँ।(अथर्ववेद, स्वराज पुनः स्थापन सूक्त 3.3.6)
Hey Devraj Indr! Let people from the same caste and other castes-clan agree to your invocation. Reject the undesired and select the desired to bring here.
अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त (3.4) :: ऋषि :- अधर्वा; देवता :- इन्द्र; छन्द :- त्रिष्टुप्, 1 जगती, 4.5 भुरिक् त्रिष्टुप्।
आ त्वा गन् राष्ट्र सह वर्चसोदिहि प्राङ् विशां पतिरेकराट् त्वं वि राज।
सर्वास्त्वा राजन् प्रदिशो ह्वयन्तूपसद्यो नमस्यो भवेह॥
हे राजन! यह राष्ट्र (राज्य) आपको फिर से मिला है। आप वर्चस्वपूर्वक (शक्ति सहित) अभ्युदय (उत्रति) को प्राप्त करें। आप प्रजाओं के अधिपति और उनके एक मात्र अधिष्ठाता बनकर अलंकृत हो। सम्पूर्ण दिशाएँ एवं उपदिशाएँ आपका उद्घोष करें (पुकारें)। आप यहाँ सबके हेतु स्तुति करने योग्य बनें अर्थात् सभी दिशाओं में रहने वाले मनुष्यों हेतु आप वन्दनीय बनें।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.1)
Hey king! You have obtained this kingdom again. Attain might and power. You should be decorated as the sole Lord of the subjects-populace. Let all directions resound-reverberate your name. You should become respected for all i.e., people in all directions honour you.
त्वां विशो वृणतां राज्याय त्वामिमाः प्रदिशः पञ्च देवीः।
वर्षान् राष्ट्रस्य ककुदि श्रयस्व ततो न उग्रो वि भजा वसूनि॥
हे तेजस्विन्! ये प्रजाएँ आपको राज्य (शासन) का संचालन (देख-रेख) करने हेतु स्वीकार करें एवं पंच आलौकिक दिशाएँ आपकी सेवा करें। आप राज्य के अति उत्तम पद पर विराजमान हों तथा उग्रवीर होकर हमें योग्यता के अनुसार धन-वैभव प्रदान करें।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.2)
Hey Tejaswin! Let subjects-populace in all directions accept you for supporting them. Five divine directions should serve you. You should be established as the king and grant us grandeur-prosperity.
अच्छ त्वा यन्तु हविनः सजाता अग्निर्दूतो अजिरः सं चरातै।
जायाः पुत्राः सुमनसो भवन्तु बहुं बलिं प्रति पश्यासा उग्रः॥
हे तेजस्विन्! यज्ञ करने वाले अथवा बुलाने वाले सजातीय जन आपके अनुकूल रहें। दूत के रूप में अग्नि देव द्रुतगति (तीव्रगति) से संचरित हों। स्त्री-बच्चे अति उत्तम चित्त वाले हों। आप उग्रवीर होकर विविध उपहारों को देखें (प्राप्त करें)।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.3)
उग्रवीर :: भगवान् श्री हरी विष्णु के नरसिंह अवतार, प्रचंड, भयानक और वीर-पराक्रमी।
Hey Tejaswin! Let those accomplishing Yagy and those inviting you should favour you. Let Agni Dev function as a messenger moving with high speed. Women and children should possess excellent psyche. You should watch the gifts as a brave warrior (protector).
अश्विना त्वाग्रे मित्रावरुणोभा विश्वे देवा मरुतस्त्वा ह्वयन्तु।
अधा मनो वसुदेयाय कृणुष्व ततो न उग्रो वि भजा वसूनि॥
हे तेजस्विन्! (राजन्) मित्रावरुण, अश्विनीकुमार, विश्वेदेवा और मरुद्गण आपको आमंत्रित करें। आप अपने चित्त को धन तथा दान जैसे कार्यों में लगाएँ और अत्यन्त पराक्रमी (प्रचण्डवीर) होकर हमको भी योग्यतानुसार ऐश्वर्य (धन-वैभव) प्रदान करें।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.4)
Hey Tejaswin-king! Let Mitra-Varun, Ashwani Kumars and Marud Gan invite you. Put you mind-brain into activities alike wealth and donations, become mighty and grant us grandeur as per status-ability.
आ प्र द्रव परमस्याः परावतः शिवे ते द्यावापृथिवी उभे स्ताम्।
तदयं राजा वरुणस्तथाह स त्वायमह्वत् स उपेदमेहि॥
हे तेजस्विन् (राजन)! आप दूर देश से भी तीव्रगति से यहाँ उपस्थित हों (पधारें) द्यावापृथिवी (आकाश और पृथ्वी) आपके हेतु मंगलकारी सिद्ध हो। राजा वरुण भी आपका आह्वान करते हैं, अतः आप यहाँ पधार कर इसे ग्रहण करें।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.5)
Hey Tejaswin-king! Arrive here from distant places with high speed. Let heavens and earth become auspicious to you. King Varun too invoke-invite you, so arrive here as well.(21.04.2026)
इन्द्रेन्द्र मनुष्या: 3 परेहि सं ह्यज्ञास्था वरुणैः संविदानः।
स त्वायमह्वत् स्वे सधस्थे स देवान् यक्षत् स उ कल्पयाद् विशः॥
हे राजओं के राजा देवराज इन्द्र! आप मानवों के निकट उपस्थित हों (पधारें) वरुणदेव से संयुक्त होकर आपको जाना गया है। इसलिए इन प्रत्येक धारण कर्ताओं ने आपको अपने स्थान पर आमंत्रित किया है। ऐसे आप, देवगणों का यजन करते हुए प्रजाओं को अपने-अपने कर्त्तव्य में लगाएँ।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.6)
Hey king of kings Devraj Indr! Present near the humans along with Varun Dev. They all have invited you, at their place. Let all the demigods be assigned their respective duties, by you.
पथ्या रेवतीर्बहुधा विरूपाः सर्वाः सङ्गत्य वरीयस्ते अक्रन्।
तास्त्वा सर्वाः संविदाना हृयन्तु दशमीमुग्रः सुमना वशेह॥
हे तेजस्विन् (राजन्)! विभूति सम्पन्न, निश्चित पथ पर (लक्ष्य की ओर) गमन करने वाली, विभिन्त्र स्वरूपों वाली प्रजाओं ने संयुक्त रूप से आपके हेतु यह पद निर्मित किया है। वे सभी आपको समान चित्त होकर आमंत्रित करें। आप उग्रवीर एवं अति उत्तम चित्त वाले होकर दसमी (चरमा वस्था, ब्रह्म प्राप्ति) को अपने अधिकार में करें।(अथर्ववेद, राजासंवरण सूक्त 3.4.7)
Hey Tejaswin! The populace-subjects possessing glory-grandeur marching towards their goal have jointly created this post of king. Let all of them invite with like mind. You should be mighty-majestic, having excellent psyche (thoughts, ideas) and attain the tenth stage, i.e., attainment of Brahm.
अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- सोम या पर्णमणि; छन्द :- अनुष्टुप्, 1 पुरोऽनुष्टुत्रिष्टुप्, 4 त्रिष्टुप्, 8 विराट्ठरोबृहती।
आयमगन् पर्णमणिर्बली बलेन प्रमृणन्त्सपत्नान्।
ओजो देवानां पय ओषधीनां वर्चसा मा जिन्वत्वप्रयावन्॥
यह बल से युक्त पर्णमणि (अस्त्र) अपने बल द्वारा शत्रुओं का विनाश करने वाली है। यह देवगणों का ओज स्वरूप एवं औषधियों का साररूप है। यह हमें अपने वर्चस् तेज से पूर्ण कर दे।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.1)
वर्चस् :: तेज, कांति, चमक, दीप्ति, ओज या आभा है, जो किसी व्यक्ति के व्यक्तित्व में निहित शक्ति, प्रताप, विशेष रूप या ऊर्जा को दर्शाता है।
Parn Mani, possessing strength is capable of destroying the enemies. Its like the radiance of the demigods and extract of medicines. Let it fill us with its aura.
मयि क्षत्रं पर्णमणे मयि धारयताद् रयिम्। अहं राष्ट्रस्याभीवर्गे निजो भूयासमुत्तमः॥
हे पर्णमणे! आप हमारे भीतर बल एवं वैभव प्रतिष्ठित करें, जिससे हम राज्य के विशेष वर्ग में उत्तम आत्मीय बन कर रहें।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.2)
Hey Parn Mani! Establish might-power and grandeur in us, so that we continue to remain best affectionate amongest the special categories of the subjects-populace.
यं निदधुर्वनस्पतौ गुहां देवाः प्रियं मणिम्। तमस्मभ्यं सहायुषा देवा ददतु भर्तवे॥
इस गुप्त एवं प्रिय मणि को देवगणों ने वनस्पतियों में प्रतिष्ठित किया है, क्योंकि यह मणि देवराज इन्द्र आदि देवगणों को मनोवांछित फल प्रदान करने वाली है। अतः उस मणि को देवता जन पालन-पोषण एवं आयु की वृद्धि के हेतु हमें प्रदान करें।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.3)
This secret and affectionate-dear Mani has been established in the vegetation, since it grant desired rewards to Devraj Indr & demigods, deities. Hence, grant this Mani to us for the nourishment, nurture and increase of life of the subjects-populace.
सोमस्य पर्णः सह उग्रमागन्निन्द्रेण दत्तो वरुणेन शिष्टः।
तं प्रियासं बहु रोचमानो दीर्घायुत्वाय शतशारदाय॥
इन्द्र देव के द्वारा प्रदत्त (प्रदान की हुई) एवं वरुण देवता के द्वारा सुसंस्कारित यह सोमपर्णमणि अत्यंत शक्ति से युक्त हो, हमें प्राप्त हो। उस तेज से युक्त मणि को हम लम्बी आयु एवं सौ वर्ष की आयु प्राप्ति हेतु प्रिय मानते हैं।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.4)
This Som Parn Mani granted by Devraj Indr and sanctified by Varun Dev, should have extreme power and availble to us. We consider this aurous Mani a loved-prized possession for long life of hundred years.
आ मारुक्षत् पर्णमणिर्मह्या अरिष्टतातये। यथाहमुत्तरोऽसान्यर्यम्ण उत संविदः॥
यह पर्णमणि लम्बे समय तक हमारे पास रहती हुई हमारे हेतु मंगलकारी सिद्ध हो। हम अर्यमादेव की अनुकम्पा से इसे ग्रहण करके समान शक्तिशालियों से भी शक्तिशाली बन सकें।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.5)
Let this Parn Mani remain with us for long and become auspicious for us. We should acquire this Mani with the blessings of Aryma Dev and become mightier than the mighty.
ये धीवानो रथकाराः कर्मारा ये मनीषिणः।
उपस्तीन् पर्ण मह्यं त्वं सर्वान् कृण्वभितो जनान्॥
हे पर्णमणे! धीवर, रथकार (रथ का निर्माण करने वाले) लौह कर्म करने वाल (लाहार कार्य करने वाले), जो बुद्धिजीवी ज्ञानी (विद्वान्) हैं, उन सभी को हमारे चारों ओर परिचय हेतु आप उपस्थित करें।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.6)
Hey Parn Mani! Present the water sprinklers, charoite makes and the learned-scholars before us, for introduction.
ये राजानो राजकृतः सूता ग्रामण्यश्च ये।
उपस्तीन् पर्ण महां त्वं सर्वान् कृण्वभितो जनान्॥
हे मणे! जो विविध देशों के शासक (राजा) तथा शासकों (राजाओं) का अभिषेक करने वाले हैं एवं जो सूत व गाँव के नायक है, उन सबको आप हमारे चारों तरफ उपस्थित करें।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.7)
Hey Mani! Present those who anoint the kings, rulers, emperors, Soot & the village heads around us.
पर्णोऽसि तनूपानः सयोनिर्वीरो वीरेण मया। संवत्सरस्य तेजसा तेन बध्नामि त्वा मणे॥
सोम के पर्ण से उद्भुत हुई हे मणे! आप शरीर की सुरक्षा करने वाली हैं। आप पराक्रमी हमारे सदृश उत्पन्न हुई है। आप सविता के तेज से सम्पन्न है, अतः आपका तेज प्राप्त करने हेतु हम आपको ग्रहण करते हैं।(अथर्ववेद, राजा और राजकृत सूक्त 3.5.8)
Hey Mani born out of the leave of Som! You protect the body. Possessing valour, you have evolved like us. You possess the radiance of Savita. We accept you for attainment of your aura-radiance.
अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6) :: ऋषि :- जगद्वीज पुरुष; देवता :- अश्वत्थ (वनस्पति); छन्द :- अनुष्टुप्।
पुमान् पुंसः परिजातोऽश्वत्थः खदिरादधि।
स हन्तु शत्रून् मामकान् यानहं द्वेष्मि ये च माम्॥
जिस प्रकार वीर्यवान् (पराक्रमी) से पराक्रमी का जन्म होता है, उसी प्रकार खदिर (खैर वृक्ष अथवा आकाश से आपूर्ति करने वाले चक्र) के भीतर विद्यमान् अश्वत्थ (पीपल या विश्व वृक्ष) की उत्पत्ति हुई है। वह अश्वत्थ (तेज से युक्त) उन शत्रुओं (विकारों) को विनष्ट करें, जो हमसे घृणा करते हैं एवं जिनसे हम घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.1)
The way a person having valour-might is born similarly the Khaer, Peepal tree has evolved. This tree possessing aura should destroy the defects in us and those whom we hate and those hated by us.
Peepal tree is considered to be a form of Bhagwan Shri Hari Vishnu over earth).
तानश्वत्थ निः शृणीहि शत्रून् वैबाधदोधतः। इन्द्रेण वृत्रघ्ना मेदी मित्रेण वरुणेन च॥
हे अश्वत्थ (खदिर से उत्पन्न हुई) मणे! आप विभिन्न प्रकार की रूकावटें पैदा करने वाले उन द्रोहियों को समाप्त करें। इस उद्देश्य की पूर्ति हेतु आप वृत्र नामक असुर के संहारक इन्द्रदेव, सखा एवं वरुण देवता के प्रिय बनकर रहें।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.2)
Hey Ashwasth Mani (born our of Khadir-Khaer)! Destroy those traitors who create obstecles. You should be dear to slayer of Vratra sur Devraj Indr, Mitr and Varun Dev.
यथाश्वत्थ निरभनोऽन्तर्महत्यर्णवे। एवा तान्त्सर्वान्निर्भङ्ग्धि यानहं द्वेष्मि ये च माम्॥
हे अश्वत्थ! जैसे आपका जन्म अर्णव को चीरकर हुआ है, वैसे ही आप हमारे उन शत्रुओं का पूर्णतया विनाश कर दें जिनसे हम घृणा करते हैं और जो हमसे घृणा करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.3)
Hey Ashwasth! The way you evolved tearing the sky-space, similarly you destroy our enemies and those who hate us those who are hated by us.(22.04.2026M)
यः सहमानश्चरसि सासहान इव ऋषभः। तेनाश्वत्थ त्वया वयं सपत्नान्त्सहिषीमहि॥
हे अश्वत्थ! जिस प्रकार आप शत्रु को कुचलने वाले वृष के समान वृद्धि करते हैं (पीपल का वृक्ष दूसरे वृक्षों को रोदता हुआ एक वृषभ की तरह बढ़ता है) उसी तरह आपकी सहायता द्वारा हम मानव अपने शत्रुओं का विनाश करने में सक्षम हो।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.4)
Hey Ashwasth! The way a bull move ahead killing the enemies, Peepal tree too crush other trees. Similarly, we humans should be capable of destroying our enemies with your help.
Peeple tree yield oxygen 24 hours. But it should not be planted near the house since the building may crash due to its expansion-growth.
सिनात्वेनान् निर्ऋतिर्मुत्योः पाशैरमोक्यैः।
अश्वत्थ शत्रून् मामकान् यानहं द्वेष्मि ये च माम्॥
हे अश्वत्थ! निर्ऋति देव हमारे उन शत्रुओं को न टूटने वाले मृत्यु के बंधन में बाँधते हैं, जो हमसे बैर करते हैं एवं जिनसे हम बैर करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.5)
Hey Ashwasth! Nirati Dev tie our those enemies who are envious to us or we are envious to them, with the bond of death which do not break.
यथाश्वत्थ वानस्पत्यानारोहन् कृणुषेऽधरान्।
एवा मे शत्रोर्मूर्धानं विष्वम् भिन्द्धि सहस्व च॥
हे अश्वत्थ! जिस जरह आप ऊपर विद्यमान् होकर वनस्पत्तियों को नीचे प्रतिष्ठित करते हैं, उसी प्रकार हमारे शत्रुओं के मस्तक को सभी ओर से फाड़ करके उनका विनाश कर डालें।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.6)
Hey Ashwasth! The way you rise up and keep other vegetable below, simialry break the heads of our enemies from all sides and destroy them.
तेऽधराञ्चः प्र प्लवन्तां छिन्ना नौरिव बन्धनात्। न वैबाधप्रणुत्तानां पुनरस्ति निवर्तनम्॥
जिस तरह नाव का बन्धन खुल जाने पर वह नदी की धारा में नीचे की ओर बहने लगती है, उसी प्रकार हमारे शत्रु नदी की धारा में प्रवाहित हो जाएँ। अनेकानेक बाधाओं को उत्पन्न करने वालों का फिर से वापस आना असम्भव हो जाएँ।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.7)
The way the boat start moving down stream with untying, similarly let our enemies flow in the river current. It should be impossible to return for those, who create several obstructions.
प्रैणान् नुदे मनसा प्र चित्तेनोत ब्रह्मणा। प्रैणान् वृक्षस्य शाखयाश्वत्थस्य नुदामहे॥
हम इन शत्रुओं (विकारों) को ब्रह्मज्ञान के द्वारा मन तथा चित्त से दूर करते हैं। उन्हें हम अश्वत्थ (जीवन वृक्ष) की शाखाओं (प्राण धाराओं) द्वारा दूर करते हैं।(अथर्ववेद, शत्रुनाशन सूक्त 3.6.8)
We repel-remove the defects of mind, psyche, mood in the form of enemies with Brahm Gyan, enlightenment pertain to the Almighty. We keep the defects off with the branches of Ashwasth tree i.e., Air Vital.
अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त (3.7) :: ऋषि :- भृग्वङ्गिरा; देवता यक्ष्मनाशन (1-3 हरिण, 4 तारागण, 5 आपः, 6-7 यक्ष्मनाशन); छन्द :- अनुष्टुप्, 1 भुरिक् अनुष्टुप्।
हरिणस्य रघुष्यदोऽधि शीर्षणि भेषजम्। स क्षेत्रियं विषाणया विषूचीनमनीनशत्॥
द्रुतगति (तीव्रगति) से दौड़ने वाले मृग (हिरण अथवा सूर्य) के शीर्ष (सबसे ऊचाँ भाग या सिर) में व्याधियों का विनाश करने वाली औषधि है। वह अपने विषाण (सींग या विशेष प्रभाव) से क्षेत्रीय व्याधियों का विनाश करने वाला है।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.1)
The medicine for curing diseases is found in the upper segment of the head of the fast moving deer-stage (Sun). He is capable of destroying local ailments with the impact of its horns.
अनु त्वा हरिणो वृषा पद्भिश्चतुर्भिरक्रमीत्। विषाणे वि ष्य गुष्पितं यदस्य क्षेत्रियं हृदि॥
यह शक्तिशाली मृग (हिरण अथवा सूर्य) अपने चारों पैरों से तुम्हारे प्रतिकूल होकर हमला करते हैं। हे मृगश्रृंग (हिरण के सींग या विषाण)। आप इसके अर्थात् पीड़ित व्यक्ति के हृदय में विद्यमान् गुप्त क्षेत्रिय व्याधियों का विनाश करें।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.2)
This powerful deer (Sun) attack you on being against you, with its four legs. Hey Mrag Shrang (deer horn)! Destroy the secret local ailments in the heart of the diseased-ill person.
अदो यदवरोचते चतुष्पक्षमिवच्छदिः। तेना ते सर्वं क्षेत्रियमङ्गेभ्यो नाशयामसि॥
यह जो चार पक्ष (कोनों अथवा विशेषताओं) से सम्पन्न छत की तरह (हिरण का चर्म अथवा अंतरिक्ष) शोभायमान हो रहा है, उससे हम आपके अंगों से सम्पूर्ण क्षेत्रिय व्याधियों को नष्ट करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.3)
Let the 4 corners of the deer skin which is glorified like a roof, destroy the local ailments of your all organs.
अमू ये दिवि सुभगे विद्युतौ नाम तारके। वि क्षेत्रियस्य मुञ्चतामधमं पाशमुत्तमम्॥
आकाश में विद्यमान् जो विद्युत नाम के सौभाग्य सूचक तारागण हैं, वे सम्पूर्ण तारागण क्षेत्रिय व्याधियों को शरीर के ऊपर एवं नीचे के अंगों से अलग करें।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.4)
The group of lucky stars named Vidyut-electricity, in the sky should destroy the diseases present in the lower and upper organs of the body.
आप इद् वा उ भेषजीरापो अमीवचातनीः।
आपो विश्वस्य भेषजीस्तास्त्वा मुञ्चन्तु क्षेत्रियात्॥
जल सभी व्याधियों की औषधि है। स्नान के द्वारा तथा सेवन करने के द्वारा ही जल औषधि रूप में समस्त व्याधियों को नष्ट करता है। जल दूसरी औषधियों की तरह किसी एक मात्र व्याधि का नहीं, बल्कि सम्पूर्ण व्याधियों की औषधि है। हे रोगग्रस्त मनुष्य! ऐसे जल द्वारा तुम्हारे समस्त व्याधियों का निवारण हो जाए।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.5)
Water is the medicine of all diseases. By bathing and drinking, water destroys all diseases. Its not a medicine of just one disease, but it cures all diseases. Hey diseased person! Let the water cure your ailments.
यदासुतेः क्रियमाणायाः क्षेत्रियं त्वा व्यानशे।
वेदाहं तस्य भेषजं क्षेत्रियं नाशयामि त्वत्॥
हे रोग ग्रस्त मनुष्य! विकार युक्त स्त्रवित रस से आपके भीतर जो क्षेत्रिय व्याधि की उत्पत्ति हुई है, उसकी औषधि से हम परिचित है। उस औषधि द्वारा हम आपके क्षेत्रिय व्याधियों का विनाश करते हैं।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.6)
Hey man suffering from disease! We are aware of the local disease which has entered your body due to the defective-contaminated fluid. We are aware of its medicine. We cure your local diseases with that medicine.
अपवासे नक्षत्राणामपवास उषसामुत। अपास्मत् सर्वं दुर्भूतमप क्षेत्रियमुच्छतु॥
नक्षत्रों के चले जाने पर उषाकाल (भोर) में एवं उषा के दूर हो जाने पर दिन में सम्पूर्ण अनिष्ट हमसे दूर हो जाएँ। क्षेत्रिय रोग आदि भी इसी प्रकार नष्ट हो जाएँ (दूर हो जाएँ)।(अथर्ववेद, यक्ष्मनाशन सूक्त 3.7.7)
अनिष्ट :: अवांछित, अशुभ, अहित, अमंगल; unwelcome, forbidding.
Let all undesirable-unwelcome omens move away from us with the disappearance of constellations and rise of Sun-Usha-dawn. Similarly, all local ailments should move away from us.
अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त (3.8) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- मित्र (1 पृथिवी, वरुण, वायु, अग्नि, 2 धाता, सविता, इन्द्र, त्वष्टा, अदिति, 3 सोम, सविता, आदित्य, अग्नि, 4 विश्वेदेवा, 5-6 मन); छन्द :- त्रिष्टुप्, 2, 6 जगती, 4 चतुष्पदा विराट् बृहतीगर्भा त्रिष्टुप्, 5 अनुष्टुप्।
आ यातु मित्र ऋतुभिः कल्पमानः संवेशयन् पृथिवीमुस्त्रियाभिः।
अथास्मभ्यं वरुणो वायुरग्निर्वृहद् राष्ट्र संवेश्यं दधातु॥
मित्रदेव अपनी किरणों के द्वारा धरती को संव्याप्त करते हुए ऋतुओं के द्वारा हमें दीर्घ आयु प्रदान करने में समर्थ होकर उपस्थित हों। तत्पश्चात् वरुण देव, वायु देव और अग्नि देव हमारे हेतु शान्ति प्रदायक विस्तृत राज्य को सुस्थिर (शांत) करें।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.1)
Let Mitr Dev cover the earth with his rays and grant us long life through the seasons. Thereafter, Varun Dev, Vayu Dev and Agni Dev maintain stability and peace in our vast country for us.
धाता रातिः सवितेदं जुषन्तामिन्द्रस्त्वष्टा प्रति हर्यन्तु मे वचः।
हुवे देवीमदितिं शूरपुत्रां सजातानां मध्यमेष्ठा यथासानि॥
सबको ग्रहण करने वाले धातादेव, दान करने वाले अर्यमादेव और सभी को प्रेरित करने वाले सवितादेव हमारे हवि को स्वीकार करें। देवराज इन्द्र और त्वष्टादेव हमारी स्तुतियों को श्रवण करें। शूरवीर पुत्रों की माता देवी अदिती का हम आह्वान करते हैं अर्थात् बुलाते हैं। इनकी अनुकम्पा से हम सजातियों (समान जाति वालों) के मध्य में हम आदरणीय बन सकें।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.2)
Let Dhata Dev, who accept everyone, Aryma Dev who make donations and Savita Dev who inspire everyone; accept our offerings-oblations. Let Devraj Indr and Twasta Dev listen-respond to our Stuties-prayers. We invoke the mother of brave sons Mata Aditi. By virtue of her blessing we can become respectable-honourable amongest the people of same clan-caste. (22.04.2026)
हुवे सोमं सवितारं नमोभिर्विश्वानादित्याँ अहमुत्तरत्वे।
अयमग्निनर्दीदायद् दीर्घमेव सजातैरिन्द्धोऽ प्रतिब्रुवद्भिः॥
प्रयोगकर्ता याजक (यज्ञ करने वाले) को अति उत्तम पद दिलाने हेतु हम सोम देव, सविता देव एवं सम्पूर्ण आदित्यों का नमन के साथ आह्वान करते हैं। हवियों (आहुतियों) के आधारभूत अग्निदेव प्रज्वलित हो, जिससे हम अपनी जाति वालों के द्वारा लम्बे समय तक अभ्युदय (वृद्धि) को प्राप्त करते रहें।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.3)
We invoke Som Dev, Savita and all Adity Gan for granting high post-designation to the performers of Yagy. Let Agni Dev at the base of the offerings-oblations ignite, so that we continue to ensure our rise amongest our own caste-clan for long time.
इहेदसाथ न परो गमाथेर्यो गोपाः पुष्टपतिर्व आजत्।
अस्मै कामायोप कामिनीर्विश्वे वो देवा उपसंयन्तु॥
हे शरीर अथवा राष्ट्र में निवास करने वाली प्रजाओं-शक्तियों! आप इसी स्थान पर रहें, कहीं दूर न जाएँ। अन्न अथवा विद्याओं से सम्पन्न गौ (गाय, धरती या इन्द्रियों) की रक्षा करने वाले, पोषण को प्रदान करने वाले आपको लाएँ। इच्छा से सम्पन्न आप प्रजाओं को इस इच्छा पूर्ति हेतु विश्वेदेव, एक साथ संबद्ध करें।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.4)
Hey subjects-powers residing in the body/country! Stay over here, do not move away. Bring those having food grains or learnings granting nourishment to cows. Connect the populace having desires-wishes with Vishwe Dev.
सं वो मनांसि सं व्रता समाकूतीर्नमामसि। अमी ये विव्रता स्थन तान् वःसं नमयामसि॥
(हे मानवों) हम आपके विचारों, कृत्यों एवं दृढ़ निश्चयों को एक भाव से संबद्ध करते हैं। पहले आप जो प्रतिकूल कृत्य करते थे, उन सबको हम अति उत्तम विचारों के द्वारा अनुकूल करते हैं।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.5)
Hey humans! We connect your thoughts-ideas, actions-efforts and determination-resolves with one feeling. We divert your earlier opposite deeds (wicked, vicious, sinful) with favourable excellent-virtuous thoughts.
अहं गृभ्णामि मनसा मनांसि मम चित्तमनु चित्तेभिरेत्।
मम वशेषु हृदयानि वः कृणोमि मम यातमनुवर्मान एत॥
हम अपने चित्त में आपके चित्त को धारण करते हैं। आप भी हमारे मन के अनुकूल अपने चित्त को बनाकर उपस्थित हों (पधारें)। आपके हृदय को हम अपने वशीभूत करते हैं। आप हमारे अनुकूल चलने वाले होकर उपस्थित हों (पधारें)।(अथर्ववेद, राष्ट्रधारण सूक्त 3.8.6)
We support your innerself. You too make your innerself like us. We control your heart. You too make your self favourable to us.
अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9) :: ऋषि :- वामदेव; देवता :- द्यावापृथिवी, विश्वेदेवा; छन्द :- अनुष्टुप्, 4 चतुष्पदा निघृत् बृहती, 6 भुरिक् अनुष्टुप्।
कर्शफस्य विशफस्य द्यौष्पिता पृथिवी माता। यथाभिचक्र देवास्तथाप कृणुता पुनः॥
कृशफ (बलहीन या कृश खुरों-नाखुनों वाले) प्राणी, विशफ (बिना खुर वाले, रेंगने वाले या विशेष खुरों वाले) प्राणियों का पालनकर्त्ता माता-पिता, धरती एवं द्यौ हैं। हे देवगणों! जैसे आपने इन विघ्न-बाधाओं के कारणों को हमारे समक्ष उपस्थित किया है, वैसे ही इन रूकावटों को हमसे दूर करें।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.1)
Parents, heavens and earth nourish-nurture those with or without hoofs and the creepers. Hey demigods! The way you have presented the trouble-hindrance before us, similarly remove them as well.
अश्रेष्माणो अधारयन् तथा तन्मनुना कृतम्। कृणोमि वध्रि विष्कन्धं मुष्काबों गवामिव॥
जो मनुषा श्रान्त (थकना) नहीं होते वही इस मणि को प्राप्त करते हैं। मनु ने भी यही किया था। विष्कंध आदि व्याधियों को वैसे ही बानहीन (निर्बल) करते हैं, जैसे वृषमों को बधिया बनाने वाले आपने वश में करते है।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.2)
Those humans who are not tired attain this Many-jewel. Manu to did this. Diseases like Vishkandh are made weak (cured) like the bulls, who are castrated and controlled making them docile.
पिशङ्गे सूत्रे खृगलं तदा बध्नन्ति वेधसः। श्रावस्युं शुष्मं काबवं वधिं कृण्वन्तु बन्धुरः॥
चिंगल वर्ण वाले (पीले रंग का) तागे (सूत्र) से उस खृगलं (मणि या दुर्धर्ष) को हम बाँधते हैं। इस तरह आबद्ध (बाँधना) करने वाले बलवान्, प्रबल, सुरखाने वाले (शोषक) व्याधियों को बलहीन (निर्बल) बनाएँ।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.3)
We tie the Jewel-Mani of yellow colour. Tying Mani this way make the diseases weak, which weaken the body.
येना श्रवस्यवश्चरथ देवा इवासुरमायया। शुनां कपिरिव दूषणो बन्धुरा काबवस्य च॥
हे यशस्वियों! आप जिस प्रकृष्ट बल वाली (प्रबल) माया के द्वारा देवताओं की भाँति व्यवहार करते हैं, वैसे ही मणि को आबद्ध करने वाले (बाँधने वाले) मनुष्य दोषों (दूषणों) तथा रोगों से दूर रहते हैं, ठीक उसी प्रकार जैसे बन्दर कुत्तों से मुक्त (दूर) रहते हैं।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.4)
Hey glorious! The strong illusion with which you act like demigods, similarly those who tie the Mani; keep off defects-contamination away from them like repelling dogs and monkeys.
दुष्टयै हि त्वा भत्स्यामि दूषयिष्यामि काबवम्। उदाशवो रथा इव शपथेभिः सरिष्यथ॥
हे मणि अथवा रोगों को नष्ट करने वाली शक्ति! दूसरों के द्वारा उपस्थित (उत्पन्न) किए गए विघ्नों (बाधा) को असफल करने हेतु हम आपको धारण (प्राप्त) करते हैं। आपके द्वारा हम बाधाओं को दूर करते हैं। हे मनुष्यों! तीव्रगति से चलने वाले रथों की तरह आप बाधा मुक्त (दूर) होकर अपने कृत्यों (कार्य) में लग जाएँ।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.5)
Hey Mani or the power to keep-ward off diseases! We tie you to keep off the disturbances created by others. By virtue of you, we keep away the obstecles. Hey Humans! Like the fast moving charoite you should become free from obstecles-disturbances and be busy with your endeavours.
एकशतं विष्कन्धानि विष्ठिता पृथिवीमनु। तेषां त्वामग्र उज्जहरुर्मणिं विष्कन्धदूषणम्॥
पृथ्वी पर सैकड़ों बाधाएँ स्थित हैं। हे मणे! उन बाधाओं को समाप्त करने हेतु देवगणों ने आपको ऊँचे स्थान पर बैठाया है।(अथर्ववेद, दुःखनाशन सूक्त 3.9.6)
Hundred of obstecles are present over the earth. Hey Mani! The demigods have placed you at an elevated place to remove those trouble-obstecles.
अथर्ववेद,रायस्पोषप्राप्ति सूक्त (3.10) :: ऋषि :- अथर्वा; देवता :- अष्टका (1 धेनु, 2-4 रात्रि, धेनु, एकाष्टका, 6 जातवेदा, पशुसमूह, 7 रात्रि, यज्ञ, 8 संवत्सर, 9 ऋतुएँ, 10 धात-विधाता, ऋतुएँ, 11 देवगण, 12 इन्द्र, देवगण, 13 प्रजापति; छन्द :- अनुष्टुप्, 4-6, 12 त्रिष्टुप्, 7 त्र्यवसाना षट्पदा विराट् गर्भातिजगती।
प्रथमा हव्यु वास सा धेनुरभवद् यमे। सा नः पयस्वती दुहामुत्तरामुत्तरां समाम्॥
जो एकाष्टका पहले उत्पन्न हुई अर्थात् जिस एकाष्टका संबधी भोर (उषा) ने अँधेरे को समाप्त किया, वह सृष्टि के प्रारम्भ काल में उदित हुई है और वह नियमित व्यवहार वाली धेनु (गौ) के सदृश धारण-पोषण करने वाली सिद्ध हुई। वह पथ-प्रवाहित करने वाली दिव्य धेनु हमारे निमित्त पथ-प्रदायक बनी रहें अर्थात् दिव्य धेनु हमें श्रेष्ठ फल प्रदान करने वाली बने।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.1)
एकाष्टका :: माघ महीने (January–February) के कृष्ण पक्ष की अष्टमी (अष्टका) तिथि से है, जो विशेष रूप से ऋग्वेद और अथर्ववेद में एक पवित्र देवी या समय के रूप में वर्णित है। यह संवत्सर (वर्ष) की पत्नी, प्रजापति की पुत्री और इंद्र-जननी मानी जाती हैं, जो नए साल के आगमन और सृजन का प्रतीक हैं।
Ekashtka Tithi proved like Usha which removed darkness, evolved in the beginning of evolution and proved nourishing like the cow. Let that guiding divine cow grant us excellent output rewards.(24.04.2026)
यां देवाः प्रतिनन्दन्ति रात्रिं धेनुमुपायतीम्। संवत्सरस्य या पत्नी सा नो अस्तु सुमङ्गली॥
एकाष्टका से सम्बन्ध रखने वाली जिस रात रूपी गाय का अवलोकन करके देवता लोग प्रसन्न होते हैं एवं जो संवत्सर रूप काल की पत्नी (भार्या) है, वह हमारे हेतु कल्याणकारी हो।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.2)
The demigods-deities are gladdened with night related to Ekashtka in the form of cow and wife in the form Sanvatsar (time period) should be beneficial to us.
संवत्सरस्य प्रतिमां यां त्वा रात्र्युपास्महे। सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज॥
हे रात्रि! हम आपको संवत्सर की प्रतिमा मानकर आपकी पूजा करते हैं। आप हमारी संतानों को शतायु प्रदान करें एवं हमें गाय आदि धन से परिपूर्ण करें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.3)
Hey night! We consider you to be the image of Sanvatsar and worship you. Grant longevity of hundred years to our progeny in addition to cows and wealth.
SAMVATSAR सम्वतसर :: इनको वर्ष भी कहते हैं। प्रत्येक वर्ष का अलग नाम होता है। कुल 60 वर्ष होते हैं तो एक चक्र पूरा हो जाता है। इनके नाम :- प्रभव, विभव, शुक्ल, प्रमोद, प्रजापति, अंगिरा, श्रीमुख, भाव, युवा, धाता, ईश्वर, बहुधान्य, प्रमाथी, विक्रम, वृषप्रजा, चित्रभानु, सुभानु, तारण, पार्थिव, अव्यय, सर्वजीत, सर्वधारी, विरोधी, विकृति, खर, नंदन, विजय, जय, मन्मथ, दुर्मुख, हेमलम्बी, विलम्बी, विकारी, शार्वरी, प्लव, शुभकृत, शोभकृत, क्रोधी, विश्वावसु, पराभव, प्ल्वंग, कीलक, सौम्य, साधारण, विरोधकृत, परिधावी, प्रमादी, आनंद, राक्षस, नल, पिंगल, काल, सिद्धार्थ, रौद्रि, दुर्मति, दुन्दुभी, रूधिरोद्गारी, रक्ताक्षी, क्रोधन और अक्षय।
It’s a Sanskrat term for year. There are 60 Samvatsar, each of which has a name. Once all 60 Samvatsar are over, the cycle starts over again. The sixty Samvatsar are divided into 3 groups of 20 Samvatsar each. The first 20 from Prabhav to Vyay are attributed to Brahma. The next 20 from Sarv Jit to Parabhav are devoted to Bhagwan Vishnu & the last 20 are dedicated to Shiv. Kalo Gati Nivartti Sthiti: Samdadhati (Sankhyana Aranyak 7.20).
1. Prabhav प्रभव | 13. Pramathin | 25. Khar | 37. Shobhan | 49. Rakshas |
2. Vibhav | 14. Vikram | 26. Nandan | 38. Krodhin | 50. Anal |
3. Shukl | 15. Vrisha | 27. Vijay | 39. Vishvavasu | 51. Pingal |
4. Pramod | 16. Chitrabhanu | 28. Jay | 40. Parabhav | 52. Kal Yukti |
5. Prajapati | 17. Svabhanu | 29. Manmath | 41. Plavang | 53. Siddharthin |
6. Angira | 18. Taran | 30. Durmukh | 42. Kilak | 54. Raudr |
7. Shrimukh | 19. Parthiv | 31. Hemalambin | 43. Saumy | 55. Durmati |
8. Bhav | 20. Avyay | 32. Vilambin | 44. Sadharan | 56. Dundubhi |
9. Yuvan | 21. Sarvajit | 33. Vikarin | 45. Virodhikrit | 57. Rudhirodgarin |
10. Dhatri | 22. Sarvadharin | 34. Shravani | 46. Paritapin | 58. Raktaksh |
11. Ishvar | 23. Virodhin | 35. Plav | 47. Pramadin | 59. Krodhan |
12. Bahudhany | 24. Vikrit | 36. Shubhakrit | 48. Anand | 60. Kshay |
Please refer to :: Ancient Hindu Calendar काल गणना santoshkipathshala.blogspot.com
इयमेव सा या प्रथमा व्यौच्छदास्वितरासु चरति प्रविष्टा।
महान्तो अस्यां महिमानो अन्तर्वधूर्जिगाय नवगज्जनित्री॥
यह एकाष्टका वही है, जो सृष्टि प्रारम्भ काल में जन्मी है और अन्य घटकों में व्याप्त होकर चलती हैं। इसके भीतर कई महानताएँ विद्यमान् हैं। वह नववधू की भाँति प्रजननशील एवं जयशील होकर चलती है।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.4)
This is the same Ekashtka which appeared in the beginning of evolution. It proceed on being divided into several segments. It has many great qualities. Its comparable to new bride who is ready to reproduce and glorious-victorious.
वानस्पत्या ग्रावाणो घोषमक्रत हविष्कृण्वन्तः परिवत्सरीणम्।
एकाष्टके सुप्रजसः सुवीरा वयं स्याम पतयो रयीणाम्॥
संवत्सर में चल रहे हवन हेतु हवन में डालने वाली सामग्री तैयार करने के क्रम में वनस्पतियों और पत्थर शब्द कर रहे हैं। हे एकाष्टके! आपकी कृपा द्वारा हम उत्कृष्ट पुत्र-पौत्रादि और वीरों से युक्त होकर बहुत अधिक धन के अधिपति हों।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.5)
Vegetations and stones are making sound while preparing offerings-oblations for Hawan accomplished during Sanvatsar. Hey Ekashtake! By virtue of your blessings-mercy we should have excellent sons & grand sons, warriors and lots of wealth.
इडायास्पदं घृतवत् सरीसृपं जातवेदः प्रति हव्या गृभाय।
ये ग्राम्याः पशवो विश्वरूपास्तेषां सप्तानां मयि रन्तिरस्तु॥
पृथ्वी पर गतिमान हे जातवेदा अग्नि देवता! आप हमारी गौ-घी से युक्त हवि को स्वीकार कर आनंदित हों। जो गाँव में निवास करने वाले अनेकों स्वरूप वाले पशु हैं, उन (गाय, घोड़ों, भेड़, बकरी, पुरुष, गधा, ऊँट आदि) सप्त प्रकार के प्राणियों का हमारे प्रति प्रेम बना रहें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.6)
Hey Jat Veda Agni Dev, moving over the earth! Accept our offerings of cow's Ghee and gladden. Let us continue to have love-affection for the 7 types of animals residing in the village like sheep, goat, donkey-ass, camel, horses, cows.
आ मा पुष्टे च पोषे च रात्रि देवानां सुमतौ स्याम।
पूर्णा दर्वे परा पत सुपूर्णा पुनरा पत। सर्वान् यज्ञान्त्संभुञ्जतीषमूर्जं न आ भर॥
हे रात्रि! आप हमें धन-वैभव एवं संतान आदि से संम्पन्न करें। आपकी कृपा से हमारे ऊपर देवगणों की सुमति बनी रहे। यज्ञ के साधन रूप हे दर्वि! आप हवि से समृद्ध होकर देवताओं को प्राप्त हो। आप हमें मनोवांछित फल प्रदान करती हुई हमारे पास उपस्थित हों। तत्पश्चात् हवियों द्वारा संतुष्ट होकर हमें अन्न तथा बल प्रदान करें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.7)
Hey night! Grant us wealth, prosperity and sons. By virtue of your mercy-blessing demigods-deities should remain favourable to us. Hey Darvi (grass), used as means of Yagy! You should be obtained by the demigods-deities enriched with offerings and grant us desired rewards presenting yourself with us. Thereafter, on being satisfied with the offerings, grant us food grains and strength.
आयमगन्त्संवत्सरः पतिरेकाष्टके तव। सा न आयुष्मतीं प्रजां रायस्पोषेण सं सृज॥
हे एकाष्टके! यह संवत्सर आपका पति बनकर यहाँ उपस्थित हुआ है। आप हमारे पुत्र-पौत्रादि को दीर्घायु एवं धन-वैभव से समृद्ध करें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.8)
Hey Ekashtake! This Sanvatsar has come here as your husband. Grant us long life (of hundred years), wealth & prosperity to our sons and grandsons.
ऋतून् यज ऋतुपतीनार्तवानुत हायनान्।
समाः संवत्सरान् मासान् भूतस्य पतये यजे॥
हम ऋतुओं तथा उनके अधिष्ठाता देवगणों की हवि द्वारा उपासना करते हैं। संवत्सर के अंग रूप दिन व रात का हम हवि द्वारा यज्ञ करते हैं। ऋतु के अव्यव-कला, काष्ठा, चौबीस पक्षों संवत्सर के बारह माह तथा प्राणियों के अधिपति काल का हवि द्वारा यज्ञ करते हैं।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.9)
We worship the seasons and their deities with offerings. We perform Yagy for organs of Sanvatsar, day and night. The organs of seasons viz Kala, Kashtha, 24 Paksh, 12 months of the Sanvatsar and the Lord of Kal of living beings with offerings.
निमेषा दश चाश्टौ च काष्ठा त्रिंशत्तु ता: कला।
त्रिंशत्कला मुहूर्त: स्यादहोरात्रः॥
अठारह निमेष (पलक झपकना) एक काष्ठा, तीस काष्ठा का एक कला, तीस कला का एक मुहूर्त और तीस मुहूर्त का एक अहोरात्र होता है।[मनु स्मृति 1.64] त्रिंशत्कला मुहूर्त: स्यादहोरात्रः॥
Eighteen Nimesh (twinkling of the eye) constitute one Kashtha, thirty Kashtha are equal to one Kala, thirty Kala makes one Muhurt and 30 Muhurt constitute one Ahoratr i.e., day and night.
18 Nimesh = 1 Kashtha,
30 Kashtha = 1 Kala,
30 Kala = 1 Muhurt,
30 Muhurt = 1 Ahoratr.
18 Nimesh = 1 Kashtha,
30 Kashtha = 1 Kala,
30 Kala = 1 Muhurt,
30 Muhurt = 1 Ahoratr.
ऋतुभ्यष्ट्वार्तवेभ्यो माद्भ्य: संवत्सरेभ्यः।
धात्रे विधात्रे समृधे भूतस्य पतये यजे॥
हे एकाष्टके! माह, ऋतु, ऋतु से सम्बन्धित रात्रि व दिन, वर्ष धाता, विधाता एवं समृद्ध देवगण तथा संसार के अधिपति को आनन्दित करने हेतु हम आपका यज्ञ करते हैं।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.10)
धाता और विधाता :: परमेश्वर या ब्रह्मा, सृष्टिकर्ता और भाग्य विधाता।
Hey Ekashtake! We accomplish Yagy for you to please months, day & night related with the seasons, Year, Dhata & Vidhata Brahm-Almighty.
इडया जुह्वतो वयं देवान् घृतवता यजे। गृहानलुभ्यतो वयं सं विशेमोप गोमतः॥
हम गाय के घी से निर्मित (युक्त) हविष्यानों (हवियों) से सम्पूर्ण देवगणों हेतु यज्ञ करते हैं। उन देवगणों की दया से हम असंख्य गौओं से सम्पन्न गृहों को प्राप्त करते हुए सम्पूर्ण इच्छाओं की पूर्ति का लाभ प्राप्त कर सकें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.11)
We accomplish Yagy for the demigods-deities with the offerings made with cow's Ghee. We should be blessed with uncountable numbers of cows and the house occupying them, leading to accomplishment of our desires-wishes.
एकाष्टका तपसा तप्यमाना जजान गर्भ महिमानमिन्द्रम्।
तेन देवा व्यसहन्त शत्रून् हन्ता दस्यूनामभवच्छचीपतिः॥
इस एकाष्टके ने तप से स्वयं को तपाकर महिमावान् देवराज इन्द्र को प्रकट किया। उन इन्द्र देवता के पराक्रम के द्वारा देवताओं ने राक्षसों पर विजय प्राप्त की, क्योंकि वे शचीपति इन्द्र देवता शत्रुओं का विनाश करने वाले हैं।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.12)
Ekashtaka subjected herself to ascetics and evolved Devraj Indr. Devraj Indr won the demons with his valour, might & power; since Devraj Indr, husband of Devi Shachi is the destroyer of enemies.
इन्द्रपुत्रे सोमपुत्रे दुहितासि प्रजापतेः।
कामानस्माकं पूरय प्रति गृह्णाहि नो हविः॥
हे एकाष्टके! हे देवराज इन्द्र सदृश पुत्र वाली! हे सोम सदृश पुत्र वाली! आप प्रजापति की पुत्री हैं। आप हमारी आहुतियों को स्वीकार करके हमारी सभी मनोकामनाओं की पूर्ति करें।(अथर्ववेद, रायस्पोषप्राप्ति सूक्त 3.10.13)
Hey Ekashtake! Hey one having Devraj Indr as your son! Hey having Som as your son! You are the daughter of Prajapati. Accept our offerings and accomplish our all desires.
अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त (3.11) :: ऋषि :- ब्रह्मा, भृग्वङ्गिरा; देवता :- इन्द्राग्नी, आयु, यक्ष्मनाशन; छन्द :- त्रिष्टुप्, 4 शक्वरीगर्भा जगती, 5-6 अनुष्टुप्, 7 उष्णिक् बृहतीगर्भा पथ्यापंक्ति, 8 त्र्यवसाना षट्पदा बृहतीगर्भा जगती।
मुञ्चामि त्वा हविषा जीवनाय कमज्ञातयक्ष्मादुत राजयक्ष्मात्।
ग्राहिर्जग्राह यद्येतदेनं तस्या इन्द्राग्नी प्र मुमुक्तमेनम्॥
हे रोग ग्रस्त मनुष्य! तुम्हारे शरीर में घुसा हुआ यक्ष्मा (रोग), राजरोग (राजयक्ष्मा) से मैं हविष्यानों (हवियों) के द्वारा तुम्हें मुक्ति प्रदान करता हूँ। हे देवराज इन्द्र तथा अग्नि देवता! दर्द से जकड़ लेने वाले रोग से रोगी को मुक्ति प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.1)
Hey man sufferings from diseases! I relieve you from the diseases and the Tuberculosis by virtue of offerings. Hey Devraj Indr and Agni Dev! Relieve the patient suffering from pain.(25.04.2026)
यदि क्षितायुर्यदि वा परेतो यदि मृत्योरन्तिकं नीत एव।
तमा हरामि निर्ऋतेरुपस्थादस्पार्शमेनं शतशारदाय॥
इस व्याधि से पीड़ित मानव की आयु यदि समाप्त हो गई हो तथा यह मृत्यु के मुख में जाने वाला हो, तो भी मैं उसे नश्वरता के निकट से लौटा लाता हूँ। इसे शतायु की पूर्ण आयु तक के लिए सुरक्षित करता हूँ।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.2)
नश्वर :: नष्टप्राय:, नाशवान, अस्थायी, जो शाश्वत न हो, नष्ट होने का गुण या अवस्था, जो स्थायी न हो और जिसका अंत निश्चित हो; mortality, perishability, perishable, mortal.
The person who's age has finished due to illness and is about to die, I bring him back to survive till the age of hundred years.
सहस्राक्षेण शतवीर्येण शतायुषा हविषाहार्षमेनम्।
इन्द्रो यथैनं शरदो नयात्यति विश्वस्य दुरितस्य पारम्॥
असंख्य आँखें तथा शतवीर्येण (सैकड़ों सामर्थ्य-शक्ति वाले) और शतायु युक्त हवि के द्वारा मैंने इस रोग ग्रस्त मानव को मृत्यु के बंधन से मुक्त किया है। ताकि यह जगत् के सम्पूर्ण कुकृत्यों, दुष्कर्मों से पार हो सके। देवराज इन्द्र इसे शतायु से भी अधिक आयु प्रदान करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.3)
I have released this man with infinite eyes, hundreds of capabilities and offerings granting an age of hundred years, so that he is able to surpass all sorts of wickedness, viciousness and evil deeds. Let Devraj Indr Grant him an age of hundred years.
शतं जीव शरदो वर्धमानः शतं हेमन्ताञ्छतमु वसन्तान्।
शतं त इन्द्रो अग्निः सविता बृहस्पतिः शतायुषा हविषाहार्षमेनम्॥
हे प्राणी! शतायु देने वाली इस हविष्य के द्वारा मैं तुम्हें रोगों से रहित परिस्थिति में वापस लाया हूँ। अब तुम लगातार बढ़ते हुए सौ बसन्त, सौ हेमंत एवं सौ शरद ऋतुओं तक मृत्यु के बन्धन से मुक्त रहो।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.4)
Hey living being! I have brought you back from death, through the offerings granting an age of hundred years, free from ailments. Now, you should survive for hundred years enjoying Basant, Hemant, and winters.
प्र विशतं प्राणापानावनड्वाहाविव व्रजम्। व्य 1 न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितराञ्छतम्॥
हे प्राण तथा अपान! जिस प्रकार बोझा ढ़ोने वाले वृषभ अपने गोष्ठ में जाते हैं, उसी प्रकार आप क्षय नामक व्याधि से पीड़ित रोगी के शरीर में प्रवेश करे। मानव जन मृत्यु का कारण बनने वाली जिन सैकड़ों व्याधियों के विषय में कहते हैं, उन सभी व्याधियों का निवारण हो जाए अर्थात् नष्ट हो जाएँ।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.5)
Hey Pran & Apan! The way the load carrying bulls move to their shed, similarly you should enter the body of the persons, suffering from tuberculosis. Let all the diseases causing death to humans, destroy.
इहैव स्तं प्राणापानौ माप गातमितो युवम्। शरीरमस्याङ्गानि जरसे वहतं पुनः॥
हे प्राण तथा अपान! आप दोनों इस शरीर में उपस्थित रहें। आप आदिकाल में भी इस शरीर को न छोड़े। इस व्याधि से पीड़ित रोगी के शरीर एवं उसके अवयवों को बुढ़ापे तक धारण करें।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.6)
Hey Pran & Apan (Vayu-air)! Both of you stay in the body. Never leave this body. Support the body of the diseases person till old age.
जरायै त्वा परि ददामि जरायै नि धुवामि त्वा।
जरा त्वा भद्रा नेष्ट व्य 1 न्ये यन्तु मृत्यवो यानाहुरितराञ्छतम्॥
हे मानव! हम आपको बुढ़ापे तक जीवित रहने के लायक बनाते हैं एवं बुढ़ापे तक व्याधियों से आपको सुरक्षा प्रदान करते हैं। बुढ़ापा आपके हेतु मंगलकारी सिद्ध हो। विद्वान् मनुष्य मृत्यु का कारण बनने वाले जिन रोगों के विषय में बतलाते हैं, वे सम्पूर्ण व्याधियाँ आप से दूर चली जाएँ।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.7)
Hey human! We prepare you till old age, granting shelter-protection from diseases. Let old age prove to be auspicious for you. Let all diseases causing death detailed by the learned-scholars, shun you.
अभि त्वा जरिमाहित गामुक्षणमिव रज्ज्वा।
यस्त्वा मृत्युरभ्यधत्त जायमानं सुपाशया। तं ते सत्यस्य हस्ताभ्यामुदमुञ्चद् बृहस्पतिः॥
जिस प्रकार गाय अथवा वृषभ को रस्सी से बाँधा जाता है, उसी प्रकार बुढ़ापे ने आपको बाँध लिया है। जिस मृत्यु ने आपको जन्म लेते ही अपने रस्सी द्वारा बाँध रखा है, उस बंधन को बृहस्पति देव ब्रह्मा की अनुकम्पा से खोल कर हमें मुक्त कराएँ।(अथर्ववेद, दीर्घायुप्राप्ति सूक्त 3.11.8)
The way cow or the bull are tied with cord-rope, similarly the old age has tied you. Let Brahaspati Dev untie the bond of death which appeared as soon as you were born, with the blessings of Brahma Ji.
अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त (3.12) :: ऋषि :- ब्रह्मा; देवता-शाला, वास्तोष्यति; छन्द :-त्रिष्टुप्, 2 विराट् जगती, 3 बृहती, 6 शक्वरीगर्भा जगती, 7 आर्थी अनुष्टुप्, 8 भूरिक् त्रिष्टुप्, 9 अनुष्टुप्।
इहैव ध्रुवां नि मिनोमि शालां क्षेमे तिष्ठाति घृतमुक्षमाणा।
तां त्वा शाले सर्ववीराः सुवीरा अरिष्टवीरा उप सं चरेम॥
हम इसी जगह पर सुदृढ़ शाला का निर्माण करते हैं। वह शाला सुख-समृद्धि (घृतादि) का मनन करती हुई, हमारे उद्धार हेतु विद्यमान् रहे। हे शाले! हम सब शूर आपके चारों तरफ अशुभ से मुक्त होकर एवं अति उत्तम पुत्र-पौत्रादि से युक्त होकर स्थित रहें।(अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त 3.12.1)
गृह स्वामी कहता है कि वह इस स्थान पर एक दृढ़ (स्थिर) घर का निर्माण कर रहा है, जो सुख-समृद्धि (घृत) से युक्त रहे। हे शाला! हम अपने पराक्रमी, आरोग्यवान और सौभाग्यशाली परिवार के साथ इस घर में सुखपूर्वक निवास करें।
We build the strong house here. That house should grant us prosperity and comforts (Ghee) etc. and remain present for our release. Hey Shale! We brave people remain around you free from inauspiciousness having best sons and grandsons.
इहैव ध्रुवा प्रति तिष्ठ शालेऽश्वावती गोमती सूनृतावती।
ऊर्जस्वती घृतवती पयस्वत्युच्छ्रयस्व महते सौभगाय॥
आप यहाँ अश्ववती (अश्वों अथवा शक्ति से सम्पन्न), गोमती (गौओं या पोषण-सामर्थों से सम्पन्न) वचनों से सम्पन्न होकर दृढ़ता के साथ विद्यमान् रहें। ऊर्जा अथवा अन्न से सम्पन्न, घृत एवं उत्कृष्ट युक्त एवं पयोयुक्त (सम्पूर्ण पोषक तत्त्वों से सम्पन्न) होकर महान् सौभाग्य प्रदान करने हेतु उन्नत (ऊँचे) स्थान पर विराजमान रहें।(अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त 3.12.2)
Stay here with Ashvvati horses i.e., mighty & power, Gomati-cows i.e., blessed with nourishment stably. Occupy a high rise place granting you good luck-auspiciousness, having energy, food grains, Ghee and excellent drinks.
धरुण्यसि शाले बृहच्छन्दाः पूतिधान्या।
आ त्वा वत्सो गमेदा कुमार आ धेनवः सायमास्पन्दमानाः॥
हे शाले! आप भोग-साधनों से युक्त एवं विस्तृत छत वाली हैं। आप पवित्र धान्यों के अक्षय भण्डार वाली हैं। आपके भीतर बच्चे एवं बछड़े आएँ तथा दुग्ध प्रदान करने वाली गौएँ भी सायंकाल में कूदती हुई आएँ।(अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त 3.12.3)
Hey house-Shale! You should have means of comforts-pleasure with a wide roof. You should possess pious food grains and a store having sufficient capacity for food stuff. Children, calf, milk yielding cows should come back jumping in the evening.
इमां शालां सविता वायुरिन्द्रो बृहस्पतिर्नि मिनोतु प्रजानन्।
उक्षन्तूना मरुतो घृतेन भगो नो राजा नि कृषिं तनोतु॥
निर्माण करने की विधि के ज्ञाता सविता देव, वायु देव, इन्द्रदेव एवं बृहस्पति देव इस शाला को विनिर्मित करें। मरुद्गण भी जल एवं घी से इसका सिंचन करें। तत्पश्चात् भगदेवता इसे कृषि आदि क्रियाओं से सुव्यवस्थित बनाएँ।(अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त 3.12.4)
Savita Dev, Vayu Dev, Indr Dev, Brahaspati Dev with the expertise of house building, should construct it. Let Marud Gan ensure availability of with water and Ghee in it. Thereafter, Bhag Dev should manage-arrange it with the agriculture related endeavours.
मानस्य पत्नि शरणा स्योना देवी देवेभिर्निमितास्यग्रे।
तृणं वसाना सुमना असस्त्वमथास्मभ्यं सहवीरं रयिं दाः॥
वास्तुपति की भार्या स्वरूप हे शाले! आप धान्यों की पालनहार हैं। सृष्टि के आरम्भ काल में प्राणियों को प्रसन्नता प्रदान करने, उनकी रक्षा करने एवं उनके उपभोग हेतु देवगणों ने आपका सृजन (निर्माण) किया। आप तिनकों के कपड़े वाली, उत्तम चित्त वाली हैं। आप हमें पुत्रों से सम्पन्न धन वैभव प्रदान करें।(अथर्ववेद, शालानिर्माण सूक्त 3.12.5)
Wife of Vastupati, hey Shale! You are the nurturer of food grains. Demigods-deities evolved you in the beginning of evolution for the protection and happiness of living beings. You have the clothing of straw and best innerself-mood. Grant us sons with wealth & prosperity.(26.04.2026)
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